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Author Topic: ऊरूज-ए-आदमियत  (Read 744 times)

Offline kazimjarwali

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ऊरूज-ए-आदमियत
« on: October 31, 2011, 08:13:27 PM »
अगर मैं आसमानों की खबर रखता नहीं होता,
ग़ुबार-ए-पाए-गेति मेरा सरमाया नहीं होता ।

ऊरूज-ए-आदमियत है मिज़ाजे ख़ाकसारी मे,
कभी मिटटी का दामन धूल से मैला नहीं होता ।

अगर हम चुप रहे तो चीख्ने चीखने लगती है ख़ामोशी,
किसी सूरत हमारे घर मे सन्नाटा नहीं होता ।

मै एक भटका हुआ अदना मुसाफ़िर, और वो सूरज है,
मेरे साये से उसके क़द का अंदाज़ा नहीं होता ।

हयाते-नौ अता होगी, हमें बे सर तो होने दो,
बहार आने से पहले शाख पर पत्ता नहीं होता ।

हमारी तशनगी सहराओ तक महदूद रह जाती
हमारे पाँव के नीचे अगर दरया नहीं होता ।

सफ़र की सातएंइन आती तो हैं घर तक मगर ”काज़िम”,
कभी हम खुद नहीं होते, कभी रास्ता नहीं होता ।।          --”काज़िम” जरवली
Kazim Jarwali Foundation

Offline shardul

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Re: ऊरूज-ए-आदमियत
« Reply #1 on: November 01, 2011, 08:52:28 PM »

अगर हम चुप रहे तो चीख्ने चीखने लगती है ख़ामोशी,
किसी सूरत हमारे घर मे सन्नाटा नहीं होता ।

मै एक भटका हुआ अदना मुसाफ़िर, और वो सूरज है,
मेरे साये से उसके क़द का अंदाज़ा नहीं होता ।


kya baat kahi hai .. :)

Offline kazimjarwali

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Re: ऊरूज-ए-आदमियत
« Reply #2 on: November 03, 2011, 06:36:01 PM »
Bahut bahut dhanyawad aapka shardul
Kazim Jarwali Foundation

Offline Sajan Murarka

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Re: ऊरूज-ए-आदमियत
« Reply #3 on: October 02, 2012, 01:29:23 AM »
तेरे साये से”काज़िम” तेरे  क़द का अंदाज़ा नहीं होता ।
बहार आने से पहले शाख पर पत्ता नहीं होता ।
मै अदना मुसाफ़िर, तेरी शख्शियत मे और क्या कहता
तभी हम खुद नहीं होते,तभी रास्ता नहीं होता
अगर मैं आसमानों की खबर रखता नहीं होता,
में , मेरी तन्हाई, कुछ बीते लम्हे , कागज के कुछ टुकड़े को समेटे दो पंक्तिया . .