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Author Topic: पाँच सितारा होटल  (Read 789 times)

Offline kazimjarwali

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पाँच सितारा होटल
« on: October 30, 2011, 06:48:49 PM »
याद आती है !!!
बांस की खाट पर बैठी हुई,
टेढ़े सींगो वाली पागुर करती काली बकरी ।।
याद आती है !!!

कच्ची दीवार की ओट से ।
चाँद के चेहरे पर बादल सी मैली ओढ़नी,
पुरानी चाँदी के मैले कंगन की ।।
याद आती है !!!
 
चमचमाते हुये पीतल के बर्तनो की ।
रामदास और दीन मोहम्मद के आँगन की,
दही, राब और लेमू की पत्ती से बने शरबत की ।।
याद आती है !!!


तुम किया सोच रहे हो ?
तुम तो पांच सितारा होटल मै हो !
मै किया जवाब दूँ ???

इन मै से कोई सितारा मेरे काम का नहीं ।
जो मेरे थे,
मेरी पलकों मे बसे हुए हैं ।।
कुछ मेरे गाँव की मिटटी मे रचे बसे हुएं हैं ।।।     --”काज़िम” जरवली
Kazim Jarwali Foundation

Offline shardul

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Re: पाँच सितारा होटल
« Reply #1 on: November 01, 2011, 08:53:21 PM »
bahut khub ...

Offline kazimjarwali

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Re: पाँच सितारा होटल
« Reply #2 on: November 03, 2011, 06:34:32 PM »
Dhanyawad
Kazim Jarwali Foundation

Offline Sajan Murarka

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Re: पाँच सितारा होटल
« Reply #3 on: October 02, 2012, 01:15:48 AM »
पांच सितारा काम का नहीं, जो तेरे थे,मन उससे है मगन।।
मिट्टी की खुशबु- कच्ची दीवार,बांस की खाट, पीतल के बर्तन
पुरानी चाँदी के मैले कंगन,तेरी पलकों मे बसे थे
तभी तो ”काज़िम” ऐसे कुछ ख्यालों मे खोये थे ||
इस गावों के सफ़र मे खूब मजा आया !
में , मेरी तन्हाई, कुछ बीते लम्हे , कागज के कुछ टुकड़े को समेटे दो पंक्तिया . .