!!

Welcome to Kavya Kosh

This is a retired Kavyakosh forum used as an archive. To access new Kavyakosh.Click here

Author Topic: संगे-जब्र  (Read 629 times)

Offline kazimjarwali

  • Newbie
  • *
  • Topic Author
  • Posts: 44
  • Karma: +0/-0
  • Gender: Male
    • Kazim Jarwali
संगे-जब्र
« on: November 09, 2011, 12:04:29 AM »

अपना दिल अब अपने दिल के अन्दर लगता है,
हम को मन्ज़र से अच्छा पस मन्ज़र लगता है ।

बिन ठहरे चलते रहते हैं हाथ, मगर फिर भी,
रात की रोटी तक आने मे दिन भर लगता है ।

ईंटो और गारो से जिनका रिश्ता कोई नहीं,
उनके नाम का दीवारों पर पत्थर लगता है ।

ज़ैसे कुछ होने वाला है थोड़ी देर के बाद,
शहर मे अब रातो को ऐसा अक्सर लगता है ।

उन बूढ़े बच्चो को, लोरी देकर कौन सुलाए,
रात को जिनका घर के बाहर, बिस्तर लगता है ।

बाते गर्म करो तुम लेकिन, ठन्डे लह्जे मे,
उनी कपड़ो मै रेशम का अस्तर लगता है ।

उसको अपने साये मे रक्खे, कैसे कोइ पेड़,
जिसको अपनी परछाई से भी डर लगता है ।

इन चांदी सोने वालो से ”काज़िम” दूर रहो,
इनकी कब्रों पर भी महंगा पत्थर लगता है ।।   --”काज़िम” जरवली
Kazim Jarwali Foundation

Offline Sajan Murarka

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 1834
  • Karma: +1/-1
  • Gender: Male
    • my  blog
Re: संगे-जब्र
« Reply #1 on: October 02, 2012, 01:58:42 AM »
इन चांदी सोने वालो से ”काज़िम” दूर रहो,
इनकी कब्रों पर भी महंगा पत्थर लगता है.....
बहुत खूब ! बेहतरीन !! लाजवाब !!!
में , मेरी तन्हाई, कुछ बीते लम्हे , कागज के कुछ टुकड़े को समेटे दो पंक्तिया . .