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Author Topic: फ़िक्रे-रवां  (Read 1269 times)

Offline kazimjarwali

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फ़िक्रे-रवां
« on: November 09, 2011, 12:07:20 AM »

दुनिया का सफ़र करता हुं मै खुद से निकल कर,
तन्हाई मै खुलते है नए दर मेरे अन्दर ।

एक नूर सा होता है मुनव्वर मेरे अन्दर,
खुलता है सहीफ़ा कोई अक्सर मेरे अन्दर ।

दरियाओं के पानी से मै मरऊब नहीं हुं,
पहले से है मौजूद समन्दर मेरे अन्दर ।

”काज़िम” मै हमेशा से उसी का हुं मुक़्क़लिद,
तबलीग़ कुना है जो पयम्बर मेरे अन्दर ।।   --”काज़िम” जरवली

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Offline Sajan Murarka

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Re: फ़िक्रे-रवां
« Reply #1 on: October 02, 2012, 04:56:27 PM »
एक नूर सा होता है ”काज़िम” आपके  अंदाजे बयां में
पहले से है मौजूद  सोच का समन्दर आपके अन्दर ।
आप वह दरिया हो की कोई प्यासा नहीं जाता
आपकी कलम से खुलते है नये जज्वात मेरे अन्दर ।
में , मेरी तन्हाई, कुछ बीते लम्हे , कागज के कुछ टुकड़े को समेटे दो पंक्तिया . .