About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

अक्षत यौवन

अक्षत यौवन तेरी गरम साँसों की महक से, बौराया है तेरा चंचल चितवन। चांदनी रात को करे सुगंधित, गंधसार-सा तेरा रुपहला बदन। खिलती धूप-सी तू चपल यौवना, कितना ज्योतर्मय तेरा लड़कपन। हर दिल की उत्कंठित तृष्णा तू, कितना मार्मिक तेरा अल्हड़पन। सांसें क्यों थम-सी जाती हैं मेरी, देखूं जब तेरा अबोध चंचलपन। अंगड़ाई लेती जब तेरी तरूणाई, बढ़ जाती ब्रह्माण्ड की धड़कन। शुक्रिया करूँ कैसे उस ख़ुदा का, जिसने तराशा तेरा मासूम बचपन। तेरी गरम साँसों की महक से, बौराया है तेरा चंचल चितवन। चांदनी रात को करे सुगंधित, गंधसार-सा तेरा रुपहला बदन।   (किशन नेगी)

रे कर्मयोगी! तनिक धीरज धार

रे कर्मयोगी! तनिक धीरज धार रे मुसाफिर तनिक ढांढस धार न हो चिन्तातुर इन पथरीली राहों में न कर मन को उद्विग्न कंटीले पथ पर चला-चल चला-चल निर्विराम निस्संदेह मंजिल पायेगा तू अवश्य विराजते हैं वह ही विजय-सिंहासन पर ललकारता जो बाधाओं को रण-भूमि पर चीर दे सीना उस दुश्मन का, करे जो घृष्टता उसके विजयरथ को रोकने का रे मुसाफिर तू चला-चल अविरल और बन जा कर्मनिष्ठ बटोही अपने कर्मपथ पर धनुर्धारी कर्ण ने जैसे था ललकारा पांडवों को कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर और देख उसका अदम्य साहस थर्रा गए थे देवता भी बनकर वीर कर्ण, कर दे धराशायी Continue reading रे कर्मयोगी! तनिक धीरज धार

बचपन की वह अक्षुण्ण यादें

बचपन की वह अनछुई यादें तड़पाती हैं जो व्याकुल मन को आज भी तेरा वह चपल अल्हड़पन वो नादानी और वो चंचल लड़कपन क्या भूल पाऊंगा कभी पनघट की पगडंडियों पर धानी चुनरिया लहरा के इठलाना अधजल गगरी कमर में लटकाये मटक-मटक कर तेरा वह पग धरना रिम-झिम बूंदों संग तेरा वह राग मेघ गुनगुनाना भूल पाऊँगा कैसे तेरी वह मंद-मंद शरारत भरी मुस्कान घायल किया जिसने न जाने कितने पथिकों को कितने मुसाफिरों को घायल है आज भी मेरा नादान दिल उन तीखे बाणों से चलाये थे तूने जो अपनी उन्मत आँखों से काश! भूल पाता उन पुरानी यादों Continue reading बचपन की वह अक्षुण्ण यादें

मैं पथिक अज़नबी

इन अनजानी राहों में देखो कोई आ रहा है देखो कोई जा रहा है मन में कोई गीत गुनगुना रहा है कुछ विरह के, कुछ तड़पन के इन दुर्गम पगडंडियों में देखो कोई गिर रहा है देखो कोई चल रहा है मन में कोई गीत गा रहा है कुछ मायूसी के, कुछ उमंग के इन अज़नबी हवाओं में देखो कोई बहक रहा है देखो कोई महक रहा है मन में कोई गीत छेड़ रहा है कुछ मिलन के, कुछ बिछुड़न के इन अँधेरी गलियारों में देखो कोई भटक रहा है देखो कोई संभल रहा है मन में कोई गीत बुन Continue reading मैं पथिक अज़नबी

क्यों?

क्यों? तेरे धुंधली स्वप्नों की विस्मृति में, मन का उन्माद निखरता क्यों? सुरभित लहरों की उमंगों में, सागर का वैभव बिखरता क्यों? रुपहली रातों की शीतल छाया में, तारों की तरूणाई बहकती क्यों? माना मेरा भाग्य गगन धुंधला-सा, पर तुम उस पर थिरकती क्यों? किरणें बन तू दे उज्ज्वल आभा, नटखट दिनकर दमकता क्यों? मैं नित्य अतृप्त प्रेम भिखारी तेरा, त्रिषित दिल फिर तड़पता क्यों? कोमल ह्रदय के उष्ण अंचल में, आत्मोत्सर्ग की अतृप्ति क्यों? गोधूलि के धूमिल रजत पट पर, चांदनी रात की दिव्य दीप्ति क्यों? मेरी तीव्र पीड़ा पर छिड़केगी तू, कुसुम-धूलि मकरंद घोल क्यों? असह्य विरह की Continue reading क्यों?

