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Author Topic: हुस्न  (Read 342 times)

Offline Sajan Murarka

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हुस्न
« on: August 08, 2014, 12:33:00 AM »
हुस्न से बढकर नशे का न कोई मयखाना,
उड़ गए होश,पर चाहत का नहीं भरा पैमाना
होश-में हुवे मदहोश, पर नशे से भरा नहीं मन
तेरे रसीले अधरों को पीने को करूँ कितना जतन
टूटे हुवे प्यालों में हाला,पीने को बेबस आता मधुशाला
तेरी जुल्फें,गालों की लाली,होटों का मधुमय प्याला
पीया था कई…कई बार,हुआ नहीं पीने का नशा कम,
जो अब हिस्सा है जीने का पर प्यास अभी हुई कंहा ख़तम
कितनी बार दिल को सहलाया,यादों के जाम आंसुओं से भरे
कुछ भी शेस नहीं,समय की धारा मे जीयें तेरे हुस्न के सहारे

सजन
में , मेरी तन्हाई, कुछ बीते लम्हे , कागज के कुछ टुकड़े को समेटे दो पंक्तिया . .