ऐसा लगता है जैसे मैंने कुछ जीना सीख लिया है

ऐसा लगता है जैसे मैंने कुछ जीना सीख लिया है जीवन की मधुप्याली में अब अमृत भरना सीख लिया है।   अपनी पीड़ा सहते सहते ऊब गया तो तब फिर मैंने जीवन पथ पर चलते चलते व्यथा जगत की जानी मैंने था पीड़ा का विस्तार अनंत अपनाकर दुख-दर्द सभी का कुछ क्षण जीना सीख लिया है जीवन की मधुप्याली में अब अमृत भरना सीख लिया है।   हाथ पकड़कर प्रभु का मैंने सीखा बिन बैसाखी चलना सीख लिया तब उनसे मैंने औरों की भी पीड़ा हरना चल पड़ा तभी से सबके संग खुद बैसाखी बन औरों की मंजिल पाना सीख Continue reading ऐसा लगता है जैसे मैंने कुछ जीना सीख लिया है

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कैसे कह दूँ

कैसे कह दूँ मैंने जग देखा है जगजीवन देखा है? मैंने तो बस महलों के अंदर देखा है सबकी आँखों अश्क नहीं शबनम देखा है। परदों के पीछे परदों का मंजर देखा है मधुकलशों में यौवन का दमखम देखा है। कैसे कह दूँ मैंने सुख का दुख का आलिंगन देखा है? चमन फूल कलियों की बस खुश्बू समझी है काँटों बिंधी तितली की तड़प नहीं देखी है। चहकती चिड़िया की भी गुफ्तगू समझी है हर पिजरे में पलती कसक नहीं देखी है। कैसे कह दूँ मैंने कोलाहल में सूनापन देखा है? मैंने बस पायल की थिरकन देखी है थककर थमते Continue reading कैसे कह दूँ

यह देश हमारा कर्मक्षेत्र है

यह देश हमारा कर्मक्षेत्र है यह देश हमारा कर्मक्षेत्र है ईश्वर के सब अवतारों का। इसने ही दिया है धर्म जगत को सुसंस्कृति और संस्कारों का । इसके ग्रंथों ने सबसे पहले हर मानव को श्रेष्ठ बताया है सारे जग को एक सूत्र में बँध बस सूत्र प्रेम का सिखलाया है। इसके कारण ही मानवता का मुकुट सजा है अधिकारों का। यह देश हमारा कर्मक्षेत्र है ईश्वर के सब अवतारों का। सत्य अहिंसा का पथ इक सुन्दर इसके मंत्रों में दिख जाता है और निडर हो पथ पर चलना भी यह धर्म सभी का बन जाता है। यह संग्रह है Continue reading यह देश हमारा कर्मक्षेत्र है

हे प्रभू

हे प्रभू तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो (ईश्वर निराकार है फिर भी कविता विनंती करती है कि हे ईश्वर! तुमने जो अनुपम सौंदर्य इस सृष्टि को दिया है उससे श्रंगार कर अवतरित हो ताकि हमारा तुम्हारे प्रति प्रेम और भी प्रगाढ़ हो सके।) हे प्रभू! तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो।   देखो, कलियाँ ओसकण में शरमा रही हैं पंखुड़ियाँ भोले भ्रमर को तरसा रही हैं झूल डालियाँ उन्माद में लहरा रही हैं पराग चूम सुरभि पवन को बहका रही हैं।   सृष्टि का यह प्रकट प्रेम भी स्वीकार कर लो। हे प्रभू! तुम भी Continue reading हे प्रभू

न चहकते रहे न महकते रहे हैं हम

न चहकते रहे न महकते रहे हैं हम तलाश में तेरी भटकते रहे हैं हम।   न किनारा अपना न किश्ती रही अपनी तूफाँ से यूँ ही उलझते रहे हैं हम।   खुली जिल्द की सी किताब रही जिन्दगी खुले पन्नों तरह बिखरते रहे हैं हम।   पूछा सच्चे दिल से तो दिल ने कहा सुलझते सुलझते उलझते रहे हैं हम।   ख्याल में होती रही हर साँस की हार शुष्क पत्तों तरह बिखरते रहे हैं हम।   कभी तो आयेंगे वो मेरी कब्र पर यही सोच के बस मचलतेे रहे हैं हम। ——- भूपेन्द्र कुमार दवे           00000

