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Author Topic: कर्ज़ा क्या बला है  (Read 98 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका
कर्ज़ा क्या बला है
« on: March 20, 2015, 04:33:48 PM »
काम काज तो कुछ था नही
खानदानी साख थी
खर्चे का टोटा पड़ रहा था
क़र्ज़ लेना जरूरी था
काम काज जो होता नहीं था
साख बनाये रखना जरूरी था
क़र्ज़ ले लिया आराम से मिल गया वह कर्ज़े को उतारने के लिए
दुसरा कर्ज़ा ले लिया
दूसरे को चुकती के चक्कर में
तीसरा कर्ज़ा ले लिया
ऐसा ही चलता रहा
पहले वाले के नज़र में
में ईमानदार था
उससे फिर कर्ज़ा ले लिया
वह खुशी खुशी दे भी दिया
उसे तो ब्याज मिल रहा था
यह  सिलसिला चलता रहा
मेरा कर्ज़ा बढ़ता रहा 
अब तो हालात ऐसे बन गए
जिससे पहले एक लाख मांगे थे
उससे दो लाख मांग रहा था
बात तो यह थी
एक लाख ब्याज और
एक लाख खर्चे में लग गए
दो लाख चुकाने थे
रात भर सो नहीं सका सोचता रहा
ऐसे तो दस लाख मांगने पड़ेंगे
पराये पैसो से कब तक चलता रहूंगा
कुछ तो काम करना ही पडेगा
काम चाहे छोटा हो चाहे बड़ा
छोटा मोटा काम शुरू कर दिया
बाज़ार में साख तो थी ही
काम चल निकला
क़र्ज़ से मुक्ती मिल गई
दिन व दिन काम बढ़ने लगा
अब लोग मुझसे कर्ज़ा मांगने आते है
में समझाता हु यह बीमारी गले मत लगाओ
ब्याज तो २४ घंटे चलता रहता है
लड़की ब्याहनी है तो ले जाओ
लड़के को पढ़ना है तो ले जाओ
कर्ज़ा चुकाने के लिए मत लो
माँगनेवाला समझ जाता है
इसे मालुम है में क्यों कर्ज़ा मांग रहा हु
वह बहाना करकर चला जाता है
फिर घर जाकर शांती से सोचता है
वह सब कुछ समझ जाता है ।
-------प्रेमचंद मुरारका