गीत बनाकर हर गम को मैं गा लूँगा

गीत बनाकर हर गम को मैं गा लूँगा तार-तार दिल में भी मैं स्वर सजा लूँगा। तू नफरत भी ना कर पावेगा मुझसे प्यार के हर बोल से तुझे रिझा लूँगा। राह पर इन बिखरे सारे पत्थरों को चूम चूमकर मैं अब खुदा बना लूँगा। आँसुओं से भिंगोकर हरेक काँटे को बाग में खिलते फूलों-सा बना लूँगा। मंदिर से बाहर तू क्यूँकर भटकेगा आ दिल में मेरे मैं अपना बना लूँगा।                भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

जिन्दगी और मौत

जिन्दगी और मौत मौत से पूछ तो लो कि कब कहाँ ले जावेगी इस अपाहिज जिन्दगी को कैसे ले जायेगी। एक बार तो वाह जरूर इस तरफ आवेगी बटोरकर पुरानी यादें नई दे जावेगी। इन पलकों ने लरजते अश्क रखें है जनम से नमालूम कब तक ये इन्हें यूँ सहलायेगी। न जाने कहाँ ये तूफॉन उड़ा ले जावेगा और कौन सी लहर उस किनारे ले जायेगी। जीवन कब बिगड़ जावेगा, कब सँवर जावेगा नमालूम ये मौत यहाँ कब क्या कर जायेगी। जिन्दगी! अब तू इस मौत के खौफ की ना सोच सहेली है यह तेरी प्यार से ले जायेगी। …. Continue reading जिन्दगी और मौत

आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें

आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। पोंछ पोंछकर सब अश्रूकणों को नव सपनों का निर्माण करें पलकों के आँगन में फिर से हम मुस्कानों का सुन्दर रास रचें। आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। गीतों में अमृत का संचार कर स्वप्न गीत का यूँ श्रंगार करें। युग युग से पीड़ित अपने मन की पीड़ा कंठों की सब दूर करें। आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। तेरी गोदी में सोकर हम सब फिर से सुखद सपन उपजायें जब जागें तो हम सब मिलकर दिव्य स्वप्न सब साकार करें। आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। सपनों में दर्शन तेरा पाकर जग क्रंदन Continue reading आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें

ऐसा दर्द न देना मुझको

ऐसा दर्द न देना मुझको  मैं आँसू बनकर घुल मिट जाऊँ इतना भी निर्धन मत करना मैं धूल कणों में जा छिप जाऊँ। इतनी पीड़ा मत पनपाना मैं काँटों का पलना बन जाऊँ फूलों का गर स्पर्श मिले तो आहत हो मैं पतझर बन जाऊँ। ऐसा दर्द न देना मुझको मैं शाप दर्द का बन पछताऊँ। भूखी इतनी रात न देना मैं करवट करवट चीख न पाऊँ और सुबह की प्रथम किरण में अपनी आँखों कुछ देख न पाऊँ। ऐसा दर्द न देना मुझको मैं बिन मुस्काये ही मर जाऊँ। इतना नाजुक भी मत करना मैं दरक-दीप सा फेंका जाऊँ Continue reading ऐसा दर्द न देना मुझको

खुश्बू की तरह आती है दुआयें भी

खुश्बू की तरह आती है दुआयें भी खुशी की बहार लाती है हवायें भी। यह पहले भी सुना था देर नहीं है जमीं पर बिखरेंगी रब की दुआयें भी। मेरी आँखें ढूँढ रही उसी चाँद को जिसे छिपाये है सावन की घटायें भी। ‘भूख लगी है’ बच्चे आते ही कहेंगे थाल परोसे रखती हैं मातायें भी। कैद हो या जमाने की कालकोठरी सभी को सहन करनी होगी सतायें भी। बच्चों की हर खुशी में महक होती है महक नहीं रखती है बूढ़ी अदायें भी।                       … भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

मुझको भुलाना तुम्हें भी खलता रहेगा

मुझको भुलाना तुम्हें भी खलता रहेगा आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आँसुओं को भी गुदगुदाने का मन करता है। गोद में माँ अब सो जाने का मन करता है। आँचल में छिप खिलखिलाने का मन करता है। याद में तेरी खो जाने का मन करता है। जीवन में फिर मुस्कराने का मन करता है। मचल रही हैं यादों की लहरें अनवरत अब इसी सागर में रम जाने का मन करता है। पंखुरियाँ यादों की अभी तक झरी नहीं हैं जीवन को और महकाने का मन करता है। पंख फैलाये Continue reading मुझको भुलाना तुम्हें भी खलता रहेगा

कोई तो बताये वो कैसे यहाँ आया था

कोई तो बताये वो कैसे यहाँ आया था मेरा मुकद्दर सहसा बदलने यहाँ आया था।   कितना खामोश, तन्हा, उदास दिख रहा है वो ना मालूम किस-किससे मिलके यहाँ आया था।   कितना अजीब चिराग है बुझाये बुझता नहीं वो किस अँधेरे से गुजरके यहाँ आया था।   इस राह की धूल पावों को जलाने लगी है किसका दहकता जिगर टहलने यहाँ आया था।   मेरी ही आवाज का झोंका मुझे रुला गया है ना जाने किस दर्द को छूके यहाँ आया था।           ….  भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है।

आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आँसुओं को भी गुदगुदाने का मन करता है।   गोद में माँ अब सो जाने का मन करता है। आँचल में छिप खिलखिलाने का मन करता है।   याद में तेरी खो जाने का मन करता है। जीवन में फिर मुस्कराने का मन करता है।   मचल रही हैं यादों की लहरें अनवरत अब इसी सागर में रम जाने का मन करता है।   पंखुरियाँ यादों की अभी तक झरी नहीं हैं जीवन को और महकाने का मन करता है।   पंख फैलाये थे जिस ममता के आँगन में आज वहीं पर Continue reading आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है।

बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को

बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को कर गया वो पराया अपने घरों को।   कहाँ तक उड़े चले जाते हैं देखें आस्मां मिला है टूटे हुए परों को।   बहा है लहू किसके सरों का, देखो उठाकर फेंके हुए इन पत्थरों को।   क्या पता कि वोह सोया भी था कि नहीं छोड़ गया है वो गूँगे बिस्तरों को।   बहुत लहूलुहान हो गया है बिचारा समझाये कोई तो अब ठोकरों को।   ये कलियाँ शबनम भरी सिसकती रहीं कहीं काँटे ना चुभ जायें भ्रमरों को।   वोह मुस्कान तेरे लबों को छूकर चूम चूम जाती है मेरे अधरों को।                    …. Continue reading बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को

महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को

महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को बिखर भी जाने दो महकते गजरों को।   नशा पीने में नहीं, पिलाने में भी है गौर से तो देख, साकी की नजरों में।   हादसा था वोह नाजुक से प्यार का पर दहला गया है सारे शहरों को।   कातिल न था वो बस रखने आया था मेरे सीने में अपने खंजरों को।   लजा जाता है अक्स भी आईने का झुका लेता है वो अपनी नजरों को।   लौट आने की चाहत में अपने घर खड़खड़ाता रहा वो तमाम घरों को।   उठी थी इक चिन्गारी दमन की मगर जलाती गई Continue reading महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को

लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं

लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं हम इसे साये-मौत की दिल्लगी कहते हैं।   ये छलकते जाम भी इक साज से होते हैं हम प्यासे इसे महकती बंदगी कहते हैं।   इस घर के सामने बेघरों की जो भीड़ है वे ही इसके मलबे को गंदगी कहते हैं।   ये चिथड़ा कमीज, ये फटी नीकर कुछ तो है इस गरीबी को लोग तो सादगी कहते हैं।   बासी रोटी से उठती भूख की खश्बू को गरीब बच्चे बेचारे ताजगी कहते हैं।   गरीब की झोपड़ी जलाकर खाक कर देना हरेक मजहब इसी को दरिंदगी कहते हैं। ……    भूपेन्द्र Continue reading लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं

मुझसे मेरी जिन्दगी खफा हो गई

मुझसे मेरी जिन्दगी खफा हो गई मौत को गले लगाकर फना हो गई।   मैं नमपलकों से उसे देखता रहा सुलगती जिन्दगी कब धुँआ हो गई।   चिड़िया जब हथेली पे आकर बैठी डूबती जिन्दगी भी खुशनूमा हो गई।   हमारी तकदीर एक जैसी ही थी हम जुदा हुए तकदीर जुदा हो गई।   उसकी दुआ का असर भी देख ले यार तुम्हारी हर बद्दुआ  दुआ हो गई।   एक आखरी साँस की तलाश जो थी जवानी भी रुख बदलकर जरा हो गई। …  भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

मेरे गीतों को वर दे

मेरे  गीतों  को  वर दे हर अक्षर में सुर भर दे।   चलता था जिस पथरेखा पर वो भी लुप्त हो चली नयन  से अब  राही क्या बन पाऊँगा मिट जाऊँगा कंकण कण में   निज अस्तित्व बना रखने ही पड़ा  रहूँ   मैं  तेरे  दर पे मेरे  गीतों   को   वर   दे हर  अक्षर  में  सुर भर दे।   फटा-पुराना   तन  है  मेरा ये वस्त्र  कभी  के तार  हुए जीवन है इक जीर्ण कफन-सा जिसे  ओढ़ हम  बेकार  हुए   अब  जो  चेतनता  है  मुझमें उसमें ही अब कुछ लय भर दे मेरे   गीतों   को    वर  दे हर  अक्षर  में  सुर  Continue reading मेरे गीतों को वर दे

वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो

वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो मंदिरो-मस्जिद में भी तुम कहाँ रहते हो। साया ना कहीं दिखा धूप में चलते रहे आग लगा रखी थी तुमने जहाँ रहते हो। मैं ख्वाब के पर्दे रात भर हटाता रहा देखा पसेपर्दा भी तुम कहाँ रहते हो। हल्का नशा था, मगर लहू खौल उठता था जब कभी साकी पूछता ‘तुम कहाँ रहते हो’। क्या मालूम कि मेरा दिल अब कहाँ रहता है अब तो वहीं रहता है तुम जहाँ रहते हो। हमसे यूँ जुदा होकर तुम कहाँ रहते हो वो महफिल बता दो तुम जहाँ रहते हो। तुम्हारी ही यादों में Continue reading वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो

वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी

वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी फुटपाथ पर वही आ गया तो धरती हिलती थी।   मेरा नाम आया तो उनकी जुबाँ कँपती थी जाम कँपते थे, सुराही में मैकशी हिलती थी।   कल भी आया चाँद कुछ वैसी ही चाँदनी लिये जो नमपलकों को सहलाती चूमती हिलती थी।   घर नया था, हर दरो-दीवार नई नई थी पर यादों में चरमराती इक खिड़की हिलती थी।   माना कि जिन्दगी गजल की कच्ची किताब थी खामोश लबों पर फिर भी हर शायरी हिलती थी। ….. भूपेन्द्र कुमार दवे 00000