ऐ खुदा मुझे दवा और दुआ कुछ न दे

ऐ खुदा मुझे दवा और दुआ कुछ न दे दे सके तो अपनी मुस्कान की कतरन दे।   इक बहाना चाहिये था मंदिर आने का शुक्र है तूने दर्द दिया दवा अब न दे।   मौत तो सबको दी है ये मैं जानता हूँ पर मुझ गरीब को लाकर कहीं से कफन दे।   अंधे सभी हैं जिन्हें दिखाई नहीं देता पर मुझे ले चल जहाँ तू दिखाई न दे।   ये जख्मो-दाग मुझे तोहफे में मिले हैं अब मुझे खुश रखने ये सजाऐं और न दे।                            Continue reading ऐ खुदा मुझे दवा और दुआ कुछ न दे

मुझे देखकर तुम (युगल गीत)

मुझे देखकर तुम (युगल गीत)   गायक “मुझे देखकर तुम मुस्कराती दिखी हो मोहब्बत के गजरे सजाती मिली हो।“ गायिका “मुझे देखकर तुम मुस्कराते दिखे हो शरारत के जल्वे दिखाते मिले हो।“ गायक “मुझे देखकर तुम मुस्कराती दिखी हो सभी सपने सुहाने सजाती मिली हो। अब सृजन प्यार का कुछ होने लगेगा बिन पिये नशा सा भी छाने लगेगा।“ गायिका “मुझे देखकर तुम मुस्कराते दिखे हो तुम भ्रमरों के गुंजन सुनाते मिले हो। अब बगिया में बहार आती मिलेगी महक फूलों की गुदगुदाती मिलेगी।“ गायक “इजाजत मिली है अब तुमसे हमी को महकते मिलन की मुस्काती हमी को।“ गायिका “अब Continue reading मुझे देखकर तुम (युगल गीत)

सपनों की महक

 सपनों की महक फूल  की गंध कभी भटकती नहीं है सपनों की महक कभी दबती नहीं है।   नींद करवटें चाहे बदला करे अचेतन हो नयन भी सोया करे। स्वच्छ चंचल चाँदनी-सी रात में मायूस मन भी भ्रमण करता रहे।   महक सपनों की कभी मिटती नहीं है। फूल  की गंध कभी भटकती नहीं है सपनों की महक कभी दबती नहीं है।   अश्रू चाहे जितना श्रंगार कर ले घूँघट पलक के हटा रोया करे। या धधकता हृदय अंगार बनकर राख का कफन ओढ़े सिसका करे।   पर स्वप्न-जागी आस मिटती नहीं है। फूल  की गंध कभी भटकती नहीं है Continue reading सपनों की महक

कदम दो कदम इक साथ चलो तो बेहतर है

कदम दो कदम इक साथ चलो तो बेहतर है मधुर मीठी बातें भी करो तो बेहतर है।   खोजने सकून चले हो अँधरी बस्ती में चिराग जलाकर साथ रखो तो बेहतर है।   पहले कभी जो हौले से गुदगुदाती थी मुस्कराहट वही बिखराओ तो बेहतर है।   प्यास बुझाना अब पनघट के बस में नहीं है कुछ अश्कों को थिरकने दो तो बेहतर है।   कहानी अधूरी है कविता पूरी नहीं होती ढाई अक्षर प्रेम के गुनगुनाओ तो बेहतर है।   स्तब्ध मौन की सी ये थमती हुई साँसें हैं कुछ धड़कनों के साथ भी लो तो बेहतर है। …भूपेन्द्र Continue reading कदम दो कदम इक साथ चलो तो बेहतर है

