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Author Topic: "ममता की डोर"- Bal Kavita  (Read 242 times)

Offline richanaja

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"ममता की डोर"- Bal Kavita
« on: November 26, 2014, 01:16:06 PM »
ममता की डोर
“ मां वो कडी है,
 जिसने जोड रखा है,
 मुझको मेरी हिम्मत से।
   वो हर वक़्त एहसास दिलाती है,
      जीत सकती हूँ मैं,
 सारी दुनिया से॥
   घर से दूर होने पर भी,
      जोड रखा है, मां ने मुझको अपनो से।
   हर रात सपने मैं आकर,
      मेरे साथ मुस्कुराती है,
      खिलखिलाती है, मुझे सहलाती है।
   सुबह नींद भी मेरी खुलती है,
      फोन पर उसकी आवाज़ से।
   मुझे जगाकर द्ढड बनाकर,
      हिम्मत वो मुझको देती है,
   एक नये दिन की कीमत समझाकर,
      भटकने ना देती,
      मुझको मेरे लक्ष्य से।
   भावुक तो वो भी बहुत होती होगी,
      मुझको खुद से दूर पकर,
   उसने अपनी सारी इच्छायें, खुशियां
      भी करदीं न्यौछावर,
      मेरे एक सपने पर।
   छोडने को मुझ को अकेला,
      इस बडे शहर में,
      वो भी बहुत डरती होगी।
   पर हर वक़्त मेरी जीत की,
      प्राथना ही करती होगी।
   मां! ही वो सूरज है,
      जिसने रोशन किया है,
      मेरे इस जीवन को,
   कभी भुला ना पाऊंगी मैं,
      उनके सारे त्याग को,
      इतने प्यार को॥

- this poem is dedicated to mother , by a child who is leaving in hostel far away from home.
- Richa naja jain
 - Email- ltprichanaja@gmail.com

Offline kedar.mehendale

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  • यूही .... चलते चलते
Re: "ममता की डोर"- Bal Kavita
« Reply #1 on: November 26, 2014, 05:10:38 PM »
vaah! vaah!