रे मुसाफ़िर! रुकना तेरी नियति नहीं

रे मुसाफ़िर चलना तेरा काम रुकना तेरी नियति नहीं तू स्वयं अपना भाग्यविधाता कर्मठ कर्मयोगी बनकर करले धारण कर्मशील कवच उमंग तेरा खड्ग उत्साह तेरा चांदनी रथ बनाकर ढाल अपने प्रचंड पराक्रम को बन स्वयं सारथी इस आलोकित रथ का और झोंक दे स्वयं को कर्मों के इस अग्नि-कुंड में पसीना बहेगा-बहने दे लहू बहेगा-बहने दे शैल शिखर बनकर ललकारना उस आंधी और तूफान को जो करे दुस्‍साहस तेरे कर्मपथ पर बनकर निर्भीक सिपाही पायेगा अवश्य तू अपनी मंज़िल गायेंगे मंगल गीत चाँद और सूरज और गूंजेगी हर्षध्वनि तेरे विजयपथ पर हिमगिरि के उतुंग शिखर बैठ आज भाग्य भी तुझे Continue reading रे मुसाफ़िर! रुकना तेरी नियति नहीं

इधर सांझ भी अलसाई है

इधर सांझ भी अलसाई है लौट चले है पंछी नीड़ में, तिमिर जो गहराई है, क्षितिज है मुस्कुराता, इधर सांझ भी अलसाई है| बयार पग धरे मंद-मंद, डूबती लालिमा मुस्कुराई है, क्लांति छाई नील गगन में, इधर सांझ भी अलसाई है। खोई-खोई-सी निशा है, खोई-सी उसकी तनहाई है, बेक़रार वह पिया मिलन को, इधर सांझ भी अलसाई है। मध्यम हुई बेचैन किरणें, धुंधली दिनकर की परछाई है, अधीर मुस्कान लिए लताऐं, इधर सांझ भी अलसाई है। आकुल मेघा चली परदेश को, पूरब दिशा भी शरमाई है, बेक़रार क्यों है हर दिल यहाँ, इधर सांझ भी अलसाई है। प्रचण्ड अहसासों के Continue reading इधर सांझ भी अलसाई है

जिंदगी तेरा फिर से शुक्रिया कि

ऐ ज़िन्दगी तूने कहा चल और मैं चला उन राहों में बिछाए थे तूने जहाँ अनगिनित चट्टानी पत्थर मैंने ठोकर खाई, गिरा और फिर सम्भला अपने ही पावों पर जिंदगी तूने कहा कर्म कर उन पगडंडियों पर चल कर काँटों के जंगल जहाँ बिछाए थे तूने मैं चला, पावं हुए रक्तरंजित पर मैं रुका नहीं, डिगा नहीं, चलता रहा निरन्तर अपने कर्मपथ पर बनकर कर्मठ कर्मयोगी बनकर कर्मशील बटोही जिंदगी तूने कहा उड़ नील गगन में उन पंखों के सहारे लहूलुहान कर दिया था जिन्हें तूने मगर मैं उड़ा, गिरा, फिर उड़ा बैठकर उत्साह के चांदनी मंगल रथ पर लगा Continue reading जिंदगी तेरा फिर से शुक्रिया कि

जो तुमसे मुलाकात हो गई

जो तुमसे मुलाकात हो गई गए थे मयख़ाने हम, ज़िन्दगी के ग़म भुलाने को, भूले ग़म सारे जहाँ के, जो तुमसे मुलाकात हो गई! रात के अँधेरे में देखा जब, तेरा चाँद-सा मुखड़ा, मेरी वीरान ज़िन्दगी में, फिर से चांदनी रात हो गई! झील-सी नीली आँखों से, जब बरसने लगे मोती, बादल तो गरजे नहीं, मगर क्यों बरसात हो गई! तेरी जुल्फों के साये में, खुद को भूल गए थे हम, तू खोई थी तन्हाई में और हमें हवालात हो गई! तन्हाई में तेरे बिन, करवटें लेकर गुजरी है रातें, जिंदगी के खेल में, ज़िन्दगी ही शह-मात हो गई! कवी Continue reading जो तुमसे मुलाकात हो गई

क्यों डरना रात के अंधकार से

क्यों डरना रात के अंधकार से रात के ख़ौफ़नाक अन्धकार से क्यों भागते हैं हम क्यों डरते हैं हम क्यों कतराते हैं हम धरते क्यों नहीं पग अपने हम रात के अँधेरे में जबकि झरती हैं जीवन की कई धाराएँ इसी अँधेरी रात के निर्मल झरनों से जो छूती हैं दहलीज़ हमारी मंज़िल की जो स्पर्श करती हैं हमारे मार्ग की माटी को जो जगाती हैं हमारे सोये हुए अहसासों को और दिखाती हैं हमें हमारे मंज़िल की खिड़की रात का अपरिचित सन्नाटा इतना अशुभ नहीं होता इतना निष्ठुर नहीं होता इतना क्रूर नहीं होता तो फिर क्यों सहमते हैं Continue reading क्यों डरना रात के अंधकार से

