गज़ल

ग़जल मेरे जहन में रुकी रही यादें तेरी, जब तक इस जिस्म में जान थी। दर दर पर दुआ मांगी तेरे वास्ते,पर करू क्या किस्मत मेरी खुदा से अनजान थी। अरे अब तो टूटी दीवारे ही रह गई है इस मक़ान मे,कोई क्या जाने कभी छत भी इसकी शान थी। कभी फक्र किया करता था मेरी मोहब्बत और महबूबा पर,क्या पता की ये महबूबा दो दिन की मेहमान थी। यु तो मेने सब कुछ  लुटा दिया था उस हुस्न मलिका पर ,पर में करता क्या उसकी तो बेवफाई से पहचान थी। यु तो हम उम्र भर जीते रहे इमान के साथ,पर Continue reading गज़ल

भीड़ का हिस्सा ( लघु कथा )

भीड़ का हिस्सा मुंबई का बोरीवली रेल्वे स्टेशन , सुबह 9 बजे का समय , भीड़ का रेला बहा जा रहा है । जहा देंखो दूर दूर तक इंसानी मुंडिया ही नजर आ रही है , ऐसा लग रहा है जैसे कोई समुद्र बह रहा है और उसमे पानी की जगह इन्सान हो ! ‘ओह इंसानों का समुद्र ! ‘ मनोहर बुदबुदाया और लोकल के डिब्बे से उतर कर उस भीड़ का हिस्सा हो गया । कोहनियो से कोहनिया टकराते हुए लोग आगे बढ़ रहे थे , मनोहर को थोडा सुकून हुआ भीड़ का हिस्सा बन कर , उस लोगो Continue reading भीड़ का हिस्सा ( लघु कथा )

कर्मयोगी 

हर रात मै देखता आसमां में एक कोनेपर ठहरे हुये तारे को और मोन लेकिन आँखों की भाषा मे बाया  कर देता अपने सारे दुःख । और कर देता खुशियों का इज़हार । बदले में वो भी अपनी टिमटीमाहट मे दे देता जवाब । एक रात पाया मैंनेउस कोने को खाली । घिर गया में अवसाद में किसे कहूंगा दुःख किससे करूँगा इज़हार  खुशियों का  । अगले ही पल था दिल में खयाल दुनिया तो नशवर है । इस तारे की तरह होगी सभी की समाप्ति। अब मेरा दुःख ख़त्म हो  चूका था । और खुशिया उदासीन । और सुख Continue reading कर्मयोगी 

मै और मेरी तनहाई

जब रात गहराती है मैं सुनता  हूँ मेरी तनहाई  गाती है साय-साय कर संगीत है बजता  । आसमां में होले-होल चाँद है चलता । इस गीत पर इस संगीत पर नृत्य करती है रात । ऐसे तन्हा वक़्त  में दिल छेड़ता है बिसरी बात  । मंद पवन चल के यादो की चादर बिछाती है । मै सुनता हु मेरी तन्हाई गाती है …………. दूर कही बारह का घड़ियाल है बजता । छोड़ेगी साथ मेरा तनहाई ऐसा है लगता । पल तनहा ना होगा , होगा किसी का साथ । और फिर साथ देती ये अँधेरी रात  । संग मेरी तनहाई  Continue reading मै और मेरी तनहाई

उपन्यास

घोड़े पर सवार वीरसेन आगे बढ़ रहा था , जंगल के पेड़ो के मध्य बनी सड़क जो बैलगाडियों के आने-जाने से बनी थी पर वीरसेन का घोडा सरपट भाग रहा था , चांदनी रात में पेडो की लम्बी छायाए अजीब से माहोल का आभास दे रही थी ऊपर से झींगुरो की आवाज व कुत्तो के भोकने की आवाज ने माहोल को काफी डरावना बना दिया था और इस माहोल में दूर कही सियार की आवाज आये तो किसी बहादुर व्यक्ति के शरीर में भी डर की झुरझुरी आ जाये तो आश्चर्य की बात नहीं , परन्तु ऐसे माहोल में भी Continue reading उपन्यास