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Author Topic: महुए  (Read 594 times)

Offline kazimjarwali

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महुए
« on: October 29, 2011, 10:11:08 PM »
कभी हमने भी गेहूं की बाली मे महुए पिरोये थे !!!
 
मेरे गाँव की यादें नशीली !
जूही,
चमेली !
 
वो खट्टे, वो मीठे मेरे दिन,
वो अमिया, वो बेरी !
 
कभी गाँव के कोल्हु पर ताज़े गुड के लिये रोये थे !!
कभी हमने भी........................... महुए पिरोये थे !!!
 
कभी भैंस की पीठ पर,
दूर तालाब पर !
 
धान के हरे खेतो के बीच खोये थे !!
कभी हमने भी.............महुए पिरोये थे !!!
 
कच्ची दहरी के पीछे,
खाई के नीचे !
 
ठंडी रातो मे हम भी पयाल पर सोये थे !!
कभी हमने भी............... महुए पिरोये थे !!!
 
एक दिन हम जो जागे,
गाँव से अपने भागे !
 
सारे सपने ना जाने हमने कहाँ डुबोये थे !!
कभी हमने भी गेहूं की बाली मे महुए पिरोये थे !!!   --”काज़िम” जरवली
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Offline Sajan Murarka

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Re: महुए
« Reply #1 on: October 02, 2012, 12:32:09 AM »
--”काज़िम” साहब जंहा गेहूं की बाली मे महुए पिरोये थे
   सपने जंहा डुबोये थे ,गाँव की यादें नशीली साथ लाये थे
   एक दिन ,वो खट्टे, वो मीठे एहसास लब्ब्जों में पिरोये थे
   तभी तो रातो मे ऐसे कुछ ख्यालों मे खोये थे और रोये थे
   मिट्टी की खुशबु-जूही,चमेली सी मेरे मन को  भिगोये थे
में , मेरी तन्हाई, कुछ बीते लम्हे , कागज के कुछ टुकड़े को समेटे दो पंक्तिया . .