About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

बेसुध सन्नाटा

रात के बेसुध सन्नाटे में मिला न कोई अपना बेचैन आँखें ढूंढ रही थी बचपन का खोया सपना सहमे-सहमे थे सभी पत्ता-पत्ता और बूटा-बूटा धड़कनें भी थक गई थी और दिल भी था टुटा-टूटा सितारे भी डूबे उदासी में चाँद भी था खोया-खोया चांदनी धुंधली पड़ी थी देवदार भी था सोया-सोया मगर पग मेरे रुके नहीं डिगा नहीं कर्म-पथ पर विचलित न हुआ अंगारों से चलता रहा अग्नि-पथ पर क्योंकि छूनी थी मंज़िल चंचल भोर होने से पहले ज्वालामुखी को ललकारा तूफान के रोने से पहले रात के बेसुध सन्नाटे में मिला न कोई अपना बेचैन आँखें ढूंढ रही थी Continue reading बेसुध सन्नाटा

मिले जब कोई अजनबी

जिंदगी के अन्तहीन सफ़र में, जब कोई अजनबी मिल जाता है। विरान चमन में न जाने क्यों, एक ताज़ा पुष्प खिल जाता है। तनहाई में सोये अरमानों संग, चुलबुला दिल भी बहल जाता है। अब तो बिना उसकी कल्पना के, जिंदगी का हर पल दहल जाता है। जब वह अपने उष्ण अधरों से, कोमल कपोलों को चूम लेता है। चंचल आषाढ़ की अंगड़ाई में, अधीर चातक भी झूम लेता है। चलते-चलते टेढ़ी-मेढ़ी राह पर, जब कोई चेहरा मिल जाता है। अनायास ही खोया हुआ बचपन, मचल कर फिर से खिल जाता है। जब देखूं चेहरा उस अजनबी का, कोई पराया Continue reading मिले जब कोई अजनबी

मिले जब कोई अजनबी

जिंदगी के अन्तहीन सफ़र में, जब कोई अजनबी मिल जाता है। विरान चमन में न जाने क्यों, एक ताज़ा पुष्प खिल जाता है। तनहाई में सोये अरमानों संग, चुलबुला दिल भी बहल जाता है। अब तो बिना उसकी कल्पना के, जिंदगी का हर पल दहल जाता है। जब वह अपने उष्ण अधरों से, कोमल कपोलों को चूम लेता है। चंचल आषाढ़ की अंगड़ाई में, अधीर चातक भी झूम लेता है। चलते-चलते टेढ़ी-मेढ़ी राह पर, जब कोई चेहरा मिल जाता है। अनायास ही खोया हुआ बचपन, मचल कर फिर से खिल जाता है। जब देखूं चेहरा उस अजनबी का, कोई पराया Continue reading मिले जब कोई अजनबी

प्रेम सेतु

मैं और तुम हैं नदी के दो किनारे, जिन्हें खुदा भी जोड़ नहीं सकता। मगर मैंने तो थामा है हाथ तुम्हारा, जिसे मैं कभी छोड़ नहीं सकता। प्रेम बनेगा सेतु हम दो तटों के बीच, जिसे सैलाब भी तोड़ नहीं सकता। तटों के बीच बहती प्रेम धारा को, प्रचंड तूफ़ान भी मोड़ नहीं सकता। मैं और तुम हैं नदी के दो किनारे, जिन्हें खुदा भी जोड़ नहीं सकता। (किशन नेगी)

यूँ टुकुर-टुकुर ना देखा करो

यूँ टुकुर-टुकुर ना देखा करो चेहरे को आँचल से ढक कर, यूँ टुकुर-टुकुर ना मुझे देखा करो। मेरी आँखों का नूर हो तुम सनम, यूँ गैर बनकर ना मुझे देखा करो। मेरे दिल की धड़कन हो तुम, अजनबी बनकर न धड़का करो। दिल की बात ग़ज़ल में कहती हो, यूँ हर बात पर ना भड़का करो। बनकर हसीं सावन की घटा, यूँ बादलों को ना सताया करो। प्यासे दिलों की धड़कन हो तुम, यूँ गीत विरह का ना गाया करो। दिल की खिड़कियाँ तोड़ कर, यूँ मेरे ख़्वाबों में ना आया करो। दिल की बात दिल को बताकर, यूँ तड़पाकर Continue reading यूँ टुकुर-टुकुर ना देखा करो

