कोई तो बताये वो कैसे यहाँ आया था

कोई तो बताये वो कैसे यहाँ आया था मेरा मुकद्दर सहसा बदलने यहाँ आया था।   कितना खामोश, तन्हा, उदास दिख रहा है वो ना मालूम किस-किससे मिलके यहाँ आया था।   कितना अजीब चिराग है बुझाये बुझता नहीं वो किस अँधेरे से गुजरके यहाँ आया था।   इस राह की धूल पावों को जलाने लगी है किसका दहकता जिगर टहलने यहाँ आया था।   मेरी ही आवाज का झोंका मुझे रुला गया है ना जाने किस दर्द को छूके यहाँ आया था।           ….  भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है।

आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आँसुओं को भी गुदगुदाने का मन करता है।   गोद में माँ अब सो जाने का मन करता है। आँचल में छिप खिलखिलाने का मन करता है।   याद में तेरी खो जाने का मन करता है। जीवन में फिर मुस्कराने का मन करता है।   मचल रही हैं यादों की लहरें अनवरत अब इसी सागर में रम जाने का मन करता है।   पंखुरियाँ यादों की अभी तक झरी नहीं हैं जीवन को और महकाने का मन करता है।   पंख फैलाये थे जिस ममता के आँगन में आज वहीं पर Continue reading आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है।

बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को

बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को कर गया वो पराया अपने घरों को।   कहाँ तक उड़े चले जाते हैं देखें आस्मां मिला है टूटे हुए परों को।   बहा है लहू किसके सरों का, देखो उठाकर फेंके हुए इन पत्थरों को।   क्या पता कि वोह सोया भी था कि नहीं छोड़ गया है वो गूँगे बिस्तरों को।   बहुत लहूलुहान हो गया है बिचारा समझाये कोई तो अब ठोकरों को।   ये कलियाँ शबनम भरी सिसकती रहीं कहीं काँटे ना चुभ जायें भ्रमरों को।   वोह मुस्कान तेरे लबों को छूकर चूम चूम जाती है मेरे अधरों को।                    …. Continue reading बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को

महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को

महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को बिखर भी जाने दो महकते गजरों को।   नशा पीने में नहीं, पिलाने में भी है गौर से तो देख, साकी की नजरों में।   हादसा था वोह नाजुक से प्यार का पर दहला गया है सारे शहरों को।   कातिल न था वो बस रखने आया था मेरे सीने में अपने खंजरों को।   लजा जाता है अक्स भी आईने का झुका लेता है वो अपनी नजरों को।   लौट आने की चाहत में अपने घर खड़खड़ाता रहा वो तमाम घरों को।   उठी थी इक चिन्गारी दमन की मगर जलाती गई Continue reading महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को

लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं

लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं हम इसे साये-मौत की दिल्लगी कहते हैं।   ये छलकते जाम भी इक साज से होते हैं हम प्यासे इसे महकती बंदगी कहते हैं।   इस घर के सामने बेघरों की जो भीड़ है वे ही इसके मलबे को गंदगी कहते हैं।   ये चिथड़ा कमीज, ये फटी नीकर कुछ तो है इस गरीबी को लोग तो सादगी कहते हैं।   बासी रोटी से उठती भूख की खश्बू को गरीब बच्चे बेचारे ताजगी कहते हैं।   गरीब की झोपड़ी जलाकर खाक कर देना हरेक मजहब इसी को दरिंदगी कहते हैं। ……    भूपेन्द्र Continue reading लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं

मुझसे मेरी जिन्दगी खफा हो गई

मुझसे मेरी जिन्दगी खफा हो गई मौत को गले लगाकर फना हो गई।   मैं नमपलकों से उसे देखता रहा सुलगती जिन्दगी कब धुँआ हो गई।   चिड़िया जब हथेली पे आकर बैठी डूबती जिन्दगी भी खुशनूमा हो गई।   हमारी तकदीर एक जैसी ही थी हम जुदा हुए तकदीर जुदा हो गई।   उसकी दुआ का असर भी देख ले यार तुम्हारी हर बद्दुआ  दुआ हो गई।   एक आखरी साँस की तलाश जो थी जवानी भी रुख बदलकर जरा हो गई। …  भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

