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Author Topic: सूनापन  (Read 69 times)

Offline Sajan Murarka

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सूनापन
« on: April 05, 2015, 01:51:37 PM »
बाबू जी के चले जाने के बाद
मेरी माँ अकसर राह ताकती
अपने कमरे से
मेरे आने जाने की राह
कि कब कोई वक्त
बैठुं उनके पास
उनको एकाकीपन से
दिलाउं निजात
या इस रीते वक्त में
अपनेपन का एहसास
मैं उस चाहत को
समझते हुए भी ना समझ
बैठ जाता था उनके पास
जब कभी मिलता अवकाश
उस समय उनके आखों में
एक अलग चमक
और अलग सा आत्मबिश्वास
बेदनातुर हंसी भरा प्यार
मुझे बहुत देर तक
नहीं रोक पाता पास
औपचारिक कुशलता
स्वास्थ्य संवाद के बाद
अपने कमरे की ओर
जाने को तत्पर
मैं निकल जाता बेअसर
न देख पाता सूनापन
उनके चेहरे पर
"मां" तो चली गई
समय की लम्बी जुदाई
आज जब मेरे पास
बेटा,बहू और पोता
जो साथ नहीं रहते
आये मिलने,अकस्मात
लौट जायेगें कल
मेरी आँखें छल छल
मुझे वह दर्द
आ रहा है समझ
साथ मां की याद
उन से माफी मांग
हल्का करना है अपराध
स्थापित करना संवाद
यह अपनों से दूरी
दिल पर कैसी गूजरी
अब महसूस तेरी मजबूरी

सजन
में , मेरी तन्हाई, कुछ बीते लम्हे , कागज के कुछ टुकड़े को समेटे दो पंक्तिया . .