मेरे अंतः की आशायें

मेरे अंतः की आशायें हरदम किलकारी भरती हैं। मैं धूल बनूँ या फूल बनूँ बिखराव तपन-सी रहती है सुनसान अंधेरे पथ पर भी कुछ घड़कन दिल की बढ़ती है। पर आशा की लहरें तब भी चंचल मन में आ बसती हैं। मेरे अंतः की आशायें हरदम किलकारी भरती हैं। तुमसे हटकर दूर चलूँ तो सफर विकट-सा बन जाता है और अकेला निकल पडूँ तो पथ अनजाना बन जाता है। पर इन घड़ियों में भी आशा तेरा रूप लिये रहती है। मेरे अंतः की आशायें हरदम किलकारी भरती हैं। मैं तट पर जा लहरें गिनता भूल गया था साँसें गिनना क्रोध Continue reading मेरे अंतः की आशायें

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जिन्दगी क्या है

जिन्दगी क्या है जिन्दगी क्या है यह तो वक्त बताता है इसका मकसद भी वक्त बदलता जाता है।   जो मुहब्बत जताता है मुकर जाता है जो मुहब्बत करता है हरदम निभाता है।   तूफाँ का उठाकर किनारे फेंक देना जिन्दगी का अजीब नजारा दिखाता है।   जिन्दगी उम्मीद का एक पैमाना है जब दरक जाता है तो अश्क बहाता है।   जिन्दगी जब भी मौत से डरने लगती है डर हर इक साँस को रोककर डराता है।               ——    भूपेन्द्र कुमार दवे                00000

थकी प्रार्थना

थकी प्रार्थना थक गई प्रार्थना हो निष्फल सो गई साधना पूर्ण विफल अब क्यूँकर दीप जले निश्चल अब क्या मंदिर में पैर धरू? अब किस दर्शन की आस करूँ अब किस मधु से विषघट भर लूँ? सभी आस निरास बन बैठी सुख की घड़ियाँ पीड़ा में ऐंठी मिली न वरदानों की लाठी अब किसको माला गुँथकर दूँ? अब किस दर्शन की आस करूँ अब किस मधु से विषघट भर लूँ? आँसू अब मुझसे शरमाते पलको में आ थम थम जाते पीड़ित मन भी कहता जावे कितने दुख को अपना समझूँ? अब किस दर्शन की आस करूँ अब किस मधु से Continue reading थकी प्रार्थना

तू मौजे-शराब तो पैमाना हूँ मैं

तू मौजे-शराब तो पैमाना हूँ मैं तू मौजे-शराब तो पैमाना हूँ मैं गम आगोश लिया मस्त मैखाना हूँ मैं। तू अक्स और तेरा आईना हूँ मैं तेरे फेंके पत्थर का निशाना हूँ मैं। तू ही गम है मेरी मस्ती भी है तू इन्हीं बातों का हुआ दीवाना हूँ मैं। अब क्यूँ धुँआँ देती है तू ए शमा तूने जिसे जलाया वो परवाना हूँ मैं। गम भुलाने जो हरसू याद किया जावे वो ही जश्ने-गम का अफसाना हूँ मैं। बस पा सका हूँ कुछ ऐसी जिन्दगी मौत का बना हुआ इक नजराना हूँ मैं। ….. भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

मुक्तक- तू और मैं

मुक्तक — तू  और मैं  तू आगे आगे था तूने पलटकर नहीं देखा तेरे पीछे मैं था तूने पलटकर नहीं देखा। तेरे पीछे किसका लहूलुहान नक्शे-कदम था तेरा था या मेरा तूने पलटकर नहीं देखा।               ——   भूपेन्द्र कुमार दवे              00000

मुक्तक — भारत माँ

मुक्तक — भारत माँ वह बूढ़ी है मगर परी सुन्दर-सी लगती है वह गाँव में रहती है पर शहर-सी लगती है। जिसके पास दौड़ बच्चे सभी चहचहाते हैं वह चिड़िया के प्यारे सब्ज शजर-सी लगती है। ——  भूपेन्द्र कुमार दवे               00000