हृदय हमारा फुलवारी है

हृदय हमारा फुलवारी है हृदय हमारा फुलवारी है फूल हमारे सत्गुण हैं। काँटे जैसे चुभते सबको वो कहलाते अवगुण हैं।   रंग हमारा अलग अलग है महक सभी मनमोहक है हर कलियों को छूकर देखो कोमल सबका तन मन है।   चुन चुनकर सुन्दर फूलों को जब कर्म हमारे गुँथते हैं कर्म हमारे अंतर्मन का सृजन हमेशा करते हैं।   धर्म कर्म के इन फूलों से माला मोहक बनती है इसे समर्पित तुझको करके श्रद्धा प्यारी जगती है। तुझे नमन करने हम सब जन हृदय सजाया करते हैं और स्मरण जब तेरा करते अवगुण सत्गुण बनते हैं।   तेरी मूरत Continue reading हृदय हमारा फुलवारी है

मेरे गीतों के आँचल में

मेरे गीतों के आँचल में मेरे गीतों के आँचल में नटखट सुर कुछ आ जाने दो लहरों का कंपन स्पंदन भी सागर में जा मिलने दो।   हो प्रभात भी सुखकर ऐसा कलरव करते खगगण जैसा और किरण की मादकता भी ओस कणों में छा जाने दो।   निर्जन वन में कूक रहे जो उनकी गुंजन मिल जाने दो मेरे गीतों के आँचल में नटखट सुर कुछ आ जाने दो   ओम् शब्द की प्रतिध्वनि प्रखर करे शब्द का उद्घोष अमर और गीत जब जब गूँजे तो जग जीवन मुखरित होने दो।   माटी के नश्वर पुतलों को मानवता से Continue reading मेरे गीतों के आँचल में

सन्नाटे में छिप जाती है

सन्नाटे में छिप जाती है सन्नाटे में छिप जाती है हर पीड़ा की आवाज कहीं। इसको सुनने जो कतराते उनको होती है लाज नहीं।   इस कारण जब ठोकर खायी इस पीड़ा ने तब उफ् न किया पथ के पत्थर चूम चूमकर घायल पथ का श्रंगार किया।   कहने को थी आगे मंजिल पर रुकने का साहस न मिला। नम पलकों से आँखों ने भी हर आँसू का संहार किया।   अधरों था अंकुश पीड़ा का खोल सका ना मन राज कहीं। सन्नाटे में छिप जाती है हर पीड़ा की आवाज कहीं।   काँटे हर पीड़ा के चुनके स्वप्न नीड़ Continue reading सन्नाटे में छिप जाती है

सच, तेरे बिन मैं कुछ ना होता

सच, तेरे बिन मैं कुछ ना होता गर तू पतवार न बनता मैं क्यू नैया लेकर आता इस आँधी में तू ही आया मेरी नैया पार लगाया लहरें आती हँसती जाती औ उदास मैं होता रहता   निर्जीव नाव लिया हुआ ही मैं बस बीच भँवर में तड़पा होता। सच, तेरे बिन मैं कुछ ना होता।   गर तू जग से रूठा होता निष्ठुर बनकर बैठा होता कौन पूछता तुझे जगत में कौन तुम्हारी पूजा करता यही जानकर मैं तुझको यह पतवार हठीली दे आया   तब तेरे बिन लाचार बना मैं बस बैठ किनारे लहरें गिनता। सच, तेरे बिन Continue reading सच, तेरे बिन मैं कुछ ना होता

आ रही हैं याद सारी

आ रही हैं याद सारी आ रही हैं याद सारी मुस्कराती हुई गेसुओं में छिपे चाँद-सी अकुलाती हुई।   छिप रही हों ओस में जैसे कली सी झाँकती हों सपन में प्यारी छवि सी सुबह अलसायी अधखुली पंखुरियों सी चूमकर उड़ती हुई कुछ तितलियों सी   सभी हैं याद मधुमास को सहलाती हुई अंगड़ाईयाँ लेती कुछ अलसायी हुई आ रही हैं याद सारी मुस्कराती हुई।   सिराहने बैठ मृदु स्पर्श करती हुई चेतना का श्रंगार बस करती हुई हर बात प्रणय का मुखरित करती हुई कुलबुलाती याद उर में भरती हुई   आ रही प्रेम बंधन में कसमसाती हुई बात Continue reading आ रही हैं याद सारी

