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Author Topic: होली  (Read 91 times)

Offline Sajan Murarka

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होली
« on: April 05, 2015, 02:57:37 PM »
प्रह्लाद को लेकर बैठ गई
होलिका करने को चतुराई
अग्नि से भस्म करने मनसा जताई
भक्त के आगे ठगी काम न आई

प्रभु भक्ति में अद्भुत है शक्ति
इस में दुष्टता की चले नहीं युक्ति
अपनी करनी का फल मिलता अति
ध्वंस करने वाले की होती चरम गति

अधर्म का नाश देख खुशी छाई
जग में आनन्द की घड़ी आई
रंग गुलाल से दुनिया हर्ष मनाई
सदियों से फिर प्रथा चली आई

रंग उत्सव की अलग है और मति
मथुरा में कृष्ण के लिये है प्रीती
वृन्दावन में रास लीला की बात होती
बरसाने में लठ मार दिखे मस्ती

जग ने जैसे भी यह होली मनाई
इस में दिखे एक अलग सी सच्चाई
बुरा का अन्त और मिलन मानसताई
प्रेम प्रीत के रंग से हमने है निभाई

सजन
में , मेरी तन्हाई, कुछ बीते लम्हे , कागज के कुछ टुकड़े को समेटे दो पंक्तिया . .