About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

जिम्मेदारी का अहसास

कुछ वर्ष पहले नीम का एक नन्हा पौंधा उगाया था मैंने अपने घर के आँगन में तब वह नन्हे बालक की भांति खेलता था हवा के झोंकों से मतवाली हवा भी सहलाकर उसके कोमल पत्तियों को थी झूमती खिलखिलाकर रिमझिम बरसात की बूंदों से अटखेलियाँ करना उसे भाता था उन बूंदों के कोमल स्पर्श से खिल उठता था, भीग कर उन बूंदों में अबोध बालक की तरह किलकारियाँ मारता मैं उसका बहुत ध्यान रखता था समय पर पानी देना समय पर खाद देना जैसे मेरी दिनचर्या थी उसके मासूम गालों को सहलाकर असीम आनंद अनंत हर्ष की अनुभूति होती थी Continue reading जिम्मेदारी का अहसास

आखिरी रोटी भिखारी को (हास्य-व्यंग)

घर में खुशहाली लाने का कोई उपाय पूछने चिंतातुर पत्नी पहुंची पांडे पंडितजी के पास शरणागत होकर बताई अपने दिल की वेदना नहीं है सुख शांति घर में उपाय बताओ खास नैनों में देख झरते अश्क इक अबला नारी के पंडित जी के ख्वाब आसमान में टहलने लगे सोलह शृंगार संपन्न मोहिनी से मिलते ही नज़र दिल में दबे अरमान आज फिर से मचलने लगे प्रेम सागर में लगाकर डुबकी पंडित जी बोले सुंदरी, चाहती हो अगर घर में खुशहाली लाना बताता हूँ अचूक उपाय, पहली रोटी गाय को आखिरी रोटी किसी भिखारी को ही खिलाना प्रेम सिंधु की लहरों Continue reading आखिरी रोटी भिखारी को (हास्य-व्यंग)

बेचारा चुनाव चिह्न (हास्य-व्यंग)

बिगड़े पति की हरकतों से परेशान बीवी बोली सपने में भी मत सोचना मैं कभी तुमसे डरूंगी ये वादा है मेरा जानू अगर तुम ठीक से रहोगे भाजपा के चुनाव चिह्न से आपका स्वागत करुँगी लेकिन बावला पति रहता सदा अपनी धुन में किसी कली ने नहीं डाली इस भँवरे को घास पत्नी ने किया आगाह ज़्यादा चतुराई दिखाई तो फिर कांग्रेस का चुनाव चिह्न है सदैव मेरे पास दीवाने आशिक की हरकतें होती गयी हद पार भवंरा मंडराता कभी इस डाल, कभी उस डाल हर महफ़िल से बेआबरू हो कर निकला भवंरा मगर फर्क नहीं पड़ा उसे जैसे हो Continue reading बेचारा चुनाव चिह्न (हास्य-व्यंग)

रहने दो, पहले मैं भी बाई थी (हास्य-व्यंग)

उदास मेहबूबा को देख रसिक पति बोला जानू मैं तुम्हारा कृष्म, तुम हो मेरी राधा चांदनी रात में देखो कैसे झिलमिलाते तारे मगर मेरा पूनम का चाँद क्यों खिला आधा रूठी पत्नी बोली अब नज़र भी नहीं मिलाते यही नज़रें होती थी कभी तुम्हारी मधुशाला पत्नी को मनाने का ये हुनर सीखा कहाँ से मेरे महबूब हमें भी दिखा दो वो पाठशाला राधा को मनाने प्रेमातुर पति ने की ठिठोली हे सखा थक जाती हो अब रख लो इक बाई तुनक मिजाज पत्नी को जैसे सूंघ गया सांप पुरानी चोट शायद आज फिर उभर आयी भावुक हो कर पत्नी बोली Continue reading रहने दो, पहले मैं भी बाई थी (हास्य-व्यंग)

किसी की बला किसी के सर (हास्य-व्यंग)

घूँघट की ओढ़ में करुणा रस में पत्नी बोली सुबह मंदिर जाकर पूजा-पाठ किया कीजिए मांगो कोई वरदान अपनी अर्धांगिनी के लिए घर आकर फिर काम दूजा किया कीजिए तरकश से एक व्यंग वाण निकाल फिर बोली पूजा करने से टल जाएँगी आपकी सारी बलाएँ पत्नी व्रता के मन्त्रों का जाप कर स्वर्ग मिलेगा सीख जाओगे तुम ज़िन्दगी की अद्भुत कलाएँ व्यंग वाण से घायल पति तिलमिलाकर बोला मेरे ससुर जी ने की थी मंदिर जाकर पूजा सर्वप्रथम उन्होंने पहली कला से तुम्हें पाया पत्नी की आज्ञा से फिर किया काम कोई दूजा अपने घावों को देख जख्मी पति बुदबुदाया Continue reading किसी की बला किसी के सर (हास्य-व्यंग)