हृदय हमारा रचकर तूने

हृदय हमारा रचकर तूने उफ् यह क्या से क्या कर डाला कोमल भाव भरे थे इसमें कलश अश्रू से ही भर डाला।   तूने तो सारा विष पीकर बूँदें इसमें छलका दी हैं धीरे धीरे मेरी काया कलुषित भावों से भर दी हैं     मैं भक्ति-भाव कैसे उर के कूट कूटकर भर सकता हूँ तूने तो कुछ बूँदों से ही यह विषमय पूरा कर डाला।   सासें हैं फुफकार बनी-सी जहर उगलती हैं बस प्रतिक्षण और जहर से जहर सरीखे भाव  उमड़ते हैं बस हर क्षण   सोता हूँ ज्यों चिरनिद्रा में ऐसा है मुझको कर डाला हृदय हमारा Continue reading हृदय हमारा रचकर तूने

मैं दीप हूँ मुझे रोशन रखो

मैं दीप हूँ मुझे रोशन रखो अपने करीब उजाला मन रखो।   जलने बुझने का खेल अजब है जिन्दगी को इसी में मगन रखो।   दुआ होती है बूँद नूर की जिगर में उम्मीद की किरन रखो।   सीखना तो परिंदों से सीखो उड़ान जितना, ऊँचा गगन रखो।   आखरी साँस तक ही जीना है जीवन में जीने की तपन रखो।   चलो तो बस खुदा की राह चलो चिराग उसी के दम रोशन रखो।   ——- भूपेन्द्र कुमार दवे           00000

जिन्दगी

जिन्दगी  कभी अपनी, कभी बेगानी कभी अनजान-सी लगती है जिन्दगी। जानी पहचानी दुनिया में नित नव रूप लिये मिलती है जिन्दगी।   बचपन में अनाथ-सी बेबस जवानी में ठगी मिलती है जिन्दगी। बूड़ी साँसों की खाई में लहूलुहान हुई दिखती है जिन्दगी।   चुभती हैं बेरहम साँस तो बड़ी छटपटाती मिलती है जिन्दगी। लड़खड़ाती, डगमगाती-सी बैसाखी थामे चलती है जिन्दगी।   समय सहम जाता है जब भी अंतिम साँस को तरसती है जिन्दगी कभी अपनी, कभी बेगानी कभी अनजान-सी लगती है जिन्दगी।   मीठी] तीखी कभी कसैली जहर उगलती लगती है जिन्दगी। कभी गरीबी में शर्माती कभी गरीबों पर अकड़ती Continue reading जिन्दगी

मेरे अंतः की आशायें

मेरे अंतः की आशायें हरदम किलकारी भरती हैं। मैं धूल बनूँ या फूल बनूँ बिखराव तपन-सी रहती है सुनसान अंधेरे पथ पर भी कुछ घड़कन दिल की बढ़ती है। पर आशा की लहरें तब भी चंचल मन में आ बसती हैं। मेरे अंतः की आशायें हरदम किलकारी भरती हैं। तुमसे हटकर दूर चलूँ तो सफर विकट-सा बन जाता है और अकेला निकल पडूँ तो पथ अनजाना बन जाता है। पर इन घड़ियों में भी आशा तेरा रूप लिये रहती है। मेरे अंतः की आशायें हरदम किलकारी भरती हैं। मैं तट पर जा लहरें गिनता भूल गया था साँसें गिनना क्रोध Continue reading मेरे अंतः की आशायें

जिन्दगी क्या है

जिन्दगी क्या है जिन्दगी क्या है यह तो वक्त बताता है इसका मकसद भी वक्त बदलता जाता है।   जो मुहब्बत जताता है मुकर जाता है जो मुहब्बत करता है हरदम निभाता है।   तूफाँ का उठाकर किनारे फेंक देना जिन्दगी का अजीब नजारा दिखाता है।   जिन्दगी उम्मीद का एक पैमाना है जब दरक जाता है तो अश्क बहाता है।   जिन्दगी जब भी मौत से डरने लगती है डर हर इक साँस को रोककर डराता है।               ——    भूपेन्द्र कुमार दवे                00000