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Author Topic: छोटे भाई की पत्नी की अकाल मृत्यु पर अफसोस भरे कुछ अल्फ़ाज़:--  (Read 131 times)

Offline Sajan Murarka

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मेरे छोटे भाई की पत्नी की अकाल मृत्यु पर अफसोस भरे कुछ अल्फ़ाज़:--

ऐ मौत तू इतनी बेरहम बे-ईमान
क्या तेरा है न्याय करने के विधान

क्यों बन बैठी है अन्जान
आखिर क्या है तेरा ईमान

कहाँ कहाँ से ढूंढती तुम इंसान
बिना समझे देती है फरमान

मासूम बच्चों की छिन लेती मुस्कान
बड़े बड़े अपराधी को देती जीवन दान

सरल, अकपट जिन्दगी में देती घमासान
चोटी के दुराचारीयों पर क्यों है मेहरबान

क्यों की तुझे गले लगाना नहीं आसान
चली आती जैसे बिन बुलाये मेहमान

क्या पता है तुम्हे कैसे जीये विरही प्राण
यह ही है आखिर कारण न मिले मान

मेरे पास तो दुःख रहेगा सागर समान
जो सुबह शाम कोसेगा निन्दा व्याख्यान

तेरे नाम अभियोग लिख रहा, हूं परेशान
पर ये कोशिश भी रहेगी ना काम जान

उम्र के ढलान पे, हौसलों में है थकान
पर उसकी तस्वीर से चलाएंगे अभियान

बची है जो सांस,मैं नहीं बैठूँगा हार मान
जीवन हरण की जंग से है यह खुला ऐलान

जिन अबोध बचपन को किया तुम्ह ने लहूलुहान
तेरे साथ लड़कर उन में भरना है नये कीर्तिमान

पर अब से उनके जीने की राह नहीं रही आसान
फिर भी नही हूं हताश, जारी रखना है स्वाभिमान

एक दिन जब यह हो जायेगा प्रमाण
तेरे कुचक्र से नहीं रूकता सृजन अभियान

तेरा नहीं है कुछ भी मोल,तु लेगी जान
मुस्कान हरने वाली तेरा होगा अपमान

सिर्फ़ छिना पत्नी के संग जीने का अरमान
बच्चों में माँ की निश्छल ममता रहेगी वर्तमान

हर पल तेरे किये का रहेगा अफसोस और ध्यान
मृत्यु तो है बस एक अन्त करने का श्मशान


सजन
में , मेरी तन्हाई, कुछ बीते लम्हे , कागज के कुछ टुकड़े को समेटे दो पंक्तिया . .