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Author Topic: मान और अपमान  (Read 156 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका
मान और अपमान
« on: March 25, 2015, 03:56:09 PM »
मान को अपने ऊपर था अभिमान
उसे हर जगह मिलता था सम्मान
उसे क्या मालुम क्या होता है अपमान
पर संयोग होता है बलवान
दोनों को मिलना यह ही था बिधि का बिधान
मान करने लगा अपना बखान
अपमान को था अनुभव का ज्ञान
मेरे भाई पाप ही है पुण्य की पहचान
वैसे अपमान ही है मान की पहचान
न करो इतना गुमान
में तो हु अपमान मेरा क्या अपमान
तुम तो मान हो अगर हो गया तुम्हारा अपमान
तुम्हारा जीना हो जाएगा हलकान
इसलिए कहता हु न करो अभिमान
बहुत मानीयो के होता देखा है अपमान
ऐसा भी देखा बहुतो का होता रहा अपमान
मरने वाद उसे बहुत सम्मान
यह तो संसार है जंहा बहुत कुछ है अनजान
बहुतसे राजा महाराजो का खत्म हो गई शान
जो थी प्रजा वह आज कर रही प्रजापालन
समय के साथ समझोता करते रहो बढ़ेगा मान
सदियों से अपमानितो को न करो अपमान
सिक्के के एक तरफ है अपमान दूसरी तरफ है मान
फिर भी उसकी है एक सी शान ।
--------प्रेमचंद मुरारका