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Author Topic: ईश्वर की बेदर्दी  (Read 201 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका
ईश्वर की बेदर्दी
« on: March 06, 2015, 10:14:55 PM »
में रास्ते से गुजर रहा था
देखा कागज़ की नाव डगमगा रही है
बच्चा रो रहा था
मुझे दया आई
मैंने उसे दूसरी नाव बनाकर दे दी
वह भी डगमगा कर डूब गई
उसे तो डूबना ही था
बच्चे की उम्र समझ ने की होती
उसे समझा देता
फिर भी कोशिश की
बेटा यह कागज़ की नाव है
जैसे कागज़ की पतंग
आकाश में उड़ती रहती है
फिर वह कट जाती है
मुझे यह बिलकुल मालुम नहीं था
यह बेचारा बच्चा बिन माँ का है
उसने मुझसे पूछ ही बैठा
तो क्या मेरी माँ कागज़ की थी
जो कट गई या डूब गई
में सन्नाटे में आ गया
मेरे पास कोई जबाब नहीं था
मैंने ईश्वर की प्रार्थना करने लगा
और उससे मन ही मन पूछा
क्या तुझे मालुम नही
माँ का कोई बिकल्प नहीं
सब कहते है तुम करुणामय हो
पर तुम तो निष्ठुर हो
में सोच रहा था कैसे जाऊ
बच्चा मेरे तरफ ताक रहा था
वह मुझसे जबाब मांग रहा था
इतने बच्चे के पापा आये
बच्चे को गोद में लिया
उसे फुसलाया बेटा तुम्हारी मम्मी
आकाश में तारा बन गई है
रात में तुझे उससे मिलाऊंगा
में तुरंत भाग निकला
ईश्वर कैसे इतना बेदर्द हो सकता है
फिर भी पालनहार कहलाता है ।
-प्रेमचंद मुरारका