बूढ़ी माँ

बूढ़ी माँ वो आँखे किसी का दीदार करने के लिए तरस रही थी।उस बूढ़ी औरत के चेहरे पर बनी झुर्रियां इस बात का संकेत कर रही थी कि उस पर बुढ़ापा हावी होते जा रहा था।अचानक एक घंटी बजती हैं और वो इस बात का संकेत कर रही थी की किसीने दरवाजे पे बहुत दिनों बाद दस्तक दी थी ।वह बूढी औरत भगवान् का नाम स्मरण करते हुए’हाय राम’ कौन हैं?कहते हुए दरवाजे की तरफ अपने दबे पैरों से बढ़ती हैं और कोमल डाली जैसे हाथों से दरवाज़े की कुंठी खोलने का प्रयास करती हैं।जैसे ही वह दरवाजा खोलती हैं Continue reading बूढ़ी माँ

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मेरा देश

मेरा देश लगता हैं मेरा देश अब शांत स्वर में बैठा हैं, कुछ न कर सकता मुहँ पर उंगली लगाये बैठा हैं, पिघल रहा हैं कश्मीर आज बारूदों के ताप से, फिर भी मेरा देश आज शीत माहौल चाहता हैं, जहाँ हर वक़्त रहती थी केशर की महक , वहाँ आज हर पल हैं बारूदों की महक, अब कश्मीर में जीना दुस्वार हो गया हैं, ये धड़कन हैं भारत की जिस पर दिल न्यौछावर हो गया हैं, जिनके ख़ातिर शहीद हुए इस देश के रक्षक, वे लोग ही बन बैठे हैं इस चमन के भक्षक, जिसका नहीं ये चमन वो Continue reading मेरा देश

अब तो तू आजा प्रिये

अब तो तू आजा प्रिये अब आया समझ में,मैं ना समझ नहीं प्यार हैं,चाहत हैं,उन्माद नहीं सूना-सूना सा जीवन है कुछ शोक नहीं,जीवन में तैर सिवा कोई और नहीं अब इस दिल को कोई स्वीकार नहीं दिल मेरा हर बार तड़पता, तुझे चाहता अब तो तू आजा प्रिये .. जिंदगी मुझसे रुठ चुकी तेरी चाहत बढ़ चुकी तेरे लिए भटका हर दर-दर मैं गलियां मेरे हाथों से टूट चुकी कोमल-कोमल कलियाँ खो बैठा अपनी नादानी से प्यार भरा अपार कोष प्रिये फिर कर लेने दो प्यार प्रिये .. तेरे बिन अब ये दिल ना जियें अब तो तू आजा प्रिये…

मैं अकेला

मैं अकेला आया हूँ मैंअकेला,रहना अकेला चाहता हूँ इस दुनियादारी के झमेले में नहीं उलझना चाहता हूँ अपने दिल का गुणगान औरों से नहीं चाहता हूँ इसलिए शायद खुदको मैं अकेला ही पाता हूँ चाहता हूँ अकेला रहकर कुछ लिखा करूँ अपने मन की व्यथा का मैं खुद ही गुणगान करूँ देख कर प्रकृति की सुंदरता मैं खामोश रहता हूँ इसका मधु अपार, शायद इसको ही पिया करूँ आते हैं जीवन में सुख और दुःख अपार मैं उस अड़िग, कठोर, पेड़ की तरह खड़ा रहूं ना सुख मुझे बहलाएगा,ना दुःख मुझे सतायेगा युवा हूँ,पलट कर वायु मैं बन जाऊँगा जानता Continue reading मैं अकेला

तेरी याद

तेरी याद जब याद आएगी तेरी शाम ढ़लते-ढ़लते, एक बार फिर शाम-ए-गज़ल बन जाएंगी, जब तेरे-मेरे मिलन की याद हमें आयेगी, छलक उठेगा हर एक जाम महखाने में, जब तेरी याद हमे ख़लिश सी सताएंगी, ना रुकेंगी कलम आज गज़ल लिखते-लिखते, जब तक दर्द बयां ना हो जाता कोरे कागजों पर, उभर कर आएंगे लफ़्ज इन बेगुनाह पन्नों पर, जब इन आँखों से नीर की धार बहेंगी, पलट जायेगा हवा का रुख़, थम जायेगी लहरें, जब दीदार होगा तेरा तो खिल जाएंगे दो चेहरे, जब आएगी याद तेरी शाम ढ़लते-ढ़लते।