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Author Topic: गरीबी  (Read 110 times)

Offline Sajan Murarka

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गरीबी
« on: April 05, 2015, 04:40:05 PM »
फटे हाल गरीब को देख
अमीर के माथे पे शिकन
वैरागी मठवासी की उपेक्षा
मध्यम वर्गीयों के मिश्रित परिणाम
अपनी श्रेणी में हिस्सेदारी की जलन
वह असहाय चिल्लाया
वाह रे ईश्वर !
तुम जगत के सृष्टि कारक
तुम भी आम आदमी की तरह
बहुत उपर से जब देखते हो
तुम्हे भी क्या जमीं पे
पड़े हुए यह शरीर
दिखाई नहीं देते
या इनका वजूद
अपनी कमियों के लिये
तुम्हारे दृष्टिपात में नहीं आते
या इन्हें ध्यान आकर्षित करने के लिये
तथाकथित तुम्हारे माध्यम से
तुम्हे भी भेंट पंहुचना होगा
बिना शर्त, की प्रतिफल में
कुछ मिलेगा या नहीं
अभी के शासक की तरह
सिर्फ उन दलालों द्वारा
दिया गया झूठा आश्वासन
समझ नहीं आता
तुम्हारे यहां ऐसी अव्यवस्था
कैसे चली आ रही है सदियों से
शायद जोड़ तोड़ की राजनीति में
तुम माहिर हो पुराने दल की तरह
और इस नीति पर आधारित
भूखी जनता रोये तो
समवेदना से फुसलाकर रखो
भूख मत मिटाओ
भूख मिट गई फिर
तुम्हे कोन याद करेगा
वाह रे जादूगर
खुब मिलाई जोड़ी
उपर तुम और नीचे
तुम्हारे चम्मचें
गरीबी के साथ खेल रहे हो
आंखं मिचौली

सजन
में , मेरी तन्हाई, कुछ बीते लम्हे , कागज के कुछ टुकड़े को समेटे दो पंक्तिया . .