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Author Topic: मोमबती की आत्मकथा  (Read 492 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका
मोमबती की आत्मकथा
« on: July 02, 2014, 10:10:29 PM »
बिजली के बल्ब ने एक मोमबती से कहा 
क्या है तुम्हारी औकात मेरे सामने
मेरा उजाला सारे घर को रोशन करता है
तुम्हारा हाल तो ऐसा है
सूरज को दियाँ दिखाना है
मोमबती ने जबाब दिया
तुम्हे लगाने के लिए औकात चाहिए
मेरे लिए औकात की नही जरुरत है
गरीब के घर में रोशनी बिखेरने के लिए
तुम गरीब की परेशानी क्या समझोगे
उस बेचारे की औकात नहीं तुम्हे लाने की
बहुत बड़ी बड़ी बाते तो कर रहे हो
तुम्हारा खुद का ठिकाना नही
जब मर्ज़ी चली जाती हो अँधेरे में डालकर
तब वह भी मेरी ही खोज करते है
जिसके पास जेनेरेटर है वह भी
मुझे लाकर रखता है जेनेरेटर चलाने को
में एक मोमबती नही बर्थ डे केक की शान हु
सिर्फ बर्थ डे नही मौत की कब्र की आन हु
प्रतिवाद को जाहिर करने के अल्फाज हु
कैंडल डिनर की इज्जत बढ़ाती हु
प्रेमी जुगल को एक साथ मिलाती हु
शादी की वर्ष गाठं की रौनक हु
में दीपावली की शाने शौकत हु
में अपने को जलाकर जलती हु
जबतक जलती हु रोशनी बिखेरती हु
अपने जीवन की आहुति देकर भी जलती हु
मेरा त्याग अमर है दुसरो के लिए
तुम्हारी अपनी कोई क्षमता नहीं है
स्विच ऑन करने के बाद तुम जलते हो
फ्यूज हो जाने के बाद फेंक दिए जाते हो
एक बात जरूर है तुम बिज्ञान के बाहक हो
दुनिया में क्रांति लाने के प्रतीक हो
दुनिया को दोनों की जरुरत है
हम आपस में क्यों तर्क बितर्क करे
तुम मेरे प्यारे भाई हो
मानव जाति को दोनों की ही जरुरत है I
---------प्रेमचंद मुरारका




kiran jadhav

  • Guest
Re: मोमबती की आत्मकथा
« Reply #1 on: August 02, 2014, 11:35:52 PM »
Bahut badiya kavya