परेशान पति का कोई मज़हब नहीं होता (हास्य-व्यंग)

वो कभी वक्त का मारा तो कभी हुआ परेशान सिंधु लहरों में बह गए हैं उसके सभी अरमान कभी वह बंजर जमीं तो कभी खोखला आसमान रहम करो ऐसे पति पर आखिर वह भी है इंसान नहीं है कोई ठौर ठिकाना ना उसका कोई गाँव नसीब में नहीं है शायद पीपल की शीतल छाँव कंटीली डगर चलते रक्तरंजित हुए उसके पाँव खोटी तक़दीर पर कौवे भी मंडराते कांव-कांव गीता पढता वह ताकि मिल जाए उसे आज़ादी ग्रन्थ साहिब भी सुनता ताकि रुक जाए बर्बादी नित्य क़ुरान वह पढता बन कर उसका फरियादी जिसने ऐसा हाल किया वह थी उसकी शहज़ादी Continue reading परेशान पति का कोई मज़हब नहीं होता (हास्य-व्यंग)

डार्लिंग! वो तो जश्न मना रहा है (हास्य-व्यंग)

पति-पत्नी दोनों गए एक कॉकटेल पार्टी में जहाँ ग़मों के जाम पर जाम छलक रहे थे मदहोश मनचले जोड़े डाल बाहों में बाहें उन्मत हो मदिरा के समुन्द्र में बहक रहे थे चढ़ा कर एक जाम लड़खड़ाती पत्नी बोली डार्लिंग, टल्ली हो कर वह जो मटक रहा है ठुकराया था रिश्ता उसका मैंने एक दिन मुझे न पाकर अब देखो कैसे भटक रहा है पति बोला, नशे में वह नहीं तुम हो कामिनी ख़ुमारी में दिमाग तो तुम्हारा ही घूम रहा है तुम्हें ही न पाकर खुशनसीब है वह कितना, लगाकर जाम ख़ुशी के जश्न में झूम रहा है हाथ Continue reading डार्लिंग! वो तो जश्न मना रहा है (हास्य-व्यंग)

जले पर क्यों नमक छिड़कती हो (हास्य-व्यंग)

  थका चेहरा लटकाये पति घर लौटा जैसे पतझड़ में सावन की झड़ी हो झल्लाकर बोला खाना लगा दो जानू पत्नी जैसे छप्पन व्यंजन लिए खड़ी हो   भूखे ने जैसे ही खाया पहला निवाला उड़ गयी बेचारे की चेहरे की चमक आक्रोशित हो लगा पत्नी को कोसने क्या सब्जी में नहीं डाला था नमक   घबराई, फिर मुस्कुराकर बोली पत्नी जानू, भूखे पेट इतना नहीं बिगड़ते सब्जी जल गयी थी, माँ मेरी कहती है जले पर कभी नमक नहीं छिड़कते   जले-भुने पति ने निकाली दबी भड़ास मेरे जले पर नमक ही तो छिड़कती हो  तुम्हारे बाप ने बाँधा Continue reading जले पर क्यों नमक छिड़कती हो (हास्य-व्यंग)

अगर तुम ना होते मेरे पति (हास्य-व्यंग)

रसोई में बजाकर बर्तन सुबह-सुबह पत्नी झल्लाई अपने वफ़ादार दुल्हे पर चादर ताने देखते हो ख़्वाब पड़ोसन के और जलते हैं इधर ख़्वाब मेरे चूल्हे पर होती अर्धांगिनी अगर किसी राक्षस की शायद कभी ना होती मैं इतनी परेशान किस कर्मजले पंडित ने मिलाई कुंडली जो ढूंढ कर मिला तुम जैसा पति शैतान पति सकुचाया, फिर मुस्कराकर बोला भली हो तुम जैसे कश्मीर की वादी राक्षस को कैसे तुम वरमाला पहनाती जानू, खून के रिश्ते में नहीं होती शादी अगर होती तुम सुहागन राक्षस की सदैव कहलाती तुम उसकी दानवी काश, ये सपना अगर सच हो जाता मेरे ख़्वाबों में Continue reading अगर तुम ना होते मेरे पति (हास्य-व्यंग)

