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Author Topic: मुराद  (Read 122 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका
मुराद
« on: March 20, 2015, 04:43:16 PM »
कहानी प्रेम की बहुत सी पढ़ी
बहुत सी कबिताये भी सुनी
शायरी का लुफ्त भी उठाया
पर समझ में नहीं आया
यह होता है क्या
किशोर अवस्था थी
सोचता क्या यह जवानी का जनुन है
या सच में ऐसा कुछ होता है
या कबी की प्रेरणा है
या शायर की शायरीमें सीमित है
जैसे जैसे जवानी दस्तक दे रही थी
जवानी का रंग सर पर चढ़ रहा था
वह सारी कबिता सच लग रही थी
जब मुलाक़ात हो गई थी
वह एक सुन्दर सी लड़की थी
कबी के कल्पना के पर थी
मेरे दिल में बस गई थी
यह तो मेरी सोच थी
न जाने उसकी क्या सोच थी
वह भी मेरे क्लास में ही थी
क्या जाने मुझे यह क्यों लगता
वह मुझे कुछ कहना चाह रही है 
मेरी तो हिम्मत नहीं हुई पूछने की
पर वह कह गुजरी
वह घर में माँ के साथ अकेली है
पापा कुछ रुपये छोड़ गए थे
उससे ही गुजारा चलता है
मेरी माँ की चाह है में पढ़ लिख कर
पापा की चाह पूरी करू
मैंने पूछा:
बोलो तुम मुझसे क्या उम्मीद करती हो
उसने कहा वह कोचिंग ले नही सकती
अगर उसे मेरे नोट मिल जाए तो
माँ का सपना पूरा हो सकता है
यह ही हमारे प्रेम की शुरुवात थी
मैं उससे रोज़ मिलता रहता था
कोचिंग के नोट दे दिया करता था
वह तो शायद रात में पढ़ती थी
में रात भर उसके सपने देखा करता था
एक दिन वह सपना सच हो गया
वह मेरी जीवनसाथी बन गई
-------प्रेमचंद मुरारका