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Author Topic: बच्चे मन के सच्चे  (Read 277 times)

Offline sanjay.negi.902604

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बच्चे मन के सच्चे
« on: November 14, 2014, 11:52:33 PM »
बच्चे होते मन के सच्चे,
कितने प्यारे कितने अच्छे।
           मां के पेट में जब ये होते,
           मुंह से चुप पेरो से बोलते।
           देख इनकी हरकत मां मुसकुराती,
           अपने सारे दुःख भूल जाती।।
बच्चे होते मन के सच्चे,
कितने प्यारे कितने अच्छे।
             घुटनों के बल जब ये चलते,
             कभी गिरते कभी संभलते।
             इनके मूड का किसी को पता न होता,
             कभी जोर से हँसते और कभी रोते।।
बच्चे होते मन के सच्चे,
कितने प्यारे कितने अच्छे।
               हृदय इनके कोमल होते,
               मां अगर डाँटे तो बहुत हैं रोते।
               मां के बुलाने पर भी नहीं आते,
                पापा की गोद में सो जाते।।
बच्चे होते मन के सच्चे,
कितने प्यारे कितने अच्छे।
               कभी रोते हैं कभी मुसकुराते,
                डर न किसी का शोर मचाते।
                आपस में लडते झगडते,
                पल भर में खिलखिलाते।।
बच्चे होते मन के सच्चे,
कितने प्यारे कितने अच्छे।
               मन इनके बडे सच्चे होते,
               हो जाए गलती झूठ नहीं बोलते।
               समझाने पर जल्दी समझते,
               फिर गलती को नहीं दोहराते।।
बच्चे होते मन के सच्चे,
कितने प्यारे कितने अच्छे।
                संडे को ये खुश हो जाते,
                दिन भर खेलते शोर मचाते।
                रात को जल्दी सो जाते,
                उठकर सुबह खुशी-खुशी स्कूल को जाते।।
बच्चे होते मन के सच्चे,
कितने प्यारे कितने अच्छे।
                 अभी-अभी आई है दुनिया में,
                 मेरी इक नन्ही सी गुडिया।
                 अपने हाथों की बन्द मुठ्ठियों मे,
                 लेकर आई है मेरे सपनों की पुडिया।।


संजय नेगी
ःःःऋषिकुल हरिद्वार