मेरे गीतों को वर दे

मेरे  गीतों  को  वर दे हर अक्षर में सुर भर दे।   चलता था जिस पथरेखा पर वो भी लुप्त हो चली नयन  से अब  राही क्या बन पाऊँगा मिट जाऊँगा कंकण कण में   निज अस्तित्व बना रखने ही पड़ा  रहूँ   मैं  तेरे  दर पे मेरे  गीतों   को   वर   दे हर  अक्षर  में  सुर भर दे।   फटा-पुराना   तन  है  मेरा ये वस्त्र  कभी  के तार  हुए जीवन है इक जीर्ण कफन-सा जिसे  ओढ़ हम  बेकार  हुए   अब  जो  चेतनता  है  मुझमें उसमें ही अब कुछ लय भर दे मेरे   गीतों   को    वर  दे हर  अक्षर  में  सुर  Continue reading मेरे गीतों को वर दे

वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो

वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो मंदिरो-मस्जिद में भी तुम कहाँ रहते हो। साया ना कहीं दिखा धूप में चलते रहे आग लगा रखी थी तुमने जहाँ रहते हो। मैं ख्वाब के पर्दे रात भर हटाता रहा देखा पसेपर्दा भी तुम कहाँ रहते हो। हल्का नशा था, मगर लहू खौल उठता था जब कभी साकी पूछता ‘तुम कहाँ रहते हो’। क्या मालूम कि मेरा दिल अब कहाँ रहता है अब तो वहीं रहता है तुम जहाँ रहते हो। हमसे यूँ जुदा होकर तुम कहाँ रहते हो वो महफिल बता दो तुम जहाँ रहते हो। तुम्हारी ही यादों में Continue reading वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो

वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी

वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी फुटपाथ पर वही आ गया तो धरती हिलती थी।   मेरा नाम आया तो उनकी जुबाँ कँपती थी जाम कँपते थे, सुराही में मैकशी हिलती थी।   कल भी आया चाँद कुछ वैसी ही चाँदनी लिये जो नमपलकों को सहलाती चूमती हिलती थी।   घर नया था, हर दरो-दीवार नई नई थी पर यादों में चरमराती इक खिड़की हिलती थी।   माना कि जिन्दगी गजल की कच्ची किताब थी खामोश लबों पर फिर भी हर शायरी हिलती थी। ….. भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

पिला ऐसी कि हर पैमाना मैखाना लगे

पिला ऐसी कि हर पैमाना मैखाना लगे पिला इतनी कि मैखाना इक पैमाना लगे।   बैठ तेरे आगोश में ताउम्र ऐ साकी जिन्दगी हर सूरत अक्स-ए-मैखाना1 लगे।   वक्त अब क्यूँ इस तरह खुद-इंतशारी2 का हो दर्द हो भी तो गमे-दिल3 का दीवाना लगे।   सिर्फ छूकर ही जाम तिरा नशा आने लगा हरेक बूँद अब इक छलकता पैमाना लगे।   मुश्किल अब मैखाने से उठ घर जाना लगे मैकदे की दर भी दीवारे-मैखाना लगे।   इस कदर पिला कि हमें जमाना मदहोश कहे और हमें भी मदहोश सारा जमाना लगे।   तिरी दहलीज पर जब भी आऊँ तो, ए Continue reading पिला ऐसी कि हर पैमाना मैखाना लगे

शहीद की माँ

शहीद की माँ  बेटा, बचपन तेरा भोलेपन में जाने क्या क्या करता था पलने पर बस लेटे लेटे हँसता था, मुस्काता था।   घुटने के बल चलते चलते कुछ रुकता फिर बढ़ता था माँ का आँचल दिख जाने पर होकर खुश मुस्काता था।   और गोद पे चढ़ जाने का अभिनय प्यारा करता था बाहर तारों की माला में चाँद पिरोया करता था।   फूलों के गुच्छों पर हरदम महक प्यार की भरता था पास बुलाने तितली को तू ‘ऐं ऐं’ कर कुछ कहता था।   माँ की गोदी में सिर रखकर सोता तू मुस्काता था क्या सपने थे जिसे Continue reading शहीद की माँ

