About Kavyakosh

Our aim is to spread the Hindi literature to the entire globe. Looking out for quality poets who can help us in this noble mission.

Live Conversation with Kavyakosh Admin

Namaskar, You are specially invited for a Kavyakosh Live event on Facebook on July 23 2016 at 8.30 PM IST Kavyakosh Admin will go live on Facebook and interact with you. The Key features of event: 1. Admin will speak about Kavyakosh journey of 5 years. 2. Discussion about future of Kavyakosh. 3. Audience can ask question about the poems or the issues they face on Kavyakosh directly to the admin. RSVP here: https://www.facebook.com/events/1048964645140549/ Waiting for our first interaction with you guys 🙂 Advertisements

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चापलूसी

मेरी कुछ पंक्तिया है आजकल जो बहुत चापलूसी चलती है उसके उपर, शायद यह कविता किसिको पसंद ना आये, पर आप जरा आपने इर्द-गिर्द़ गौर से झांकोगे तो शायद आपको इस कविता का एहसास जरुर होगा, कृपया पूरा पढे ओर पसंद आये तो जरुर शेअर करे *चापलूसी* हमने देखा है, नाकामियों को बहुत कुछ मिलते हुये, और काम करनेवालों को हमेशा उम्मीद मिलते हुये, यहा चापलूसीवालों का होता है हमेशा जयजयकार, उनको ही मिलती है बढाव और बोनस मेरे यार खासीयत होती है उनमे कुछ खास, चाटने से ही मिलती है उने खुशी का एहसास बिचारे काम करनेवाले काम ही Continue reading चापलूसी

वक्त की पुकार

वक्त की पुकार जमिन अपनी नहीं, हम जमीन के है क्यों माँ पर अधिकार हम बोले यहाँ जनम इसपे हमने लिया फिर भी क्यों दुविधा से खो रहे अपना जहाँ देखो मिट्टी की खुशबू कैसे अपने तन मन को जगाती है ये पेड़, पौधे, फूल, पंछी भी अपने जीवन को सजाते है अपने अधिकारों की बात वैसे सुख से जादा दुःख देती है जाना है सबकुछ छोड़ यहाँ से काल पर किसका अधिकार है लोग झगड़ रहे लड़ रहे ये धरती का आँगन भूलकर अभिलाषा की आरजू में कैसे मानव भाग रहा जीना छोड़कर दुनिया के मंच पर हर कोई Continue reading वक्त की पुकार

चापलूसी

मेरी कुछ पंक्तिया है आजकल जो बहुत चापलूसी चलती है उसके उपर, शायद यह कविता किसिको पसंद ना आये, पर आप जरा आपने इर्द-गिर्द़ गौर से झांकोगे तो शायद आपको इस कविता का आशय समज सकोगे, कृपया पूरा पढे ओर् पसंद आये तो जरुर शेअर करे *चापलूसी* हमने देखा है, नाकामियों को बहुत कुछ मिलते हुये, और काम करनेवालों को हमेशा उम्मीद मिलते हुये, यहा चापलूसीवालों का होता है हमेशा जयजयकार, उनको ही मिलती है बढाव और बोनस मेरे यार खासीयत होती है उनमे कुछ खास, चाटने से ही मिलती है उने खुशी का एहसास बिचारे काम करनेवाले काम ही Continue reading चापलूसी

बार-बार

वो बार-बार मन को मेरे, छलनी किये जाते हैं, हम मुस्कुरा-मुस्कुरा के, बस होंठ सिये जाते हैं. हर राह, हर कदम उन्होंने, साथ छोड़ा है मेरा, हम मित्रों की फेहरिस्त में, उनका नाम लिए जाते हैं. झूठ का दामन उन्होंने, थामे रखा है जकड़ कर, फिर भी हम वफाओं की, उम्मीद किये जाते हैं. हर बार सोचते है पलट वार करें हम भी आज, वो दुहाई दे दोस्ती की, हमे चुप किए जाते हैं. वो बार-बार मन को मेरे, छलनी किये जाते हैं, हम मुस्कुरा-मुस्कुरा के, बस होंठ सिये जाते हैं. -Chaya Dua

बहुत प्यारा बंधन

बहुत प्यारा बंधन आज टूट रहा हैं, मानो सब कुछ आज छुट रहा हैं, बंधन था पवित्र, निश्वार्थ, मानो लाखो मैं खास, दोषी कौन हैं पता नही, सज़ा मिली दोनो को, ये समझ आया नही, दूरी एसी बढ़ी की मापी ना गई, मानो प्यारा बंधन कभी था ही नही, दोनो मैं से कोई पिघला नही, रिश्ता फिर राजीव की तरह खिला नही, राजीव कुमार

धरती माता

धरती हमारी माता है, माता को प्रणाम करोबनी रहे इसकी सुंदरता, ऐसा भी कुछ काम करोआओ हम सब मिलजुल कर, इस धरती को ही स्वर्ग बना देंदेकर सुंदर रूप धरा को, कुरूपता को दूर भगा देंनैतिक ज़िम्मेदारी समझ कर, नैतिकता से काम करेंगंदगी फैला भूमि परमाँ को न बदनाम करें माँ तो है हम सब की रक्षकहम इसके क्यों बन रहे भक्षकजन्म भूमि है पावन भूमि, बन जाएँ इसके संरक्षककुदरत ने जो दिया धरा कोउसका सब सम्मान करोन छेड़ो इन उपहारों को, न कोई बुराई का काम करोधरती हमारी माता है, माता को प्रणाम करोबनी रहे इसकी सुंदरता, ऐसा भी कुछ Continue reading धरती माता