पीड़ा के पलने पर पलता

पीड़ा के पलने पर पलता प्यार नहीं था पछताता। आँसू भी आँखों में आकर नहीं सिसकने अकुलाता। मुस्कानें मुस्काती दिखती जब मिलती थीं मुस्कानों से यादों की झुरमुट में छिपकर मिलते थे प्रियजन अपनों से। पर पलकों के पीछे आँसू कुछ भी कह नहीं था पाता। पीड़ा के पलने पर पलता प्यार नहीं था पछताता। जाने कितनी मीठी बातें प्यार प्यार से बतियाता था हँसता था, मुस्काता रहता पर मन ही मन शर्माता था। प्यारी छवि तब प्रेमभाव की देख हृदय था हर्षाता। पीड़ा के पलने पर पलता प्यार नहीं था पछताता। हम थे और सफर था अपना पथ के Continue reading पीड़ा के पलने पर पलता

मुझ संग अगर तुम गावो तो

मुझ संग अगर तुम गावो तो यह गीत अकेला मैं गाऊँ तो यह मात्र प्रार्थना कहलावेगा। मुझ संग अगर तुम गावो तो यह गीत अमरत्व पा जावेगा। मेरी प्रार्थना तू सुने न सुने यह तेरी इच्छा पर निर्भर है। पर मेरे गीत का अमरत्व तो तेरे स्वर-संगम पर निर्भर है। मुझ संग अगर तुम गावो तो यह गीत अमरत्व पा जावेगा। तेरे कारण बादल तब आकर नभ गीतों से गुंजित कर देंगे। रह रहकर बिजली के कंपन से गीतों के स्वर-लय चपल बनेंगे। मुझ संग अगर तुम गावो तो यह गीत अमरत्व पा जावेगा। प्रेरित हो जुगनू की चमचम से Continue reading मुझ संग अगर तुम गावो तो

तुम कुछ तो गावो

तुम कुछ तो गावो     वीणा के टूटे तारों पर बंसी के प्यासे अधरों पर जीवनधुन कुछ तो भर जावो हे प्रभु मेरे! कुछ तो गावो   अपनी लीला गीत बनाकर संगीत मधु का पान करा कर तुम जीवन तरस मिटा डालो हे प्रभु मेरे! कुछ तो गावो   घूँघट में जो संगीत छिपा है आलिंगन को तरस रहा है परिचय उसका तुम दे जावो हे प्रभु मेरे! कुछ तो गावो   मौन पड़े विस्तार गगन में तपन भरे उसके चिंतन में मेघों की गर्जन भर जावो हे प्रभु मेरे! कुछ तो गावो   मेरी भी कँपती साँसों को साँसों Continue reading तुम कुछ तो गावो

गाओ फिर गीत वही

गाओ फिर गीत वही   गाओ फिर गीत वही जो उस दिन गाया था मेघों की पलकों जो भादों भर लाया था   मेरे मन को बहलाने की घावों को भी झुटलाने की छन्दों से मत कोशिश करना बिखरे शब्दों को मत तजना गाओ बस गीत सदा जो दिल तेरा गाता था गाओ फिर गीत वही जो उस दिन गाया था   पीड़ा की आँधी से डरकर लहरों की टक्कर से बचकर नाव नहीं तुम खेना ऐसे यम से डरता मानव जैसे खंड़ित वीणा मैं ही ले उस दिन आया था गाओ फिर गीत वही जो उस दिन गाया था Continue reading गाओ फिर गीत वही

उन गीतों को तुम सुर तो दे दो

उन गीतों को तुम सुर तो दे दो जो रुँधे कंठ में मूक पड़े हों उन गीतों को तुम सुर तो दे दो। जो उलझे वीणा तारों में गुमसुम गुमसुम सिसक रहे हों जो आँसू के अंदर छिपकर अपनी कुछ पहचान रखे हों इन आँसू के दुखमय गीतों को कुछ अपनी पलकों में रचने दो। जो रुँधे कंठ में मूक पड़े हों उन गीतों को तुम सुर तो दे दो। ममता की प्यारी गोदी में जो जो मेरे अश्क बहे हों चूम चूम गीले गालों को माँ के आँसू उमड़ पड़े हों उस आँचल के कुछ आँसू मोती मेरे इन Continue reading उन गीतों को तुम सुर तो दे दो

