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Author Topic: एक जिंदगी का फीलोसॉफी  (Read 383 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका

दुनिआ में कोई खुश नहीं है
चाहे उसके पास अरबो रुपिये हो
चाहे आलिशान मकान हो
उसमे हर सुबिधा क्यों ना हो
सुन्दर पत्नी हो
बच्चे फॉरेन में पढ़ते हो
वह खुश हो तो कैसे हो
उसे भूख नहीं लगती
पच्चासो डिश क्यों ना बनती हो
मीठा वह खा नहीं सकता
डायबिटिक से वह परेशान है
शराब वह छोड़ नहीं सकता
छोड़े भी तो कैसे छोड़े
मीटिंग में पीना ही पड़ता है
खाने उसे रूखा सुखा मिलता है
डॉक्टर की हिदायत जो है
यह न खाओ वह न खाओ
तो फिर क्या खाए
उसका जबाब डॉक्टर के नहीं है
यह भी कोई जिंदगी है
ईश्वर उसके अंदर बिराजते है
पर वह ईश्वर को याद नहीं करता
उसे अपने ऊपर इतना अभिमान है
पत्नी उसे रोज़ कहती है
कमसे कम ऑफिस जाते वक़्त
घर के मंदिर के सामने हाथ जोड़ लिया करो
उसका स्वाभिमान इसकी गवाही नहीं देता
वह कहता है में जिस पर हाथ रखता हु
वह सोने की हो जाती है
में ही अपने आपका भगवान हु
बिधाता ऊपर से हँसते है
उसके यहाँ इनकमटैक्स वालो की रेड पड़ती है
सब कुछ उठाकर ले जाते है
बैंक अकाउंट सीज़ कर जाते है
सारे लाकर सीज़ कर जाते है
ऊपर से CBI वाले रेड कर जाते है
तब उसे भगवान याद आते है
पत्नी की प्रार्थना काम आती है
ईश्वर की मेहर हो जाती है
सब कुछ झमेला मिट जाता है
सरकार को टैक्स के पैसे जमा देने पड़ते है
वह एकदम से बदल जाता है
शराब वह छोड़ देता है
डॉक्टर को आने की मनाही हो जाती है
आज वह सब कुछ खा रहा है
डायबिटिक लापता हो गई चंद दिनोमे
रुपये कमाने की लालसा नहीं रही
कमाई आज भी उतनी हो रही है
आज वह महसूस कर रहा है
इंसान का मन ईश्वर का मंदिर है ।
-------प्रेमचंद मुरारका