पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने

पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने खूँ से लथपथ पदचिन्हों की हँसी उड़ाते पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने। जीवन पाकर सब अपना अपना पथ अपनाते चलने का उत्साह लिये वे बस चलते जाते नजर उठी रहती सबकी अपनी मंजिल पाने पर पथ के पत्थर वे सब देख नहीं हैं पाते कौन पाँव किधर रखेगा हर पथ हैं जाने किसको ठोकर देना हर पत्थर है जाने। खूँ से लथपथ पदचिन्हों की हँसी उड़ाते पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने। ठोकर खा गिरनेवाले पलपल गिरते जाते गिरकर उठते आहें भर साँसें गिनती जाते गिरते गिरते Continue reading पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने

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सुबह का अखबार

सुबह का अखबार वो सुबह का अखबार पढ़ के रो रहा था कातिल था, अपने गुनाह पढ़ के रो रहा था।   वो कह न सका पाँव के काँटे निकाल दो उस गूँगे के हाथ कटे थे, रो रहा था।   फुटपाथ पड़ी लाश में माँ ऊँघ रही थी उसका बच्चा पास लेटे, रो रहा था।   जमाना चाह रहा था कि मैं भी रो पडूँ इसलिये मेरी हर खुशी पे, रो रहा था।   दर्द अब उस अश्क का देखा नहीं जाता जो मुस्कराहट में लुक-छिप के, रो रहा था।   पढ़ के गजल वो इतना तो समझा होगा Continue reading सुबह का अखबार

मुक्तक-खुश्बू

 मुक्तक — खुश्बू कलियों को कुछ और सँवर जाने दो फूलों को कुछ और निखर जाने दो। अभी कुछ चाह बाकी है जीने की खुश्बू को कुछ और बिखर जाने दो। ——  भूपेन्द्र कुमार दवे            00000

गीत समर्पित तुझको करने

गीत समर्पित तुझको करने गीत समर्पित तुझको करने कुछ चाहत मन में आती है। तेरे  ही  संगीत  धुनों  में लय  बँधती गुँथती जाती है।   है  शाश्वत  संगीत तुम्हारा इनसे हम क्या ताल मिलायें मेरे गीतों  की  नश्वर लय क्षणभंगुरता   ही   दर्शायें   मेरे  साँसों की  लहरें  तो लघुता  अपनी  दर्शाती  हैं। गीत समर्पित  तुझको करने कुछ चाहत मन में आती है।   तेरा  तो  है  संगीत  अमर प्रतिध्वनि-सा अनंत समय का सृष्टि सृजन के भी पहले का शब्दनाद-सा विकट प्रलय का   मेरे मन की उठती लहरें तो लघुमंथन की  बस होती  हैं गीत समर्पित तुझको करने कुछ चाहत Continue reading गीत समर्पित तुझको करने

तेरा गर साथ नहीं तो

तेरा गर साथ नहीं तो  तेरा गर साथ नहीं तो है पास कुछ भी नहीं सैकड़ों कारवाँ का होना साथ कुछ भी नहीं।   अनंत-शून्य में है फासला खास कुछ नहीं खुदा! तेरे आगे ये कायनात कुछ भी नहीं।   सच कहेगा सच, सच के सिवाय औ कुछ नहीं झूठ सुनेगा झूठ, उसके सिवा कुछ भी नहीं।   न्याय की अवमानना अब मैं भला क्यूँकर करूँ सजा तो खूब मिली पर था गुनाह कुछ भी नहीं।   खामोशी न खुद कहती है, न कहने देती है सन्नाटों में खुसफुसाहट है, आवाज कुछ भी नहीं।   ए शोले! तू ऐसा न Continue reading तेरा गर साथ नहीं तो

