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Author Topic: प्रेम नाम है मेरा  (Read 169 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका
प्रेम नाम है मेरा
« on: February 15, 2015, 09:24:26 PM »
यह तो नहीं जानता क्यों पड़ा मेरा नाम प्रेम
पर कोशिश करता रहा कैसे सार्थक हो मेरा नाम 
न माँ बापू को शिकायत का मौक़ा मिला प्रेमसे
न और किसीसे पक्षपातित्य किया यह प्रेम
हर तकलीफ को हंसकर झेलता रहा
अपने नाम प्रेम को सार्थक करने के लिए
तब यह नहीं जानता था प्रेम की सीमा होती है
स्वार्थ बिहीन प्रेम को लोग बेवकुफी समझते है
यह ही मेरे में घटित हो गई
प्रेम अकेला रह गया दुनिया पराई हो गई
दुनिया समझदार थी उसे तो स्वार्थ से प्रेम था
पूरा हो गया स्वार्थ, अब क्या काम प्रेम का 
वही बिभीषन मौके का फायदा उठाया
राजगद्दी पर आसीन हो गया
हो गये श्रीराम भक्त पर संसार आज भी
उसे कहते है घरभेदी बिभीसन
मेरा अनुभव कहता है
प्रेम स्वार्थ की पराकास्ठा है
न करो किसीसे प्रेम क्योकी संसार असार है
करना ही तो करो प्रेम देश मातृका से
और करो माँ बाप से, पत्नी से और बच्चो से
करो प्रेम दीन दुखियोसे अपार शान्ति पाओगे
वैसे हमारे संत कहते थे प्रेम तो नश्वर है
ईश्वर भी नश्वर है तो क्या फर्क है दोनों में
माँ बाप की सेवा करते रहो हो जाएगा प्रेम सार्थक ।
---------प्रेमचंद मुरारका