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Author Topic: गुस्से की आग  (Read 162 times)

Offline rajdeephar

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गुस्से की आग
« on: April 03, 2015, 04:53:17 PM »
गुस्सा इंसान को खाये जा रहा है l
नफरत का घूट पिलाये जा रहा है ll
होठों पर एक बनावटी सी मुस्कान लेकर
वो अपने ग़मों को छुपाए जा रहा है ll

किसी के घर जब खुशी आती है l
दूसरे की सहन करने की शक्ति ख़त्म हो जाती है ll
सुनकर वो अपने होठों पर बनावटी हँसी लाता है l
और बिना मन के बधाई देकर चला आता है ll

अंदर ही अंदर कुढ़ता है की  मुझको सफलता क्यों नहीं मिल पाई l
मैंने क्या कसूर किया था जो यह सफलता मेरे हाथ न आई ll

एक बार मैं मेट्रो से जा रहा था
एक यात्री का बैग मुझसे बार-बार टकरा रहा था l
मैंने बस इतना कहा भाई अपने बैग को पीठ से उतारकर
अपने हाथों तक ले आये l
तपाक से उसने मुझे गुस्से से जवाब दिया
इतने ही परेशान हो तो ऑटो से जाये ll

आज एक औरत दूसरी औरत को देख नहीं पा रही है l
इसकी भी सहन करने की शक्ति खत्म होती जा रही है l
तभी तो सास-बहू की नोकझोंक में वो खूब छा रही है ll

हल्का सा मजाक भी इंसान से सहन नहीं हो पा रहा है l
गुस्सा इस कदर बड़ चुका है,की दूसरों पर गोलियाँ बरसा रहा है ll
यह गुस्सा इंसान को अंदर ही अंदर खाए जा रहा है l
इसलिए चेहरे पर हँसी नहीं रही और चेहरा मुरझा रहा है ll

जिस दिन तू दूसरों से ईर्ष्या और घर्णा करनी त्याग देगा l
उस दिन यह गुस्सा दूर होकर तुझे मन की शांति देगा ll
तुझे मन की शांति देगा ........तुझे मन की शांति देगा