उस पत्थर को मैंने तराशा

उस पत्थर को  मैंने तराशा जिसने पथ पर मुझे गिराया और  तराशकर उसे बनाया जिसने पथ से मुझे उठाया।   जिसके कारण नाव बिचारी टूट  किनारे  जा  टकराई उसे  देकर  पतवार हमारी हमने  मंजिल  पार लगाई।   औ किनारा जब उसने पाया बोल उठा वह अति शरमाया उस पत्थर को  मैंने  तराशा जिसने पथ पर  मुझे गिराया।   जिनने चिंतन के पंख हमारे नोंच-नाचकर सब बिखराये मैंने  ले उनके  मन बौराये पतझर में भी फूल खिलाये।   यूँ  तराशकर  उन्हें  बनाया प्रभु की  वाणी का रखवाला उस पत्थर  को  मैंने तराशा जिसने पथ पर मुझे गिराया।   जिसने  द्वेष, घृणा, Continue reading उस पत्थर को मैंने तराशा

हे प्रभु, मैंने जीना सीख लिया है

हे प्रभु, मैंने जीना सीख लिया तुम संग मैंने जीना सीख लिया । पहले तो मैने समझा था इस जग में बस मैं ही मैं हूँ जब से देखा दीन जनों को तुझे खोजने लगा हुआ हूँ इसी खोज में लगा हुआ अब मैंनेे जीना सीख लिया है हे प्रभु, मैंने जीना सीख लिया तुम संग मैंने जीना सीख लिया। डाल डाल पर, फुदक फुदक कर चिड़ियाँ गाती हैं तेरे गीत रंगबिरंगी फूलों पर जा झूमे भ्रमर-सा जब संगीत तेरी महिमा उनसे सुनकर मैंने जीना सीख लिया है हे प्रभु, मैंने जीना सीख लिया तुम संग मैंने जीना सीख लिया। Continue reading हे प्रभु, मैंने जीना सीख लिया है

मुक्तक – साँसें

मुक्तक — साँसें कहाँ माँगें, कौन उधारी देता है साँसें कातिल आता है पर लूटा करता है साँसें साँसों की गिनती भी करते नहीं बनती है कर्महीन भी तो कुछ ही गिन पाता है साँसें। …  भूपेन्द्र कुमार दवे            00000

पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने

पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने खूँ से लथपथ पदचिन्हों की हँसी उड़ाते पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने। जीवन पाकर सब अपना अपना पथ अपनाते चलने का उत्साह लिये वे बस चलते जाते नजर उठी रहती सबकी अपनी मंजिल पाने पर पथ के पत्थर वे सब देख नहीं हैं पाते कौन पाँव किधर रखेगा हर पथ हैं जाने किसको ठोकर देना हर पत्थर है जाने। खूँ से लथपथ पदचिन्हों की हँसी उड़ाते पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने। ठोकर खा गिरनेवाले पलपल गिरते जाते गिरकर उठते आहें भर साँसें गिनती जाते गिरते गिरते Continue reading पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने

सुबह का अखबार

सुबह का अखबार वो सुबह का अखबार पढ़ के रो रहा था कातिल था, अपने गुनाह पढ़ के रो रहा था।   वो कह न सका पाँव के काँटे निकाल दो उस गूँगे के हाथ कटे थे, रो रहा था।   फुटपाथ पड़ी लाश में माँ ऊँघ रही थी उसका बच्चा पास लेटे, रो रहा था।   जमाना चाह रहा था कि मैं भी रो पडूँ इसलिये मेरी हर खुशी पे, रो रहा था।   दर्द अब उस अश्क का देखा नहीं जाता जो मुस्कराहट में लुक-छिप के, रो रहा था।   पढ़ के गजल वो इतना तो समझा होगा Continue reading सुबह का अखबार

मुक्तक-खुश्बू

 मुक्तक — खुश्बू कलियों को कुछ और सँवर जाने दो फूलों को कुछ और निखर जाने दो। अभी कुछ चाह बाकी है जीने की खुश्बू को कुछ और बिखर जाने दो। ——  भूपेन्द्र कुमार दवे            00000