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Author Topic: A Romantic Bath  (Read 698 times)

Offline praveen.gola.56

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A Romantic Bath
« on: November 23, 2013, 11:01:00 AM »
आज तेरे संग चली मैं फिर नहाने ,
तू मुझे छेड़ेगा शायद इस बहाने ,
शब्दों से जो कह ना पायी तुमको दिलबर ,
नज़रों से अब समझो तुम इस संग के माने ।

गर्म और भीगे हुए से मेरे बदन पर ,
पड़ती हैं जब पानी कि ये ठंडी बूँदें ,
मस्त से हो जाओ तब तुम संग मेरे ,
आओ मिल कर चलें संग ……..फिर कोई गीत गाने ।

सब कहते हैं कि संग होता ये अजब सा ,
जिसमे मिलन होता है दो मैले बदन का ,
दोनों कोशिश करते हैं एक दूजे के बहाने ,
निर्मल बना दें दूसरे को चल कर संग नहाने ।

अपने हाथों से तुमने हमको घसीटा ,
पार कर दो अब जो है कोई सयंम की रेखा ,
संग मेरे आयी हो जब तुम नहाने ,
फिर कैसे दूं मैं बोलो भला ……तुमको कहीं जाने ।

तुम समझ जायोगे मेरे मन का तर्पण ,
इसलिए आयी यहाँ करने खुद को समर्पण ,
ख्वाइशों को लगाकर अपनी खुद निशाने ,
जा ना पाऊँगी अब मैं करके बहाने ।

रंग बदला-बदला सा लगे आज इस फ़िज़ा का ,
साबुन फिसल रहा है अपनी उँगलियों का ,
हाथों में जकड़े तुझे निकले नए तराने ,
इश्क़ अधूरा है बिना प्रियतम के संग नहाने ।

गीले-गीले से गेसू जब तन पर बिखरते ,
तुम उन्हें पकड़ और भी मदहोश करते ,
खुद को मेरे और भी करीब लाने ,
तुम भी तो मचल रहे थे कहीं …….मेरे संग नहाने ।

शोर ना था आज कोई बाल्टी-डिब्बे का ,
ख़याल ना रहा दोनों को अब समय का ,
कैसे कहें कि दो हमें अब तुम कहीं जाने ,
आज मैं खुद ही आयी थी …….तेरे संग नहाने ।

मल रहे थे मेरी मलिन तुम आत्मा को ,
धो रहे थे हम तुम्हारे ……मन में बसी हर कामना को ,
बढ़ रही थी लालसाएँ एक -दूसरे के तन को पाने ,
आज था दिन मदभरा ……..जिसमे सजे थे कई सपने सुहाने ।

हो गया ठंडा अब हर अंग-अंग अपने बदन का ,
मिल गया संतोष जो अधूरा था …….ना जाने कितने जनम का ,
यूँही नहीं कहते ज्ञानी जन कि पाओगे तुम सपने सयाने ,
जब साथ एक-दूसरे के कोशिश करोगे तुम नहाने ।

आज तेरे संग चली थी लेकर मैं जो सपने सजाने ,
पूरे हुए वो मेरे बनकर तुम्हारे संग कई नए बहाने ,
साथ तेरा क्षण भर का बना गया कितने अफ़साने ,
कि जी चाहता है अब ये मेरा ……रोज़ जाऊँ तुम संग नहाने ॥