गज़ल

भरोसा किया था जिन पर, वही आज पराये हो गए, अपने ही क़दमों के निशान, न जाने कहाँ खो गए | मिटाने चले थे हस्ती हमारी, मगर खुद ही मिट गए, अपनी ही सजाई महफिल में, ज़नाब खुद ही पिट गए| कदम जो पड़े उनके मयखाने में, शराब बरसने लगी, आँखों से उनकी पीने को, आज ग़ज़ल भी तरसने लगी। चल कर तेरी महफ़िल में, आज खुद शबाब आया है, एक हाथ में ग़ज़ल और एक हाथ में शराब लाया है। वो आयी जब मेरी मज़ार पर, मुर्दे भी मचलने लगे, बिजली लगी चमकने, दीवाने बादल भी गरजने लगे। दीवानों Continue reading गज़ल

जैसे कल ही की बात हो

पल थे कितने सुहावने वह जिए जो हमने साथ-साथ हर पल एक नया अहसास था हर पल था नई उमंग से भरा क्यों पल-पल याद आते हैं वह बीते पल जैसे कल ही की बात हो कितना ख़ुशगवार था वह चंचल मौसम मदहोश झोंके जब उन्मुक्त पवन के सहलाते थे हमारे रंगीन ख़्वाबों को अपने शीतल अहसासों से आज भी वह मौसम भुला नहीं ये दिल जैसे कल ही की बात हो पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा कैसे छिपकर सुनते थे हमारी मन की बातें पंखुड़ियां तरुण गुलाब की खिलती थी हमारी अबोध शरारत देख कर क्यों हर याद रच-बस गई मेरी आखों Continue reading जैसे कल ही की बात हो

व्यथित मन की वेदना

कहूँ किससे अस्थिर मन की वेदना, नहीं किसी चेहरे को फुर्सत यहाँ। अपरिचित राहों में भागता हर कोई, मुठ्ठी में समेट लेने को सारा जहाँ। चाँद देख क्यों सकुचाता है ये मन, क्यों भरता ठंडी-सांसे ये हर पल। है त्रिषित सदियों से तन्हाइयों में, बुझे प्यास कैसे बिन शीतल जल। निर्जनता की अजनबी परछाई भी, लगी है मुरझाने देख इस मन को। शीतल बयार की चंचल झोंके अब, नहीं छूते इसके कुम्हलाये तन को। टूटे तार इसकी घायल वीणा के, अपने मीठे सुरों से संवारेगा कौन। चहकते थे जो कल तक संग इसके, फेर कर नज़रें क्यों हो गए हैं Continue reading व्यथित मन की वेदना

वो मैं ही था

वो मैं ही था जब कभी चांदनी रात में बैठ गाँव के तल्लैया किनारे निहारा करती थी तुम प्रीतिबिम्ब चाँद का तो कोई चुपके से फेंक कर कंकड़ कर देता धुंधली तस्वीर चाँद की वो कोई और नहीं, मैं ही था बदल-बदल कर करवटें पूर्णिमा की रात को जब तुम बुना करती थी सुनहले खवाब अपनी कल्पनाओं के राजकुमार संग तो कोई चुपके से चुरा लेता ख्वाब तुम्हारे देकर दस्तक तुम्हारे दिल की खिड़की पर वो कोई और नहीं, मैं ही था क्या तुम्हें याद है जब तुम सो जाया करती थी बेसुध हो कर पलटते-पलटते किताब के पन्ने तो Continue reading वो मैं ही था

दिनकर की गरिमा

शैल शिखर पर तेजस्वी दिनकर लगा उंडेलने अपनी सहस्र रश्मियों से स्वर्णराशि भानु की स्वर्णिम आभा से ओत-प्रोत होने लगा सारा परिसर अनायास ही शांतचित्त झील का शीतल, निर्मल जल भी लगा समेटने उस स्वर्णिण आभा को अपने मार्मिक आगोश में जल में तैरते कमलपुष्पों के दल झूम उठे आनंदमय होकर पाकर सूर्य-रश्मियों के स्पर्श उनका सिकुड़न एवं संकुचन हो गए विलीन आनंद के सागर में और खुलने लगे उसके बंद मुँह उनकी कलियाँ थी आतुर भास्कर की अरुणिमा के अवलोकन को शीतल समीर के मंद-मंद झोंके भी टकराकर इन कमलपुष्पों से सुगंध-सुरभि फैला रहा था वातावरण में हिमगिरि जो Continue reading दिनकर की गरिमा

