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Author Topic: पाप और पुण्य =अन्धेरा और उजाला  (Read 280 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका
अजीब सा अन्धेरा छाया हुआ है
जैसे उजाला खो गया है
इंसान घबडा जाता है
दिल उसे आश्वासन देता है
न डरो न घबराओ
अन्धेरा ही उजाले का
परिचय कराता है
यह तो संसार नियम है
दुनिया में पाप ही नहीं होता तो
कौन पुण्य को मान्यता देता
अन्धेरा न होता तो
कौन उजाले की चाहत करता
यह तो एक चक्र है रात दिन का
जो ईश्वर की देन है
ठण्ड के दिनों में सूरज का
ताप अच्छा लगता है
चन्द्रमा की चांदनी में ठण्ड
अन्धेरा और उजाला का
नियम से हज़ारो बरसो से
चलता आया है चलता रहेगा
इंसान ही अपने माग से भटक जाता है
गलत मार्ग को चुन लेता है
वह पाप पुण्य की परिभाषा भुल जाता है
पाप उस पर हॉबी हो जाता है
अपने चंगुल में ऐसे फंसा लेता है
जैसे शिकारी किसी पंछी को
तब उसे महसूस होता है
उसने क्या गलती की थी 
तब तक बहुत देर हो जाती है 
उसके नक्से कदम पर
उसकी संतान चल पड़ती है
ऐसे इंसान अपने जीवन को
अंधरे के हाथ सौंप देते है
फिर ईश्वर से प्रार्थना करते है
ईश्वर ने तो उसे गलत मार्ग
चुनने को नहीं कहा था
वरन उसने तो हर कदम पर
चेतावनी देता रहा
उसकी पत्नी के माध्यम से
सिर्फ उसे ही नहीं
उसकी संतान को भी समझाया
यह तो ईश्वर की मेहरबानी है
जो वह आज ज़िंदा है
वह भी उसकी पत्नी के खातिर 
जो उसके लिये प्रार्थना करती रही
अपनी संतान को समझाती रही
ताकि वह सुधर जाए
वह तो दुनिया चकाचोंध से
भ्रमित होते रहे माँ को अमान्य करकर 
इंसान भरे दिलसे ईश्वर से कहता है
मेरे में जो हो गया था 
वह मेरी आँख पर पर्दा पड़ गया था
मेरी गुजारिश है
मेरी संतान को सही रास्ता दिखाओ I
----------प्रेमचंद मुरारका