मेरे गीतों की आवाज

मेरे गीतों की आवाज मेरे  गीतों  की  आवाज जाने  कहाँ चली जाती है। सन्नाटों में  प्रतिध्वनित हो जाने कहाँ बिखर जाती है।   ढूँढ़  रहे हैं  वाद्यवृन्द भी कंपित  कोमल  कलियों में ढूँढ़ रहे हैं  महक सलोनी खिलती नाजुक पंखुरियों में   पूछें भ्रमरों से उनकी गुंजन जाने कहाँ सिमट  जाती है। मेरे  गीतों   की  आवाज जाने  कहाँ चली जाती है।   दूर गगन में  उड़ते  पंछी अपनी साँसों थाम सकें तो रंग-बिरंगी  पंख  खुले  से उड़ान अपनी थाम सकें तो   बैठ डाल पर उनसे  पूछें जाने कहाँ बिखर जाती है। मेरे  गीतों  की  आवाज जाने  कहाँ चली जाती Continue reading मेरे गीतों की आवाज

जंग लगी मेरी वीणा को

 जंग लगी मेरी वीणा को  सूखी डाली हरियाने को तुम आँसू मेरे बहने दो जंग लगी मेरी वीणा को अपनी धुन में बजने दो।   फूल नहीं तो शूल समझकर दामन में  अपने उलझा लो प्रतिकूल लगे बंधन फिर भी तुम मुक्त न मुझको होने दो।   बनकर मैं दीपक की बाती जलता हूँ तो जल जाने दो धुआँ बने मँडराते मन को काजल-सा ही बन जाने दो।   हर आँधी  में  पाल बिंधाकर तुम मुझको  आहत  होने दो जीवन-जल का  कीच छिपाने तुम कमलरूप बस बन जावो।   कुंठाओं के  नीड़  बनाकर बस उसमें मुझको पलने दो टूटे बिखरे  Continue reading जंग लगी मेरी वीणा को

मेरा जीवन पूरा तूने

मेरा जीवन पूरा तूने मेरे पुण्य कर्म को तूने पापों की श्रेणी में रखकर और मधुरवाणी को मेरी कटुता का ही भेद बताकर मेरा जीवन पूरा तूने दूषित रंगों में मथ डाला अब साँसें ही मचल रही हैं तज पंखों को उड़ जाने को और नीड़ में बैठी श्रद्वा बस व्याकुल है कुछ पाने को पर तूने श्रद्वा सुमनों को भक्ति विमुख ही कर डाला मेरा जीवन पूरा तूने दूषित रंगों में मथ डाला तन ही मेरा शेष बचा है ज्यों इक सीपी रेत पड़ी हो और लहर के आते-जाते लुढ़क लुढ़ककर टूट पड़ी हो तूने तो जीवन आशा को Continue reading मेरा जीवन पूरा तूने

सूनी सूनी साँसों के सुर में

सूनी सूनी साँसों के सुर में सूनी सूनी  साँसों के सुर में ये  आँसू कब तक  थिरकेंगे। कभी कहीं  ये आवाज थमेगी अब जग में ना आँसू बरसेंगे।   ये साँसें  हैं  दीप  सरीखी इक जलती है, इक बुझती है धुँआ बाती-सी जीवन ज्योति जलती     है,  ना  बुझती है।   दिव्य ज्योति जब आँखों में हो तो आँसू   मोती  से   ही  चमकेंगे सूनी  सूनी   साँसों  के  सुर में ये   आँसू  कब  तक   थिरकेंगे।   तरस रहे हैं बूँद बूँद को पनघट पनघट  खाली है साँसों का भंडार  भरा है जीवन  गागर  खाली है।   दरक उठी जब माटी की गागर हर Continue reading सूनी सूनी साँसों के सुर में

आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है

आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है रात ने भी पसंदीदा जेवर जुदाकर रखा है। जुगनूओं की बारात भी चुपचाप चल रही है रात ने गहन सन्नाटा जो सजाकर रखा है। रातरानी ने बगिया को महकाकर रखा है रात ने लेकिन द्वार अपना सटाकर रखा है। जलाकर रखा दीप भी किस आस में जगता रहे उजाले को अंधेरे ने खूब डराकर रखा है। बेशुमार यादों ने भी करवटें बदल बदलकर इंतिजार की कसक को महज जगाकर रखा है। आपके वादे भी गुमसुम हुए से बैठे हैं स्याह रात ने उनको बंदी Continue reading आस्मां ने अमावस में चाँद छिपाकर रखा है

चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये

जिन्दगी चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये गरीब की झोपड़ी में झाँक के देखा जाये यहीं पे ईश्वर और उसकी आस्था बसती है चलो, गरीब के आँसू तैर के देखा जाये।   कल ही रात में बड़ी जोर की बारिश हुई थी झोपड़ी ढह गई होगी जाके देखा जाये मुआवजा माँगती वहाँ कई लाश तो होंगी उनकी मुस्कराहट को पास से देखा जाये।   चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये इक चमचमाती कार में चल के देखा जाये बहुत सुखद लगता है गरीब का दर्द देखना चलो, भूखे बच्चे को तड़पते देखा जाये।   बहुत ऊब Continue reading चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये

ऐसा लगता है जैसे मैंने कुछ जीना सीख लिया है

ऐसा लगता है जैसे मैंने कुछ जीना सीख लिया है जीवन की मधुप्याली में अब अमृत भरना सीख लिया है।   अपनी पीड़ा सहते सहते ऊब गया तो तब फिर मैंने जीवन पथ पर चलते चलते व्यथा जगत की जानी मैंने था पीड़ा का विस्तार अनंत अपनाकर दुख-दर्द सभी का कुछ क्षण जीना सीख लिया है जीवन की मधुप्याली में अब अमृत भरना सीख लिया है।   हाथ पकड़कर प्रभु का मैंने सीखा बिन बैसाखी चलना सीख लिया तब उनसे मैंने औरों की भी पीड़ा हरना चल पड़ा तभी से सबके संग खुद बैसाखी बन औरों की मंजिल पाना सीख Continue reading ऐसा लगता है जैसे मैंने कुछ जीना सीख लिया है

कैसे कह दूँ

कैसे कह दूँ मैंने जग देखा है जगजीवन देखा है? मैंने तो बस महलों के अंदर देखा है सबकी आँखों अश्क नहीं शबनम देखा है। परदों के पीछे परदों का मंजर देखा है मधुकलशों में यौवन का दमखम देखा है। कैसे कह दूँ मैंने सुख का दुख का आलिंगन देखा है? चमन फूल कलियों की बस खुश्बू समझी है काँटों बिंधी तितली की तड़प नहीं देखी है। चहकती चिड़िया की भी गुफ्तगू समझी है हर पिजरे में पलती कसक नहीं देखी है। कैसे कह दूँ मैंने कोलाहल में सूनापन देखा है? मैंने बस पायल की थिरकन देखी है थककर थमते Continue reading कैसे कह दूँ

यह देश हमारा कर्मक्षेत्र है

यह देश हमारा कर्मक्षेत्र है यह देश हमारा कर्मक्षेत्र है ईश्वर के सब अवतारों का। इसने ही दिया है धर्म जगत को सुसंस्कृति और संस्कारों का । इसके ग्रंथों ने सबसे पहले हर मानव को श्रेष्ठ बताया है सारे जग को एक सूत्र में बँध बस सूत्र प्रेम का सिखलाया है। इसके कारण ही मानवता का मुकुट सजा है अधिकारों का। यह देश हमारा कर्मक्षेत्र है ईश्वर के सब अवतारों का। सत्य अहिंसा का पथ इक सुन्दर इसके मंत्रों में दिख जाता है और निडर हो पथ पर चलना भी यह धर्म सभी का बन जाता है। यह संग्रह है Continue reading यह देश हमारा कर्मक्षेत्र है

हे प्रभू

हे प्रभू तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो (ईश्वर निराकार है फिर भी कविता विनंती करती है कि हे ईश्वर! तुमने जो अनुपम सौंदर्य इस सृष्टि को दिया है उससे श्रंगार कर अवतरित हो ताकि हमारा तुम्हारे प्रति प्रेम और भी प्रगाढ़ हो सके।) हे प्रभू! तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो।   देखो, कलियाँ ओसकण में शरमा रही हैं पंखुड़ियाँ भोले भ्रमर को तरसा रही हैं झूल डालियाँ उन्माद में लहरा रही हैं पराग चूम सुरभि पवन को बहका रही हैं।   सृष्टि का यह प्रकट प्रेम भी स्वीकार कर लो। हे प्रभू! तुम भी Continue reading हे प्रभू