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Author Topic: चाहत -न है बिराम  (Read 193 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका
चाहत -न है बिराम
« on: December 21, 2014, 04:07:47 PM »
और और की चाहत
जिसमे अल्पबिराम नहीं
न है बिराम
जितनी चाहत पूरी हो जाती
चाहत और बढ़ती जाती
न खाने का समय
न बिश्राम का समय
सपने में भी चाहत नज़र आती
अपने पराये होते जाते
और तो और पत्नी से
बात करने की फुर्सत नहीं
बेटे का फ़ोन भी आता
पीछे बात कर रहा हु
बेटी बेचारी उम्मीद लगाए
पापा के फ़ोन का इन्तेजार करती
पर पापा को फुर्सत हो तो
बेटे बेटी से बात करे
मन उसका कहता है
जो कुछ कर रहा हु
वह तो उन लोगो के लिए ही
कर रहा हु
यह उसे मालुम नहीं बेटी को
पापा चाहिए पैसे नहीं
उसके पास किस चीज की
कमी है जो वह उम्मीद करे
बेटा भी बाप के पद चिन्ह पर
बढ़ता जाता है
नाम भी बहुत मिला
पैसो के खातिर इज्जतदार भी बना
बदले में खो गया पारिवारिकता
यह ही तो महालक्ष्मी की कृपा
हालत ऐसे बन जाते है
जन्मदिन तो पत्नी याद दिलाती है
तब मजबूरन हाय हैल्लो
करना पड़ता है
पर उसमे प्यार की खुशबु नहीं
------प्रेमचंद मुरारका