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Author Topic: नुक़ूश  (Read 625 times)

Offline kazimjarwali

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नुक़ूश
« on: November 09, 2011, 12:05:28 AM »

बड़े हुनर से समेटे हैं दर-बदर के नुकूश ,
बजाये पाव के चेहरे पा हैं सफ़र के नुक़ूश ।

ये अह्द-ए-नौ के तक़ाज़े, ये कुछ थकी रस्मे,
नये मकान मे जैसे पुराने घर के नुक़ूश ।

हमारे फ़न कि कही भी नहीं है गुंजाईश,
वरक़ वरक़ है किसी साहिबे हुनर के नुक़ूश ।।  --”काज़िम” जरवली
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Offline Sajan Murarka

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Re: नुक़ूश
« Reply #1 on: October 02, 2012, 02:04:49 AM »
कोन कहता आपके फ़न कि कही भी नहीं है गुंजाईश,
बड़े हुनर से समेटे है हर कलम मे ”काज़िम” हुनर के नुक़ूश
में , मेरी तन्हाई, कुछ बीते लम्हे , कागज के कुछ टुकड़े को समेटे दो पंक्तिया . .