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Author Topic: फर्क  (Read 188 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका
फर्क
« on: March 06, 2015, 10:19:14 PM »
फर्क तो बहुत पड़ता है
जब कोई हँसी उड़ाता है
पैसा किसीका कोई गिनने नहीं जाता
तकलीफ जब होती है
जिसे उसने पाला पोसा
वह ही आज पैसे की अहमियत समझा रहा है
तब यह सोच मन में आती है
काश ! यह अहमियत
आगे उसे किसीने क्यों नहीं दी
यह तो वह भी जानता है
सब खाते है बिना घी के फलके
न कोई खाने की तकलीफ है उसे
न तकलीफ है उनके पास इतने रूपए क्यों है
तकलीफ तो इस बात की है
उसके अंधबिश्वास के कारण
उसके अपने बच्चे उसे दोषी ठहराते है 
उससे पूछते है
क्यों हमें नहीं पढ़ाया
क्यों हमारी जिंदगी से खेल खेला
आपको तो महान बनना था
कर्तब्य पालन की मिसाल बनना था
आप तो पढ़े लिखे थे
आपने यह भी पढ़ा होगा
CHARITY BEGAINS AT HOME
आपने होम और फैमिली का
अंतर कर नहीं पाये
जो कर पाये वह आज खुश है
बाप का कर्ज़ा बेटे उतारते है
हो सकता है जब फैमिली बिखर गई
दुःख तो इस बात का है
तब भी बिखरे हुए टुकड़ो को समेट रहे थे
जिनको लिए आपने कुछ भी किया
वह ही आज आपको कलंकित कर रहे है
आपको कलंकित नायक बना दिया है
यह हमारी सोच नही हकीकत है
अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है
------प्रेमचंद मुरारका