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Author Topic: झुकी पलक  (Read 193 times)

Offline Vindhya

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झुकी पलक
« on: April 01, 2015, 04:49:09 AM »
अापस को समझकर साथ साथ आगे बढ़ने की प्रारंभिक कवायद और इसी के साथ बढ़ती नई जिम्मेदारियों की अपनी व्यस्तायें होती हैं | लेकिन इन गुजरते लम्हों के साथ कब दो अलग सांसें एकदूसरे की जरूरत बन जाती हैं पता ही नहीं चलता| निसंदेह इन दोनों के बीच बातों व् विचारों का अपना ही पिटारा होता है पर इस पिटारे में वो एक सुन्दर और नाजुक सी जरूरी बात नीचे की ओर खिसकती चली जाती है, फिर कभी, बाद में बाहर निकलने ले लिए | क्या करें, विवाह संस्था ही ऐसी है हमारे इस समाज की|
आज मन ने फुसलाया कि क्यूूँ प्रतीक्षा करूँ मैं उम्र के पकने की|  मैं इस प्यारी सी फुसलाहट में आकर बाहर निकाल लाई उस पिटारे से वो दिल की बात |
आज आप सभी की साक्षी में, अपने जीवनसाथी को  सप्रेम समर्पित कर रही हूँ  कुछ नई और कुछ पुरानी, उन्ही के लिए लिखी हुई अपनी यह पंक्तियाँ .....



झुकी इन पलकों के दर्पण में,
अजब से मन के कम्पन थे...

उलझते प्रश्नों कि धड़कन में,
स्वप्नों के मौन वंदन थे...

कैसा जीवन अब रहेगा,
क्या होगा जैसा मन कहेगा?

शांत मन में कलरव था,
सहमता झिझकता वो पल था...

जो तुझ संग नव आगाज हुआ,
तो नव रंगों का आभास हुआ...
 
जीवन पुलकित कुमुद हुआ,
हर सपना मेरा मुग्ध हुआ...
 
मित्र, तेरा जो साथ मिला,
हर राह को परवाज मिला...
 
जाने कब अकुला मन कि तरल हुई,
कैसे चौदह बरस कि कल हुई!!
« Last Edit: April 03, 2015, 03:00:45 AM by Vindhya »