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Author Topic: कटु अनुभव  (Read 168 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका
कटु अनुभव
« on: March 27, 2015, 10:27:55 PM »
जान है तो जहांन है
मान है तो मान्यता है
शान है तो शौकत है
जीना है तो मरना है
फिर भी हम अज्ञान है
पैसा ही भगवान है
उसके पीछे भागते रहते है
झूठ साँच करते रहते है
न सुखसे खाते है
खाते खाते बाते करते है
एक हाथ में मोबाइल
दूसरे हाथ से खाते है
क्या खाया उसका ज्ञान नहीं
स्वाद का पता तक नहीं
जल्दी से खाना खाकर
पैसो के भागते जाते है
जल्दबाजी में पड़ जाते है
होश गवां बैठते है
डॉक्टर कहते है
कोमा में चले गए है
ट्रीटमेंट होता रहता है
पहले पहले तो घरवाले आते
फिर वह भी बंद कर देते
फ़ोन से खबर ले लेते
उम्मीद भी छोड़ देते
अपने अपने काम में लग जाते
अचानक वह जाग जाते है
परिवारवालों को देखते है
तारीख देखते है
पांच महीने से पड़ा था
मनमे गलतफहमी पाल लेते है
घर आकर देखते है
उसका अस्तित्य ही नहीं रहा
कामकाज चल रहा था
उसकी जरुरत खत्म हो गई थी थी
उसे अपनी औकात पड़ती है
पैसे का मोह भी खत्म हो गया था
खाने का स्वाद पड़ रहा था
मौत से लड़कर आया था
मौत का डर भी नहीं था
अब कुछ करना चाहता था
मालिकाना खत्म हो गया था
बैंक जाकर निगह करता है
उसकी फिक्स्ड डिपाजिट पड़ी है
वह उसका भुगतान लेकर
अनाथाश्रम चला जाता है
और वहा ही रहने लग जाता है
अनाथो की देखभाल करता है
अनाथो के नाम अपना जीवन
समर्पित कर देता है
उसे जो मालुम हो गया था
संसार स्वार्थी है ।
---प्रेमचंद मुरारका