About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

रिश्ता

रिश्ता तोड़ना मत रिश्ता कभी कच्चा मकान देखकर किसी गरीब का क्योंकि पकड़ बहुत मजबूत होती है मिटटी की धरती से याराना ये मिटटी और धरती का पुराना है युगों-युगों से संगमरमर पर तो अक्सर पैर फिसलते ही रहते हैं क्योंकि क्षणिकहै ये याराना (किशन नेगी ‘एकांत’ )

पसंद

पसंद बना दिया अगर किसी को अपनी पसंद तो कोई बड़ी बात नहीं इस सफर में क्योंकि तुम अकेले मुसाफिर हो लेकिन बन गए जो किसी की पसंद तुम तो ये बात बहुत बड़ी होगी क्योंकि इस सफर में तुम अकेले नहीं कोई और मुसाफिर भी चलता है संग तुम्हारे इस सफर में (किशन नेगी ‘एकांत’ )

वक्त का मिजाज

वक्त का मिजाज बहुत वक्त गुजारा जिंदगी का हमसाया बनकर सागर की लहरों की तरह पल आते गए, पल गुजरते गए पर कुछ न बदला लगता था लगेगा वक्त जिंदगी को बदलने में मगर जब देखा वक्त के बदलते मिज़ाज़ को तो गले उसे लगा लिया हाथ थामे इक-दूजे का चल पड़े बनकर हमसफ़र पर नहीं पता था कि इक दिन बदला हुआ वक्त ही जिंदगी बदल देगा (किशन नेगी ‘एकांत’ )

दो दिन

दो दिन हे मनु की संतानतेरी ये ज़िन्दगी हैबस दो दिन कीएक दिन तेरे हक में औरदूसरा दिन तेरे खिलाफजब तेरे हक़ का दिन होगातू गुमान न करनाभाग्य और किस्मतहोंगी तेरी परछाईयाँ जिंदगी होगी मेहरबानमगर पाँव तू जमीन पर ही रखनाजिस दिन ज़िन्दगी होगी तेरे खिलाफतू धीरज मत खोना, शांत रहनामंडराएंगे निराशा के काले बादलभाग्य और किस्मत भी रूठे होंगेमगर आशा की ज्योति जलाये रखनाकर्मगति को विराम न देनारहना होगा अग्रसर कर्मपथ पर (किशन नेगी ‘एकांत’ )

यार बचपन तू कहाँ खो गया

घनन-घनन गरजते मेघ काली घटाओं की मस्ती वो रिमझिम वर्षा का पानी वो कागज की टूटी कश्ती बचपन यार तू कहाँ खो गया मुझे जगाकर तू क्यों सो गया  वह कटी पतंग को झपटना वो छीना-झपटी में उलझना यारों की पतंग को काटना फिर झगड़ों का सुलझना बचपन यार तू कहाँ खो गया न जाने कहाँ तू गुम हो गया लुका-छिपी की वह दोपहर वो होली का महकता रंग वो शिकायतों का अनंत दौर अपने रूठे हुए यारों के संग बचपन यार तू कहाँ खो गया आज तू याद आया तो रो गया ताल कटोरा गार्डन जाकर वो कच्ची अमिया Continue reading यार बचपन तू कहाँ खो गया

शरद ऋतु मेरे बगियन की

शरद ऋतु मेरे बगियन की स्वेत चांदनी बिखरी पड़ी है ठंडी आहें भरे बावरी बयार मेरी कांच की बगियन में झूमे अमलतास झूमे मैगनोलिया कांच की चादर ओढ़े झूमती धरा मेरी स्वेत बगियन में कांच की बालियाँ पहने थिरकती गुलाब की कोमल पाँखुरी मेरी चांदनी बगियन में कांच के कंगन पहनकर खनखनाता पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा मेरी उज्ज्वल बगिया में शीतल पौन चूमती पत्तियों के ठन्डे कपोलों को मेरी दमकती बगियन में उत्तरी ध्रुव से झूमती आयी शरद की मादक पावन बेला मेरी हर्षाती बगियन में (किशन नेगी ‘ऐकांत’ )

