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Author Topic: ग़ुबार-ऐ-आइना  (Read 713 times)

Offline kazimjarwali

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ग़ुबार-ऐ-आइना
« on: November 09, 2011, 12:03:06 AM »

फ़ज़ाए शहर की नब्ज़े खिराम बैठ गयी,
फ़सीले शब पे दीये ले के शाम बैठ गयी ।

वो धूल जिस को हटाया था अपने चेहरे से,
वो आइनों पा पये इन्तेक़ाम बैठ गयी ।
 
गुज़रने वाला है किया रौशनी का शहजादा,
जो बाल खोल के रस्ते मे शाम बैठ गयी ।

मै किस नशेब मे तेरा लहू तलाश करु,
तमाम दश्त पा ख़ाके खयाम बैठ गयी ।

बहुत तवील सफ़र का था अज़्म ऐ ”काज़िम”,
हयात चल के मगर चन्द गाम बैठ गयी ।।     --”काज़िम” जरवली
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Offline Sajan Murarka

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Re: ग़ुबार-ऐ-आइना
« Reply #1 on: October 02, 2012, 01:52:18 AM »
":जो बाल खोल के रस्ते मे शाम बैठ गयी" ।
   फ़सीले शब पे दीये ले के शाम बैठ गयी ।
   मै किस लब्ब्जों मे तेरा इरशाद करु,
   "वाह-वाह " के लिये नये बोल तलाश करु,
में , मेरी तन्हाई, कुछ बीते लम्हे , कागज के कुछ टुकड़े को समेटे दो पंक्तिया . .