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Author Topic: कलियुग  (Read 116 times)

Offline Sajan Murarka

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कलियुग
« on: April 05, 2015, 04:45:42 PM »
प्रभु ने जताया सहज प्यार
कलियुग में नाम गान से पार
कोई कमायें इस से धन अपार
कोई फिर भी भूखा मरे लाचार

भाग्य फल अगर हम इसका आधार
नाम गान की बात कपट प्रचार
अगर यह कर्म फल से हो बिचार
ढोंगी करते कोन सा कर्म का आचार

कहा वेद पुराणों में शत बार
भक्त के अधीन प्रभु का संसार
जिसे मिले वह तब भक्त अपार
जिसे नहीं, कैसे हो बेड़ा पार

दया-करुणा का क्या होता आधार
अजीब विड़म्वना है, कैसे हो बिचार
पक्षपात का स्वरूप कहे पुकार
धर्म चला रहे धर्म के कुछ ठेकेदार

आश्वासित किया था प्रभु ने बारबार
दुष्टों के विनाश के लिये लूं अवतार
भक्ति करे तो,कष्ट से निश्चय परिहार
शरणागत की रक्षा ही है मेरा भार

शास्त्र कुछ कहे, दिखे अलग व्यवहार
अगर वह हैं सर्व शक्ति के आधार
न्याय और अन्याय का करते प्रतिकार
तब या वैषम्य का क्यों फैला अंधकार

धर्म करता रक्षा धार्मिक की हर प्रकार
प्रभु के सन्तान सब,फिर क्या भेद बिचार
भाग्य से, कर्म से चले तो प्रभु क्या बेकार
वह कुछ कर सकें तो फिर क्यों निर्विकार

सवाल मेरे समझ से पार
परम्परा गत चले आधार
वर्ण भेद से है यह व्यापार
संरक्षित रखे अंधा कुसंस्कार
रुढ़ीवादी सोच व लोकाचार
ठगों के बीच फंसे लाचार
परेशान या जो है बीमार
नाम के वास्ते खुब प्रचार
धर्म अब राजनैतिक हथियार
अजब बात सब सहते निर्विकार

सजन
में , मेरी तन्हाई, कुछ बीते लम्हे , कागज के कुछ टुकड़े को समेटे दो पंक्तिया . .