अविरल यात्रा

अविरल यात्रा चलते चलतेउबड़-खाबड़ राहों मेंमुसाफ़िर ठहर गया कुछ सोचकरदेखता मुड़कर पीछेअपने ही पांवो के निशाँदबे थे जिनके नीचे कुछ दर्दकुछ वेदनाओं के असहनीय घावअतीत की ख़ौफ़नाक परछाईयाँकुछ भूली-बिसरी यादेंजिन्हें वह भूल जाना चाहता हैमगर कुछ जख्म जो अभी हरे थेरुक-रुक कर चुभते थे बन कर सूलअतीत के बंद काले पन्नेकभी चिढ़ाते, कभी घूरते उसकोसिंदूरी आँचल तले ढलती सांझसूरज भी हुआ मध्यम क्षितिज मेंभोर के चले पंछी थकान समेटेलौट चले रात्रि विश्राम कोअचानक दे कर तिलांजलिअसमंजस के क्षणों कोबढ़ चले ठिठकें कदम मुसाफिर केशायद अहसास हो चला था उसे किकर्मयोगी ही रहता है सदाअग्रसर अपने कर्मपथ पर(किशन नेगी ‘एकांत’ )

पड़ोसी लौट आ

पड़ोसी लौट आ एक वक्त वह भी देखा था मैंने बचपन मेंजब पड़ोसी भी हुआ करता था मेरे परिवार का एक अहम् सदस्य घर के अनेक निर्णयों में होती उसकी अनूठी भागीदारी सुख-दुःख का परम मित्र फुर्सत के क्षणों का अद्भुत साथी तन्हाई भरे लम्हों में झरते आंसुओं की भाषा समझता और आज उम्र के इस पड़ाव में देखता हूँ कि मेरे ही परिवार के सदस्य बन गए हैं एक दूजे के पडोसी और धूल की परतों में लिपटा हुआ मैं उनका पडोसी (किशन नेगी ‘एकांत’ )  

इन आँखों की मस्ती

इन आखों की खुमारी, इन आँखों की मस्ती, नीली झील में तैरती, प्यार की कोई कश्ती। शबनम की नन्हीं बूंदें, इन्हीं नैनों में बसती है, इन्हीं की अंजुमन में, चांदनी रात सजती है। इन मदहोश आँखों से, भर गए हैं सारे पैमाने, चली है जब से ये खबर, बंद पड़े हैं मयखाने। चारु चंद की चंचल किरणें, दमकती पल-पल, जिनकी आहट से, सारे जहाँ में मची हल-चल। रातें भी कटती नहीं, तेरी यादों की तन्हाईयौं में, दिल ढूंढता है तुझे, धड़कनों की शहनाइयों में। झील-सी नीली आँखों में, कभी मेरा सारा जहाँ, दिल-ए-नादाँ तड़पता यहाँ, तड़पती है तू कहाँ ] इन Continue reading इन आँखों की मस्ती

बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ

बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ सुरक्षित नहीं अब तू इस धरा पर पहले से राक्षस घात लगाए बैठे हैं हूँ अबला इसलिए सक्षम नहीं कि रक्षा कर सकूँ तेरी क्योंकिं यहाँ खतरे में मेरी भी आबरू अगर तू आ भी गयी मेरी दहलीज पर तो ये नरभक्षी नोच डालेंगे तुझे तब देख न पाएंगी मेरी सहमी आंखें चीरहरण तेरा इन दरिंदों के हाथों अस्मिता तेरी सुरक्षित है तभी तक जब तक धरे न पाँव तू इस जमीं पर मेरी अजन्मी बेटी कहते सब हैं बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ पर जब आती है बेटी घर में खुशियों की सौगात लेकर न जाने Continue reading बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ

लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग)

लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग) चांदनी रात में मुस्कुराते हुए चाँद को देख पत्नी के दिल में प्रेम के बादल बहकने लगे जैसे किसी रूठे हुए बांसुरी के अनजान सुर बसंत के आँगन में खुशबु बन महकने लगे फिर बोली साजन से बोलो मुझे दो ऐसी बातें पहली बात से हो जाऊँ मैं ख़ुशी से रसगुल्ला और फिर कहो बात दूसरी कोई मेरे सनम सुन कर जिसे हो जाऊँ में तुरंत आग बबूला सुनो जानम कहता हूँ दिल की पहली बात देखा है जब से चाँद तुम ही मेरी ज़िन्दगी हो नहाये जब ये चाँद झील-सी नीली आँखों में Continue reading लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग)

कहीं मैं ही न निपट जाऊँ (हास्य-व्यंग)

कहीं मैं ही न निपट जाऊँ (हास्य-व्यंग) मन्नत मांगने सुबह-सुबह पति-पत्नी गए शिव मंदिर मन्नत का धागा बाँधने पत्नी ने जैसे ही हाथ उठाया अचानक मन में उसके आया कोई ख्याल पुराना मन्नत का धागा बांधे बिना उसने नीचे हाथ झुकाया हक्का-बक्का बेचारा पति बोला अपनी सुहागन से हे भागवान, क्यों नहीं बाँधा तुमने धागा मन्नत का किस ख्याल में डूबी हो, न करो कोई सोच-विचार बाँध दो धागा अगर भोगना है सुख तुमने जन्नत का पत्नी मुस्कुराकर बोली मन्नत मांगने ही वाली थी मैं कि ईश्वर दूर कर दे मेरे सुहाग की मुश्किलें तमाम फिर मन में विचार आया Continue reading कहीं मैं ही न निपट जाऊँ (हास्य-व्यंग)

डस ले, डस ले (हास्य-व्यंग)

डस ले, डस ले निभाकर धर्म कड़वा चौथ का पति-वता पत्नी सो रही थी चैन से सितारों की झिलमिल बारात को निहार रहा था चाँद अपने नैन से अधीर पति ने देखा पत्नी के पास कुंडली लगाए बैठी थी एक नागिन सोलह शृंगार में दुल्हन-सी सजी जैसे हो किसी नाग की सुहागिन ख़ुशी से पागल पति धीरे से बोला डस ले, डस ले, अच्छा अवसर है कोटि-कोटि नमन करता हूँ तुझे हे नागिन तुझे भला किसका डर है चुप कमीने, फुँकार कर बोली नागिन दीदी को चरण वंदना करने आयी हूँ कभी लगे न इसको तेरी बुरी नज़र नाग देवता Continue reading डस ले, डस ले (हास्य-व्यंग)

कल वक्त मेरा भी होगा

कल वक्त मेरा भी होगा वक्त, मैंने किताबों में पढ़ा है करता नहीं तू किसी का इंतज़ार माँ की कहानियों में सुना है अक्सर फुर्सत के पल होते नहीं तेरे पास फिर क्यों तू टुकुर-टुकुर देखता मरता है जब कोइ निर्धन भूख से क्यों नहीं है तुझे कोई खबर लुटती है अस्मत जब बेटी की तूफान बनकर आया चोरी-चोरी बुझा दी रोशनी टूटी झोपडी की टपका बारिश बनकर उसकी छत से भीगा दिया कम्बल फिर गरीब का है बस औकात तेरी इतनी कि तू फिसल जाता है हर बार हाथ से जिस दिन होगा वक्त लाचार का शायद रफ़्तार तेरी Continue reading कल वक्त मेरा भी होगा

वक़्त

वक़्त वक्त तू रहता कहाँ है कहाँ बनाया है तूने बसेरा हो अगर कोई पता ठिकाना मुझे भी इक दिन बतलाना होगी वह कौन-सी डगर जिधर से अक्सर गुजरता है फुर्सत मिले जब कभी तुझे यार मुझे भी साथ ले चलना जब भी बाँधना चाहा तुझे पलों की रेशम की डोर से जाने कहाँ गुम हो जाता फिसली हो जैसे रेत मुट्ठी से थकान भी थक गयी है राह तेरी देखते देखते दिनकर भी हुआ ओझल तेरे ही मिलन की आस में कब होती है तेरी सुबह होती है कब तेरी रात क्या कोई रंग-रूप है है क्या कोई आकार Continue reading वक़्त