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Author Topic: मेरा बचपन का अवतार  (Read 180 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका
मेरा बचपन का अवतार
« on: November 25, 2014, 09:30:08 PM »
नया बचपन

बहारो फूल बरसाओ
मेरा बचपन लौट आया है
पत्नी के गोदमें टाँगे पछाड़ रहा है
अंगुली चुस रहा है जैसे में चूसता था
माँ डाटती रहती पर में कंहा मानता था
आँगनमे माँ का लडूगोपाल भागता रहता
जैसे यह मेरा लडूगोपाल भाग रहा है
यहाँ पकड़ने वाले हम दो ही जान है
उस समय न जाने कितने रहते
होड़ लगी रहती कौन आगे पकड़ ले
माँ बापू मुझे निहारते रहते
जैसे अपने बचपन को याद करते होगे
जैसे में कर रहा हु
वैसे यह मेरी याद नही है दादीमा कहती थी
मेरे लाडले को कौन बतलायेगा
इसलिए फोटो उतार कर रखता जा रहा हु
यह बचपन भी उपरवाले की देन है
कैसा निष्पाप सहज सरल जीवन है
अचानक माँ बापू आ जाते है
आते ही अपने लाडले को गोद में ले लेते है
यह कैसा अजीब संयोग है
लडुआ  दादा दादी को टुकुर टुकुर देख रहा है
पर रो नहीं रहा है यह ही है खून की पहचान
वह दोनों पागल से हो रहे है
चाय ठंडी हो रही है
पर होश नही है उन्हें तो नया जीवन मिल गया है
आज लडुआ दादी के हाथ से दूध पी रहा है
हम दोनों की आँखे सजल हो रही थी
अपने आप को भाग्यशाली मान रहे थे
यह था मेरा बचपन का अवतार
कल हम दोनों गावं जाने की बात कर रहे थे
कल ही माँ बापू मेरे यहाँ आने की तैयारी कर रहे थेI
---------प्रेमचंद मुरारका

 
« Last Edit: November 25, 2014, 09:33:08 PM by pcmurarka »