अपनी दफ्न जिन्दगी बस तलाशता रहा

अपनी दफ्न जिन्दगी बस तलाशता रहा रात भर वह कब्र सारी खँगालता रहा।   पहले सभी यादें चुन चुन जलाता रहा फिर यादों की राख बैठा झुलसता रहा।   आँधी में बेपर जिन्दगी ले उड़ता रहा उड़ते गुबार की मानिंद भटकता रहा।   अपने जिस्म की बची साँसें गिनता रहा फिर भी खुद को खुदा का अक्स कहता रहा।   मालूम नहीं ये किसकी बद्दुआ थी कि मैं उलझनें सुलझाता खुद ही उलझता रहा।   अपने होने का अब क्यूँ अहसास हो खोकर जिस्म मैं पेहरन संभालता रहा।                  ….  भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

इस आँधी को मेरा आखरी सलाम भेज दे

इस आँधी को मेरा आखरी सलाम भेज दे मेरी किस्मत की कतरनें भी तमाम भेज दे। ए डूबते सूरज, बस इक मेहरबानी कर जा अपनी तपस बटोरकर सुलगती शाम भेज दे। ना पानी है, ना शराब का इक कतरा बचा है तू अपने लबों से चूमकर इक जाम भेज दे। कच्ची गागर है, मालूम है, फूट जावेगी बस आखरी दरार का लिखा पैगाम भेज दे। मैं कब से आँख मूँदे यूँ बेजान पड़ा हूँ अब ख्वाब में साकी दरका एक जाम भेज दे। अब की हवा का झोंका पतझर ही लावेगा हर जर्जर पत्ते पे लिख मेरा नाम भेज दे। Continue reading इस आँधी को मेरा आखरी सलाम भेज दे

आज तेरे मैकदे में साकी, सुराही नहीं दिखती

आज तेरे मैकदे में साकी, सुराही नहीं दिखती कहीं चिन्गारी नहीं दिखती, कहीं जिन्दगी नहीं दिखती।   हरइक आवाज ऊँची थी, दूर तक गूँजती गई थी इस सन्नाटे के आगोश में खामोशी नहीं दिखती।   मौत हर रोज दिखती है, लेकिन जिन्दगी नहीं दिखती गुनाह की फेरिश्त में तड़पती जिन्दगी नहीं दिखती।   इस कफस में बैठकर देखो ए सैयाद, मेरे दोस्त! तेरे कारनामों में रहम की निशानी नहीं दिखती।   गुनहगारों में तू भी था, हर इक गुनाह करता हुआ पर तेरे चेहरे पर खुदा! परेशानी नहीं दिखती।   मुझे इस कदर रोता देखकर, तू बस हँसता रहा क्या Continue reading आज तेरे मैकदे में साकी, सुराही नहीं दिखती

अभी पलकों में हसीन सपने सजने दो

अभी पलकों में हसीन सपने सजने दो कभी आगे इन्हें हकीकत भी बनने दो।   तमाम रात मैकदों को खुला रहने दो तमाम उम्र यूँ ही बस मदहोश रहने दो।   ये बहार आके चली भी जावे तो क्या मौसमे-मैकदा साकी, बने रहने दो।   भूख मिट जावेगी जरा इंतजार करो उसे बासी रोटी तो इधर फैंकने दो।   संभलकर चलना भी मैं सीख जाऊँगा अभी गिर-उठने का मजा जरा चखने दो।   दिल को मायूस कर देनेवाली यादें तुम भूले सभी, कुछ मुझे भी भूलने दो।   कफस में वो परकटा पंछी कैद ना रख उसे आजाद होकर बाहर Continue reading अभी पलकों में हसीन सपने सजने दो