ये शाम कितनी मदहोश है

मखमली धुमिल चादर लपेटे ये शाम कितनी मस्तानी है मंथर गति से ढलता सूरज दस्तक देती रात की रानी है उन्माद में डूबा है नभमण्डल जैसे फैलाकर पंख असमानी धीमे पग धर बटोही चला है गठरी में बांधे ख्वाब अरमानी ले चुम्बन धान की बालियों का हवा गीत कोई गुनगुनाती है खेत किनारे थिरकती पीपल बांसुरी लिए राग एक सुनाती है ढलते सूरज की चंचल किरणें कुछ उदास, कुछ ग़मगीन हैं थकी-सी अनजान परछाईयाँ कदमों की आहट नमकीन हैं मंदिर की घंटी की धुन संग शाम ठुमक-ठुमक ढलती है पायल की झंकार थिरक कर ठंडी आहें भर कर चलती है Continue reading ये शाम कितनी मदहोश है

इश्क के बाज़ार में

इश्क के बाज़ार में, जख़्म तो लाज़िमी हैं यार   अपनी बेवकूफी को, आंसुओं से क्यों धोता है नादानी में जिसे तू, मुहब्बत समझ बैठा था है ये वही गुनाह, जिसे आज तू ढोता है   गुनाह नहीं था कोई, हाथ की लकीरों का नतीजा तो वही होता है, जो कर्म होता है काँटों से खुशबू की, चाहत न रखना कभी कल वही उगेगा फिर, जो आज तू बोता है दस्तक देने आयी थी, किस्मत तेरे द्वार पर रुठ कर चली गयी, चादर ताने क्यों सोता है इश्क के बाज़ार में, जख़्म तो लाज़िमी हैं यार अपनी बेवकूफी को, आंसुओं से क्यों Continue reading इश्क के बाज़ार में

कथा शेर-बकरी की (हास्य-व्यंग)

अपने सुहाग से चंचल सुहागन बोली आज पड़ोसन के यहाँ राम कथा थी पंडित पांडे जी ने कहा रामराज्य में ना कोई दुःख था, ना कोई व्यथा थी  रामराज्य में शेर-बकरी भी जानू बेफिक्र पीते पानी एक ही घाट पर संभव ये कैसे, हमने तो नहीं काटी अब तक कोई रात एक ही खाट पर  व्यंग-वाणों से घायल पति बोला संभव ये कैसे नहीं हो सकता है जब मैंने काटी ज़िन्दगी बन बकरी तो यह किस्सा भी सच हो सकता है  ये सुनकर पत्नी फूली ना समायी फिर खो गयी अपने ही साम्राज्य में जब यह घटित हो सकता है Continue reading कथा शेर-बकरी की (हास्य-व्यंग)

अभी तो पहला ज़ाम है (पति-पत्नी नोंक-झोंक)

   इक नयी नवेली दुल्हन ने दुलारे पति को फोन किया प्यारे जानू घर कब आओगे मुझे इतनी जल्दी भुला दिया पलट कर बेचारा पति बोला प्यारी बस लेता हूँ तेरा नाम बेसब्री झेल लो कुछ पल और यहाँ लगा है जाम पर जाम झल्ला कर पत्नी चिल्लाई घर कब तक पहुंचोगे कब ख़त्म होगा ये जाम क्या यहीं पर जमे रहोगे होकर मदहोश पति बोला प्रिये क्या नशीली शाम है तनिक धैर्य धरो गजगामिनी अभी तो बस पहला जाम है (किशन नेगी ‘एकांत’ )

चले दूल्हे राजा (पति-पत्नी नोंक-झोंक)

अपनी ख़्वाबों की रानी को पत्नी बनाने चले दूल्हे राजा असुरों की बारात संग लिए संग में है बेसुरा बैंड-बाजा लेकिन पता चला जब उसको दहेज़ में ससुर देता है बाइक लौटा दी बारात उसने क्योंकि पेट्रोल के दाम हो गए हाइक ख़बर ये सुन, वरमाला पकड़े दुल्हन पड़ी थी कोने में बेहोश कोस रही थी निष्ठुर पेट्रोल को क्या आज ही होना था मदहोश (किशन नेगी ‘एकांत’ )

ढूंढता रहा उसे, जिसे पा न सकूँ,

ढूंढता रहा उसे, जिसे पा न सकूँ, खबर नहीं जिसकी, मिल गयी। हवा ने उठाया, घूँघट चाँद का, रात में चांदनी जैसे, खिल गयी। मैंने माँगा था, फ़क़त हाथ उसका, थमाकर वह कम्वख्त, दिल गयी। कदम उसके पड़े, मेरी गली में, जमीं मेरे खाबों की, हिल गयी। पहले उधेड़ी उसने, ज़िन्दगी मेरी, फिर मेरी ही खाल से, सिल गयी। (किशन नेगी ‘एकांत’ )