टूटा चश्मा

मैं ड्यूटी के लिए लेट हो रहा था। इसलिए ऑटो पकडने के लिए मैं तेजी से चल रहा था। अभी मैं गली से होते हुए सडक पर आ गया  था कि मैंने देखा मेरे आगे-आगे एक अंकल जी जा रहे थे। जैसे ही मैं अंकल जी से आगे निकला तो पीछे से एक आवाज आई, बेटा रुक जाओ… मैंने पीछे मुडकर देखा तो वही अंकल जी मुझे आवाज दे रहे थे। मैं वहीं पर रुक गया। अंकल जी ने कहा बेटा कुछ पैसे दे दो। थडी देर के लिए मैं आश्चर्यचकित सा हो गया और मैंने सोचा अंकल जी देखने Continue reading टूटा चश्मा

कसक

कुछ रिश्ते होते ही हैं टूटने के लिए, उन्हें जोड़ कैसे सकता हूँ मैं. तेरे दिल से सीखा है मैंने बेवफाई करना, उसे छोड़ कैसे सकता हूँ मैं. श्रेयस अपूर्व भोपाल

तू मेरी कौन है

देखो ऩजर उठाके तेरा हबीब आया तुझसे दूर जाके और भी तेरे करीब आया अमीरी के तराजू मे जिसे ना तौल पाई दुनिया वहीं दिल का धनी पैसों का मगर गरीब आया कहाँ बेकार मे नसीब तुम तलाशती फिरती हो चलके ख़ुद-ब-ख़ुद तेरे पास तेरा नसीब आया थे हुवे शिकार हम तुम किसी गलतफहमी का फिर से नज़दीक आने का नया तरकीब आया मग़र तू मेरी कौन है और हूँ तेरा मै भी कौन जूबाँ पे जालिमों के सवाल भी ये अज़ीब आया @सत्येन्द्र गोविन्द ( नरकटियागंज ,बिहार )

बात होती तो है ……

फ़ेस बुक पर सही , बात होती तो है । है गलत या सही बात होती तो है ।। जो दिखाई पड़े , आईने की तरह , इस जगह पर वही , बात होती तो है। क्या कहा था उसे , भूल जाते हैं हम , फ़ेस बुक पर कही, बात होती तो है। है ये जरिया, विचारों को साझा करें, अजनवी ही सही, बात होती तो है। ‘सत्य’ जो फ़ेस टू फ़ेस , ना हो सकी, फ़ेस बुक पर वही , बात होती तो है। – सत्य प्रकाश शर्मा ‘ सत्य’

दिवाली खूब मनाना रे!!

दिवाली खूब मनाना रे! ! जमकर धूम मचाना रे! लेकिन ये भूल ना जाना रे! ! बाहर का अंधेरा भगाकर, भीतर का तम भी मिटाना रे! ! दिवाली…… इतने अद्भुत राष्ट्र मे जन्मे इसी बात का गर्व है! उल्लास, प्रेम, सत्य, शांति, सौहार्द का ये पर्व है! ! उपहार और मिठाई देकर सबको गले लगाना रे! ! दिवाली…… छोटे और बड़े सर्वत्र, स्नेह अपार बरसाएँ! इस पावन पर्व की, सबको मंगलकामनाएँ! ! मगर पटाखों के प्रदूषण से पर्यावरण को बचना रे! ! दिवाली….. Gurupawan bharti

एक निवेदन प्रीत के त्यौहार पर

एक निवेदन प्रीत के त्यौहार पर:— क्षमा देही सब स्नेही लिखता नहीं प्रतिक्रिया कोई आदत है यही उपेक्षा नहीं मंतव्य से ही ऊर्जा रही पसंद करे जोई उत्साहित होई आभार प्रकट ही शुक्रिया सेही क्षमा कर देही……….. रंग बरसे,हृदय हर्षे मिलन हो दिल से त्यौहार नीभे प्रीत से क्षमा शिकवा शिकायत से स्नेहिशीष चाहिये आप से धन्यवाद देता दिल से प्रतिक्रिया पे मंतव्य से बचता रहा सदा से उपेक्षा नहीं, आदत से मान लेवें उदारता से चले सिलसिला ऐसे अनुमति प्राप्त हो सब से उत्साहित करें फिर से करजोड़ विनती मन से सजन

बचपन

नाज़ुक डाली सी काया, कोमल कली सा मन निर्मल निश्छल नीर सा, नटखट नादान बचपन एक पल अठखेलियाँ दूजे पल अनबन वेदमन्त्र- अज़ान सा, पवित्र-पाक-पावन कौतूहल से फैलती, छोटी-छोटी आँख चाँद-सितारे छूने को सपने है बेताब बाबा की अँगुली नहीं, है मुट्ठी में आकाश ममता के आँचल तले, स्वर्ग सा अहसास छल-कपट से कोसों दूर, बचपन की हर बात परीलोक सी दुनिया में, इन्द्रलोक सी रात बाबा का कुरता- चप्पल, पहन उन्हीं सा इठलाना बाहर की दुनिया माँ को, अपनी आँखों से दिखलाना बुलबुलों में साबुन के, इन्द्रधनुष भर लाते थे डाल चवन्नी गुल्लक में, धन्ना सेठ बन जाते थे Continue reading बचपन