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Author Topic: पत्नी को क्या जबाब दू..........बतलाओ तो कोई !  (Read 216 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका
पुरानी यादो से हो जाती आँखे नम
उभर कर आते है सारे जख़्म
वह छोटीसा रसोई जंहा निकले दम
जमानेकी हवा से मज़बूर थे हम
सर पर घूँघट रखे हो जाती तुम बेदम
में भी कैसा था निर्मम
सच माने तो में हो गया था बेहरम
परिवार के लिए भूल जाता तुम्हारा गम
कैसे तुम खाना बनाती थी कैसे खाते हम
चूल्हे की धुएँ से तुम्हारी आँखे हो जाती नम
पर मुझे क्यों नहीं आती शर्म
आज तुम मुझसे सवाल कर रही हो
क्या गलती थी तुम्हारी जो तुम्हे न मिला कुछ
सिवाय बेइज्जती अपमान और टूटा हुआ दिल
मैंने बहुत सोच समझ कर जबाब दिया
गंगा का पानी बहुत बह गया, न रहा धर्म
गंगा तो बहती गई मिल गई सागर में
जिस काम के लिए उतरी थी वह पूरा कर दिया
वैसे ही तुम आई मेरे संग
तुम्हे भी चलना होगा मेरे साथ अपना धर्म निभाने
किसने क्या किया क्यों किया न बिचार के
जिस उम्मीद से आई थी तुम मेरे संग
वह उम्मीद तो पूरी होने से रही इस जन्म मे
प्रार्थना करता हु ईश्वर से तुम्हे अपने पास रख लेवे
न भेजे धराधाम पर चाहे मुझे भेज देना नरक में
गलतिया तो मैंने की है सहन करता रहा
एक भावना के प्रबाह में बह कर
न पहचान सका इस स्वार्थी दुनिया को
जो माँ समान भाभी को भी नहीं छोड़ेंगे
न यह सोचेंगे जब तुम आई थी वह कितने छोटे थे
सोच लो तुम गंगा हो तुम तो पावन हो
जो तुम्हे प्रदूषित किया वह जिम्मेवार है
और जिसने करने का मौक़ा दिया वह जिम्मेवार है
तुम कदापि नहीं।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
फिर भी तुम पूछती हो मुझसे :::::::::::::
मुझे क्या मिला मेरे सनम
क्या यह दिन देखने के लिए मैंने लिया था जन्म
यह कैसा परिवार जिसमे किसीने नहीं लगाया मलहम
में आज निर्बाक हु झुकी हुई है मेरी नज़र ।

----------प्रेमचंद मुरारका