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Author Topic: ज़िंदगी  (Read 744 times)

Offline chhaya dua

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ज़िंदगी
« on: March 25, 2014, 01:33:35 PM »
और एक सुबह, एक शाम हुई जाती है,
                 रफ़्ता-रफ़्ता उम्र यूँ ही तमाम हुई जाती है.
कुछ खास बनने की ख्वाइश की तो थी बहुत मगर,
                 जिंदगी तो और भी अब आम हुई जाती है.
चले तो थे जोश में पाने को हम मंज़िल मगर,
                 हर मोड़ पे अब कोशिश ये नाकाम हुई जाती है.
कल रात वो जो मर गया, भूख से तड़पा था वो,
                 पहचान आज से उसकी गुमनाम हुई जाती है.
छल से वार किया जिसने, वो दोस्तों में था शुमार,
                 दोस्ती अब मौत का सामान हुई जाती है.

sandeep sindhu

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Re: ज़िंदगी
« Reply #1 on: November 28, 2015, 07:52:52 PM »
wah wah kya soch k sagar may dubb kar likha hai... bahut acchi

Offline chhaya dua

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Re: ज़िंदगी
« Reply #2 on: November 29, 2015, 06:59:42 AM »
 Sandeep ji , aap ka bahut-bahut dhanyawaad :)