क्या करूँ! ये दिल बेईमान है

क्या करूँ! ये दिल बेईमान है हे प्रियतमा, झटकती हो जब तुम अपने गीले केशों को छज्जे पर खड़े हो कर तो दिल मेरा करता है त्ताक-झांक तेरी अजनबी दुनिया में, और निहारता है तेरी अनछुई यौवन की अंगड़ाई को समझाने से समझे ना ये दिल क्या करूँ! ये दिल बेईमान है हे प्रेयसी, मध्य-रात्रि को जब तुम सखियों संग चाँद की चांदनी में तलैया किनारे चांदनी-स्नान करती हो तो भीगे वस्त्रों से छन् कर आती तुम्हारी सुंदरता को देख चाँद भी शरमा कर बादलों की ओट में छिप जाता है, और मेरा नादान दिल भी चोरी-चोरी कनखियों से झांककर Continue reading क्या करूँ! ये दिल बेईमान है

कहाँ थे, और कहाँ हैं हम

कहाँ थे, और कहाँ हैं हम कहाँ थे, कहाँ हैं, और कल कहाँ होंगे हम साथ लेकर चले थे जो कहाँ भटक गए वो कदम हिमालय के चुम्बन को चले थे कहाँ अदृश्य गए वो करम अपने ही पगों के भूले निशाँ न लज़्ज़ा, न आती हमको शर्म कर्म-पथ पर अग्रसर हैं क्यों सींचते हैं ऐसे भ्रम बयार शीतल आई पूरब से मगर अहसास क्यों इसके गरम धरम का ज्ञान देने चले थे मगर क्यों भूले अपना ही धरम जो कदम उठे थे जोश में अचानक क्यों पड़ गए हैं नरम जख्मों से बहता रुधिर हमारे लगाएगा कौन इन पर Continue reading कहाँ थे, और कहाँ हैं हम

रे दर्पण तू झूठ न बोले

रे दर्पण तू झूठ न बोले जीवनकाल के इस लम्बे सफर में देखे हैं अनगिनित उतार-चढ़ाव की ढलानें मैंने एक दिन अनायास ही क्लान्ति की रेखाएं लगी उभरने मेरे परिश्रांत मुखाकृति पर मन ने कहा कि तनिक रुक, और विराम दे अपनी दिशाहीन यात्रा को काल की शीतल छाँव में बिसरा ले और कर विचार कि तूने इस सफर में क्या खोया-क्या पाया मैंने कर्मों के दर्पण में निहारा चेहरा अपना उस धूमिल छवि पर असंख्य परतें धूल की क्रूर निगाहों से घूर रही थी मुझे तभी एक हल्की-सी गूँज ने दी दस्तक़ मेरे कानों में जो कह रही थी Continue reading रे दर्पण तू झूठ न बोले

रे मनुआ! अब तो धीरज धार

रे मनुआ! अब तो धीरज धार क्यों होता व्याकुल इतना, व्यथा होता क्यों बेचैन चैतन्य को बना सारथी, सूर्यरथ होकर पर सवार रे मनुआ! अब तो धीरज धार रे मनुआ! अब तो धीरज धार भोर भई अब आंखें खोल, बावरे क्यों तू सोवत है पतवार संभाल अपनी, कश्ती है तेरी मंझधार रे मनुआ! अब तो धीरज धार रे मनुआ! अब तो धीरज धार प्राण पखेरू हो जायेंगे जब, कब तू जागत है सह ले पीड़ा अपनी, कोई ना सुने तेरी पुकार रे मनुआ! अब तो धीरज धार रे मनुआ! अब तो धीरज धार अपनी पीड़ा तू ही जाने और न Continue reading रे मनुआ! अब तो धीरज धार

मेरी इकलौती परछाई

मेरी इकलौती परछाई गुजरा जब तेरे हुस्न का काफ़िला हवाओं के संग मेरे गाँव से होकर बादल भी चले संग तेरे-तेरे और बदला मौसम का भी मिज़ाज़ लेकिन हम न कर सके दीदार तेरे हुस्न के चाँद का क्योंकि उन रुपहले पलों में मैं रात के घने अँधेरे में, बलखाती सन्नाटे की उबड़-खाबड़ पगडंडियों किनारे खोज रहा था अपनी ही परछाई को जो शायद तुम्हारे हुस्न की तरुणाई देख सिमट गई थी कहीं रात के सन्नाटे के अंचल की ओट में कुछ शर्माकर-कुछ सकुचाकर खोकर तुम्हें अब नहीं खोना चाहता अपनी इकलौती परछाई को जो चलती है हरदम संग मेरे Continue reading मेरी इकलौती परछाई