मैं और मेरा साया

मैं और मेरा साया अक्सर ये बातें करते हैं कि अगर तू न होता तो कौन होता मेरा हमसफ़र इस टेडी-मेढ़ी राहों में कौन लगाता लेप अनुराग का मेरे रक्तमय जख्मों पर और अगर मैं न होता तो क्या होता तेरे अस्तित्व का कौन सुनता तेरी मन की वेदना और कौन पोंछता पसीना तेरा चिलचिलाती दोपहर में मैं और मेरा साया अक्सर ये बातें करते हैं कि निभाए वचन हम दोनों ने अपने-अपने रहे प्रतिबद्ध अविरत एक दूजे के लिए मगर ज़िन्दगी की सांझ में आएगा पल एक ऐसा भी बिछुड़ना होगा जब सदा के लिए और कहना होगा अलविदा Continue reading मैं और मेरा साया

अद्वितीय प्रयोजन

हे मानव!  तराशा जिसने तुझे भेजा है उसीने तुझे अपना दूत बनाकर इस विलक्षण धरा पर एक अनूठे प्रयोजन के लिए है जितना महान व कुलीन यह कार्य उतना ही संकटपूर्ण एवं चुनौतियों से है भरा हुआ इस भावी कार्य के लिए तपना होगा तुझे अभी से कर्मों के प्रचंड अग्नि-कुंड में जिसकी ज्वाला की तपन से निखरेगा  तेरा शरीर, मन एवं आत्मा मगर हे मनुष्य! रहे ध्यान कि शरीर तेरा हो इतना ठोस सहन कर सके जो असंख्य वारों को, असीम रक्त-रंजित घावों को मन तेरा ऐसा फौलादी हो छू न सके जिसे मान-अपमान निंदा-स्तुति गला न सके भस्म Continue reading अद्वितीय प्रयोजन

अक्षत यौवन

अक्षत यौवन तेरी गरम साँसों की महक से, बौराया है तेरा चंचल चितवन। चांदनी रात को करे सुगंधित, गंधसार-सा तेरा रुपहला बदन। खिलती धूप-सी तू चपल यौवना, कितना ज्योतर्मय तेरा लड़कपन। हर दिल की उत्कंठित तृष्णा तू, कितना मार्मिक तेरा अल्हड़पन। सांसें क्यों थम-सी जाती हैं मेरी, देखूं जब तेरा अबोध चंचलपन। अंगड़ाई लेती जब तेरी तरूणाई, बढ़ जाती ब्रह्माण्ड की धड़कन। शुक्रिया करूँ कैसे उस ख़ुदा का, जिसने तराशा तेरा मासूम बचपन। तेरी गरम साँसों की महक से, बौराया है तेरा चंचल चितवन। चांदनी रात को करे सुगंधित, गंधसार-सा तेरा रुपहला बदन।   (किशन नेगी)

रे कर्मयोगी! तनिक धीरज धार

रे कर्मयोगी! तनिक धीरज धार रे मुसाफिर तनिक ढांढस धार न हो चिन्तातुर इन पथरीली राहों में न कर मन को उद्विग्न कंटीले पथ पर चला-चल चला-चल निर्विराम निस्संदेह मंजिल पायेगा तू अवश्य विराजते हैं वह ही विजय-सिंहासन पर ललकारता जो बाधाओं को रण-भूमि पर चीर दे सीना उस दुश्मन का, करे जो घृष्टता उसके विजयरथ को रोकने का रे मुसाफिर तू चला-चल अविरल और बन जा कर्मनिष्ठ बटोही अपने कर्मपथ पर धनुर्धारी कर्ण ने जैसे था ललकारा पांडवों को कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर और देख उसका अदम्य साहस थर्रा गए थे देवता भी बनकर वीर कर्ण, कर दे धराशायी Continue reading रे कर्मयोगी! तनिक धीरज धार

बचपन की वह अक्षुण्ण यादें

बचपन की वह अनछुई यादें तड़पाती हैं जो व्याकुल मन को आज भी तेरा वह चपल अल्हड़पन वो नादानी और वो चंचल लड़कपन क्या भूल पाऊंगा कभी पनघट की पगडंडियों पर धानी चुनरिया लहरा के इठलाना अधजल गगरी कमर में लटकाये मटक-मटक कर तेरा वह पग धरना रिम-झिम बूंदों संग तेरा वह राग मेघ गुनगुनाना भूल पाऊँगा कैसे तेरी वह मंद-मंद शरारत भरी मुस्कान घायल किया जिसने न जाने कितने पथिकों को कितने मुसाफिरों को घायल है आज भी मेरा नादान दिल उन तीखे बाणों से चलाये थे तूने जो अपनी उन्मत आँखों से काश! भूल पाता उन पुरानी यादों Continue reading बचपन की वह अक्षुण्ण यादें