मुझपर मेरे गुनाहों का सेहरा रहने दो

मुझपर मेरे गुनाहों का सेहरा रहने दो मेरे चेहरे पर मेरा ही चेहरा रहने दो जब तक खुद वो अपने गुनाह ना कबूल करे तुम इन गवाहों को गूंगा बहरा रहने दो कितनी मिन्नतों के बाद ये बहार आयी है अब मौसम न बदले हवा का पहरा रहने दो वो बूढ़ा शजर चिड़ियों का बड़ा प्यारा है अब के खिजां में कुछ पत्तों को हरा रहने दो गूंगे बहरे का एहसास जरा न होने दो होठों पर सन्नाटा तुम भी गहरा रहने दो मेरी मां के आंसू अब और न बहने दो मेरी फोटो पर गुनाह का कुहरा रहने दो Continue reading मुझपर मेरे गुनाहों का सेहरा रहने दो

गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार

गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार वरना तेरी वीणा पर मेरा क्या अधिकार।   मौन कंठ है, मौन अश्रू हैं गुमसुम है सब सूनापन भी गीत अधूरा, बोल अछूता बुझा-बुझा-सा है तन मन भी।   मधु की बूँदें बनकर जब बरसें अश्रू अपार अधरों पर तब खिलता है शब्दों का श्रंगार गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार   तूफानों में चलने आतुर बोल गीत के मचला करते लहरों से भी टकराने की अर्थ गीत में उछला करते।   नैया दुख की हो जिसकी हो पीड़ा पतवार सुन सकता Continue reading गाता हूँ जब भी होती पीड़ा की झंकार

चलो आज फिर दिल को मनाया जावे

चलो आज फिर दिल को मनाया जावे चलो आज फिर दिल को मनाया जावे यादों की  किश्ती को  सजाया  जावे।   यूँ  नंगे बदन  कब तक  चलोगे, यारों चलो फिर किसी का कफन चुराया जावे।   इस शहर को और भी सजाया जाये हर लाश को चौक पे  बिठाया जाये।   यह गुजरात है यहाँ क्या किया जाये मैकदा  अब घर को ही बनाया जाये।   जला दिया जाता है हर घोंसला यहाँ क्यूँ  न इस चमन को जलाया जाये।   पढ़कर गजल बहुत जो रोना आ गया क्यूँ  ना  इसे अश्क से  मिटाया जाये।   पर- शिकस्ता हूँ  यह Continue reading चलो आज फिर दिल को मनाया जावे

छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर

छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।   कँप कँप लहरें उठती जाती हर छंद बद्ध के मंथन की गीतों में उठती जाती है हर छवि तेरे दर्शन की।   ज्यों कंपित कंठों में राग छिपा है सुन्दर मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।   नभ में उड़ते खगगण सारे करते हैं नवगीत तरंगित इससे मौन-हृदय में होती गीतों की हर रचना मुखरित।   जैसे सुख-दुख छिप जाते हैं मेरे अंदर मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।   छिप जाती सीपी सागर में मोती भी सीपी के अन्दर वैसे छिपते Continue reading छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर

तिनके बताते हैं मेरा आशियां यहीं था

तिनके बताते हैं मेरा आशियां यहीं था तिनके बताते हैं मेरा आशियां यहीं था जिसपे नाज था मुझको वो गुलिस्तां यहीं था   ना हो यकीं तो उठती लहरों से पूछ लो मेरी किश्ती यहीं थी और तूफां यहीं था   खुशबू मेरे अश्क की आती है यहीं से मैं पीता था जहां बैठ वो मैकदां यहीं था   ये अंधेरा नहीं  नूर-ए-मजार-ए-उजाला है बुझे थे चिराग यहीं पे उठा धुआं यहीं था   गुल खिले अदा के यहीं वफा की खुशबू लिये इश्क बागवां यहीं था हुस्न शादवां यहीं था   फुटपाथ पर पड़ी लावारिश लाश मेरी थी ये Continue reading तिनके बताते हैं मेरा आशियां यहीं था

