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Author Topic: समर्पण  (Read 102 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका
समर्पण
« on: March 25, 2015, 03:51:49 PM »
सब कुछ सीखा हमने
न सीखी ईमानदारी
चल रही थी हमारी दुकानदारी
काम कराने लोग करते मारामारी
जो ज्यादा देता उसका काम हो जाता
दूसरे दिन ज्यादा लेकर आता
अचानक यह अरबिंदजी
कहासे आ गए
हमारी सुख की नींद तोड़ दी
अरबिंदजी भ्रस्टाचार मुक्त
दिल्ली की बात करे है
क्या वह भ्रस्टाचार का अर्थ जानते है
यह तो एक आपसनामा है
हम लोग कहते है
हम आपके लिए करते है काम
आप देते है उसका दाम
हम इसे समपर्ण कहते है
समर्पण तन मन धन से होता है
हम तन मन से करते है
आप धन से करते है
यह सदियों से होता आ रहा है
अरबिंदजी हम करते है बिनती
हमारी न कीजिये गिनती
बहुत मगरमच्छ भरे पड़े है
महंगाई कम कीजिये
बिजली पानी सुलभ कीजिये
कृपया हमपर नज़र न डालिये
हम तो छोटी छोटी मछलिया है
हम आपके लिए भी समर्पित है
आज़मा कर देखिये ।
---प्रेमचंद मुरारका