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Author Topic: पतझड़ (Patjhad)  (Read 2687 times)

Offline kazimjarwali

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पतझड़ (Patjhad)
« on: November 11, 2011, 10:08:31 PM »
पेड़ों की शाखाए चुप हैं लुटा हुआ श्रृंगार लिए ,
पापी पछुवा के झोंको ने सारे वस्त्र उतार लिए ।

कब से रस्ता देख रहा है पतझड़ से सन्देश कहो ,
पीला पत्ता हरी मुलायम कोंपल का उपहार लिए ।


कितनी जल की धाराओं ने पाँव छुवा और लौट गयीं ,
मैं सागर तट पर बैठा हूँ तृष्णा का अंगार लिए ।


जल पथ पर तूफ़ान खड़े हैं पत्थर की दीवार बने ,
मांझी नौका मे बैठा है एक टूटी पतवार लिए ।


बाहर का है दृश्य कैसा नन्ही चिड़िया भय खाकर ,
छुपी घोंसले मे बैठी है छोटा सा परिवार लिए ।


नेत्रहीन निंद्रा है अपनी क्या देखू क्या ध्यान करूँ ,
घर से रैन चली जाती है सपनो का संसार लिए ।


हे दिनकर हे अम्बर पंथी उज्यारे के दूत ठहर ,
संध्या स्वागत को आयी है अन्धकार का हार लिए ।


कल जिनको घिर्णा थी तेरी रचनाओ से आज वही ,
”काज़िम” तुझको खोज रहे हैं हाथों मे अखबार लिए ।। -- काज़िम जरवली
Kazim Jarwali Foundation

Offline Dr Rakesh Srivastava

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Re: पतझड़ (Patjhad)
« Reply #1 on: November 15, 2011, 10:36:32 PM »
Acchhi rachna hai .

Offline kazimjarwali

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Re: पतझड़ (Patjhad)
« Reply #2 on: November 16, 2011, 03:41:01 AM »
Dhanywaad Rakesh Ji
Kazim Jarwali Foundation

Offline Vishvnand

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Re: पतझड़ (Patjhad)
« Reply #3 on: June 18, 2012, 12:44:35 PM »
बहुत खूब मज़ा आ गया
"हे दिनकर हे अम्बर पंथी उज्यारे के दूत ठहर ,
संध्या स्वागत को आयी है अन्धकार का हार लिए ।"
मनभायी ये सारी रचना "पतझड़" सा यह विषय लिए

Offline Sajan Murarka

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Re: पतझड़ (Patjhad)
« Reply #4 on: August 13, 2012, 04:45:22 AM »
कितनी जल की धाराओं ने पाँव छुवा और लौट गयीं ,
मैं सागर तट पर बैठा हूँ तृष्णा का अंगार लिए ।........
 -- काज़िम जरवली
सच कंहू "इस रचना " को पढ़कर "तृष्णा" सही अर्थ से "अंगार" मय हो जाती है
तेरी रचनाओ से आज वही ,”काज़िम” तुझको खोज रहे हैं हाथों मे अखबार लिए ।।
यथार्थ का चित्रण, मेरा अभिवादन स्वीकार करें

में , मेरी तन्हाई, कुछ बीते लम्हे , कागज के कुछ टुकड़े को समेटे दो पंक्तिया . .