!!

Welcome to Kavya Kosh

This is a retired Kavyakosh forum used as an archive. To access new Kavyakosh.Click here

Author Topic: “प्रेम” ……… एक अधूरी कहानी  (Read 512 times)

Offline praveen.gola.56

  • Jr. Member
  • **
  • Topic Author
  • Posts: 88
  • Karma: +0/-1
:-* :-* :-* :-*
प्रेम की अजब कहानी  ……सोचा था कि कभी ना सुनानी ,
रखेंगे बनाकर इसे एक ख्वाब …… जिसमे होगा फूलों सा आफताब ,
सुगंध होगी जिसकी  निराली  …… कि बिन बदरा ही छाए घनघोर घटा काली ,
मगर टूट गया इस रहस्य के सब्र का बाँध   ……. जब दिल ने कहा कि बजाओ तुम भी अपने प्रेम का नाद ,
क्यूँ दिल में रखकर इसका बोझ  …… तड़पते हो दिन-रात तरकीबें खोज ,
जब मौका मिला है तुम्हे आज ……… तो प्रतियोगिता के बहाने ही ……. खोलो अपने जिया के राज़ ।

मैं सोचने लगी …… मेरा “प्रेम” ………क्या सचमुच “प्रेम” ही कहलाएगा ?
या फिर वो दुनिवालों का सिर्फ  ……दिल ही बहलाएगा ।
एक मीठी सी चुभन ……एक तीखी सी अगन  ……मैंने भी कहीं महसूस की थी ,
बस फर्क इतना था  ……कि मेरे “प्रेम ‘ में ……उसके साथ की सिर्फ थोड़ी सी कमी थी ।
मेरा “प्रेम” एक तूफ़ान था ……. जिसमे ना कोई सुर और ना तान था ,
वो ना जाने कहाँ से चला आया था  ……जिसने बिन डोर के मुझे बाँध ……अपने संग उलझाया था ।

मेरा “प्रेम” ……… एक अधूरी कहानी ……क्यों सुनेगा फिर कोई उसकी कहानी ?
जिसमे ना थी गर्म साँसों की माया……… ना ही थी मेरे गुलाबी अधरों की कहीं छाया ।
ना ही थी वो बेबाक सी शरारत  …… ना ही थी मचलते जिस्मो की हरकत ,
ना ही था वो मस्ती भरा तराना  ……ना ही था उसके संग दिल से दिल मिलाना ।
ना ही था उसकी गर्म बाहों का घेरा  ……ना ही था मेरी चंचल शोख अदायों का डेरा ,
ना ही था वो अँखियों-अँखियों का इशारा  ……ना उसने और ना मैंने उसे कभी पुकारा ।

फिर क्या था उसमे ऐसा  ……… जिसे मैंने “प्रेम” कह डाला ,
अपने और उसके रिश्ते को  ……मन ही मन में कहीं स्वीकारा ।
मेरे “प्रेम” में थी  ……… एक सादगी की झलक ,
दिल ही दिल में कहीं  ……… उससे मिलने की एक ललक ।
मेरे “प्रेम” में था  ……एक अटूट विश्वास ,
जिसके टूटने पर  …… लग जाती कहीं आग ।

मेरे “प्रेम” में था  ……एक ज़िंदगी का सबक  ,
जिसको सिखाने वाला ही  ……था मेरा फलक ।
मेरा “प्रेम” था  ……… एक खामोशी से भरा तालाब ,
जिसमे मछली सी बन तड़पती थी मैं  ……पाल कर नए ख्वाब ।
मेरा “प्रेम” इतना अडिग था  ……जैसे पर्वत खड़ा हो बिन पाताल ,
मैं डूब कर भी उसमे उभर गयी  ……क्योंकि मेरे थे सदा नेक ख़याल ।

इसलिए देती हूँ आने वाली पीढ़ी को  ……ये नयी सीख  ,
कि “प्रेम” करो तभी जब हो उसे जीत लेने की  …… मन में एक तरकीब ,
अपने “प्रेम” को बनाओ  …… जग में इतना विशाल  ,
कि सागर खुद कहे तुमसे  ……कि जाओ तुम हो एक धमाल ,
ये जरूरी नहीं कि “प्रेम” में होती सदा  ……मिलन की अंतिम एक सीढ़ी ,
क्योंकि कभी-कभी बिना मिलन के भी  …… “प्रेम” की जीत होती सबसे नशीली ॥
« Last Edit: February 08, 2014, 03:26:52 AM by praveen.gola.56 »

Offline rochika.sharma.3

  • Jr. Member
  • **
  • Posts: 50
  • Karma: +0/-0
  • Gender: Female
like it :)