मेरे गीतों की बगिया में

मेरे गीतों की बगिया में मेरे गीतों की बगिया में तू बसंत-रुत बन खेला था। सत रंगी फूलों से सुर ले तू रचता जीवन मेला था। राग-रागिनी पूर्ण हुई जब अंतिम गीतों की बारी थी तू पतझर बनकर आ बैठा जब महकी यह फुलवारी थी। तोड़ गया तू उस डाली को जिस पर मेरा डेरा था मेरे गीतों की बगिया में तू बसंत-रुत बन खेला था। सोचा था तू खगवृन्दों का गीत सुरीला बन आवेगा गूँज उठेगा गीत बाग में सुर जब मेरा सध जावेगा। सुप्त हुआ पर भक्ति भाव जो तेरी वीणा से जागा था। मेरे गीतों की बगिया Continue reading मेरे गीतों की बगिया में

भक्ति मेरी है, शक्ति तेरी

भक्ति मेरी है, शक्ति तेरी भक्ति  मेरी है,  शक्ति तेरी फिर क्यूँ मैं तुझको बिसराऊँ तृप्ति-सिन्धु  है  मंदिर  तेरा फिर क्यूँ मैं प्यासा रह जाऊँ?   मुझको  भूल गया  फिर भी तेरा  साया  मैं   पाता  हूँ हर   खामोशी  सन्नाटे  में धड़कन अपनी सुन पाता हूँ   देख   देखकर  तेरी  मूरत क्यूँ ना  दर्शन-प्यास बुझाऊँ भक्ति  मेरी है,  शक्ति तेरी फिर क्यूँ मैं तुझको बिसराऊँ?   रही  न अब पतवार हमारी आँधी  औ  तूफान क्षणों में तू ही तो इन निष्ठुर पल में स्फूर्ति  जगाता था  प्राणों में   अब  क्यूँ ना मैं तुझे पुकारूँ क्यूँ न  शरण में  तेरी जाऊँ Continue reading भक्ति मेरी है, शक्ति तेरी

इक बार तो मेरी बात पर भी विश्वास करो

इक बार इक बार तो मेरी बात पर भी विश्वास करो हर इक दिल में खुदा है इसका अहसास करो।   इनसे ही घोंसला मेरा घर भी आबाद है ये चिड़ियाँ चहकती हैं इन्हें न उदास करो।   नन्हीं सी ख्वाईश है इक तुम्हें पाने की पर तुम्हीं कह रहे ये आस बेलिबास करो।   कहते हैं तुम कैद हो हर इक बुतखाने में मैं तो तुममें हूँ,  खत्म ये कारावास करो।   तुम्हें भूलकर अब मैं और किसका नाम जपूँ तुम भी नाम बदलकर लब न बेमिठास करो।   कच्ची गागर समझ इस दिल को न खाली रखो जनम Continue reading इक बार तो मेरी बात पर भी विश्वास करो

सुख की घड़ियाँ जाने कितनी

सुख की घड़ियाँ जाने कितनी सुख की घड़ियाँ जाने कितनी उद्वेलित   होकर  आती  हैं। जीवन-गाथा  के  पन्नों  पर शुभाषीश  खुद लिख जाती हैं।   सपने  सुन्दर सहज सलोने आशा की आभा में सजकर नयनों के  पलनों में  भोले ममता की गुदड़ी में छिपकर   लेकर आते सुख  की घड़ियाँ जो  रूप नया  दे  जाती हैं सुख की घड़ियाँ जाने कितनी उद्वेलित   होकर  आती  हैं।   कुछ अनुभव की अनुपम आभा जीवन  के  आँगन  में  फैली खेल  खिलाती  सहस्र रश्मियाँ उतरी  हों  तन मन में  जैसी   मीठे मीठे  क्षण  जीवन  के स्वयं साथ वो ले  आती  हैं सुख की घड़ियाँ Continue reading सुख की घड़ियाँ जाने कितनी