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Author Topic: उपरवाले का मज़ाक  (Read 252 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका
उपरवाले का मज़ाक
« on: January 27, 2015, 06:18:54 PM »
जिंदगी भी क्या अजीब है
सच मानो तो यह उपरवाले का मज़ाक है
यह तो वह ही जाने क्यों वह कठपुतली बनाकर
इंसान नाम के जानवर को धराधाम पर भेजता है
कठपुतली की रास तो उसके हाथ में रखता है
फिर मान अपमान इंसान को क्यों भोगना पड़ता है
जो है कठपुतली न उसमे है जान फिर भी उसे नाचना पड़ता है
तुम्हारे ईशारे पर सब कुछ करना पड़ता है ,

जैसे कठपुतली हर रंग की होती है
तन बदन में भी फरक होता है
किसी को नर बनाकर भेजा किसी को नारी बनाकर
फिर दोनों को मिलाप भी करवाते हो
कभी कभी बिच्छेद भी करवा देते हो
तुम तो ऊपरसे मज़ा देखते रहते हो
जिसका मिलाप हो जाता है उसका संसार बस जाता है
जिसका मिलाप नहीं हो पता वह बिरह की यातना भोगता है,

जिसका संसार हो जाता है परिवार आगे बढ़ता जाता है
जिम्मेवारी बढ़ती जाती है
उसके लिए तुम कोई ब्यबस्था नहीं करते हो
वह बेचारा रोता पीटता रहता है तुम्हे याद करता है
पर तुम इतने निष्ठुर कैसे बन जाते हो
किसी को इतना देते हो फिर भी उसकी चाह नहीं मिटती
ऊपर से उसे संतान से बिमुख कर देते हो
आखिर तुम चाहते क्या हो !

---प्रेमचंद मुरारका