कविता-तेरी ख़ामोशी

“कोशिश तो कि होती हाल-ए-दिल बताने की, हम जान हथेली पर निकाल कर रख देते| ————————————————— हौले से आवाज़ तो दी होती, हम तेरे दर्द को अपना बना लेते|| ————————————————- यूँ ख़ामोश रहने की ज़रूरत न थी, हम खुद तेरी आवाज़ बन जाते| ————————————————– क्या हो गये हम तुम से इतने दूर कि तुम एक आवाज़ भी ना दे पाये|| ————————————————- तेरी आवाज़ सुने लगता हैं ज़माने बित गए, तेरे ऊपर होते देख दुनिया के सितम, हम टूट गए| ————————————————– उठती उगुलियों के बीच इस कदर घिरा होगा तू, आज इन जख्मों से कैसे लड़ा होगा तू| —————————————————— दिल में Continue reading कविता-तेरी ख़ामोशी

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