About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

मैं तो फकत शून्य था

मैं तो फकत शून्य था सृष्टि के बीज से फूटा था इक नन्हा अंकुर नीले नभ तले लेता था सांस कोई जैसे पंखुड़ी पहली खिली हो बसन्त के पीले आँचल में याद कर तूने ही बोया था बीज इस अंकुर का मैं तो मात्र शून्य था ये तू ही तो था भरे प्राण जिसने इस निष्प्राण में मेरा तो अस्तित्व था नगण्य बनाया क्यों तूने इसे परिपूर्ण कण-कण में सांस तेरी पग-पग पर छाँव तेरी जिस डगर चलूँ पाऊँ तेरा ही प्रतिबिम्ब मैं तो केवल शून्य था रहा सदा इस भ्र्म में जैसे स्वयं को रचा हो मैंने बंद थी Continue reading मैं तो फकत शून्य था

सावन के जख्म

  सावन के जख्म घनन घनन-घनन घनन देखो कैसे गरजे हैं मेघा फिर से झूम-झूम कर रिझाती काली बदरिया अपने रूठे साजन को नन्ही-नन्ही जल की बूंदें फिर से लेकर आया है बादल बादलों में छिपकर जैसे विरह राग छेड़ा है किसीने सोलह शृंगार के रथ पर सवार फिर से थिरका है पागल सावन सावन के भीगे आँचल तले है पुकारती संतप्त सजना अब तो लौट आओ बेदर्दी प्रियतम इधर सहा ना जाये दर्द विरह का और उधर काली घटा देती जख्म हज़ार क्यों तड़पाते अपनी विरहन को चौमास की रिमझिम बौछारों में मर्म की छटपटाहट तुम क्या जानो बाट Continue reading सावन के जख्म

आयो रे सावन झूम के

आयो रे सावन झूम के रिमझिम-रिमझिम बरसती बूदों का अलबेला मौसम है सावन धुप से झुलसती और ताप से बेचैन धरा की प्यास बुझाता है सावन पृथ्वी और बादल मिलकर रचते हैं नए-नए तिलिस्म सृष्टि और हरियाली के फिर से कोई तान छेड़ता है सावन हैं इसकी झोली में अनगिनित ख्वाब कुछ उजले, कुछ भीगे हम सब के लिए कुछ न कुछ लेकर आया है दीवाना सावन अन्न-दाता के लिए धरती की गोद में फसल के साथ हरित सपने बोने का मौसम है सावन प्रेमियों के लिए अपने अधूरे प्रेम का इज़हार करने का मौसम है सावन आदि काल से Continue reading आयो रे सावन झूम के

क्या अभी भी मेरी जैसी ही चाहिए (हास्य-व्यंग)

क्या अभी भी मेरी जैसी ही चाहिए (हास्य-व्यंग) छिड़ा गृह युद्ध पति-पत्नी के दरमियान बावली घटा छाई बिजली लगी कड़कने घर की सुनसान दीवारें बनीं तमाशबीन गुमसुम आँगन की सांसें लगी धड़कने व्यंग वाणों की बौछार दोनों दिशाओं से घर जैसे बन गया हो कुरुक्षेत्र का मैदान पति बोला तुझ जैसी मिल जाएँगी पचास ये सच्चाई मगर तू कहाँ समझेगी नादान क्रोध के अग्नि वाणों को देकर विराम पत्नी बोली हुजूर तनिक इधर तो आईये इतने वर्षों से झेला है बालम तुमने मुझे तो क्या अभी भी मेरी जैसी ही चाहिए (किशन नेगी ‘एकान्त’ )

क्या द्रौपदी का नाम सुना है (हास्य-व्यंग)

क्या द्रौपदी का नाम सुना है (हास्य-व्यंग) तुनक मिजाज पत्नी से पति ने की ठिठोली अपने रंगीन ख़्वाबों से मैंने तुम्हें चुना है पुरातन काल में एक अयोध्या नगरी थी क्या तुमने राजा दशरथ का नाम सुना है कोपभवन के शयन कक्ष से कैकेयी बोली अयोध्या के राजा थे दशरथ मैंने सुना है शनरंज की बिसात में मुझे घेरने के लिए बालम, अब कौन-सा नया जाल बुना है मसख़रा प्रेमी बन पति ने बात आगे बढ़ाई जैसे मेरे ज़िन्दगी में हरी-भरी टहनियाँ थी महाराजा दशरथ की ज़िन्दगी में भी कभी सर्वगुण सम्पन्न तीन मनभावन पत्नियाँ थी आक्रोश की प्रचंड ज्वाला Continue reading क्या द्रौपदी का नाम सुना है (हास्य-व्यंग)

यार, दही और बची है क्या (हास्य-व्यंग)

यार, दही और बची है क्या (हास्य-व्यंग) मनहूस अमावस, एकाएक प्रियतमा बिछुड़ गयी गम में डूबा पति दहाड़ें मार-मार कर रो रहा था शोकाकुल पति की आवाज सुन पडोसी ने सोचा अर्धरात्रि सरयू घाट पर धोबी कपड़े धो रहा था एक हमदर्द ने पूछा यार क्या हुआ था भाभी को जो देवर को बिन बताये यूँ छोड़ कर चली गयी कल तक खिलाती थी मुझे गरम समोसे बनाकर इस जन्म के सारे सम्बन्ध यूँ तोड़ कर चली गयी दुखियारे पति ने की बयाँ टूटे दिल की दास्तान कुछ नहीं बस, बिल्ली की जूठी दही खा रही थी और दही खाते-खाते ही Continue reading यार, दही और बची है क्या (हास्य-व्यंग)

एक तुम ही तो (हास्य-व्यंग)

एक तुम ही तो (हास्य-व्यंग) नाराज़ पत्नी बोली आजकल नजरें भी नहीं मिलाते खोये-खोये रहते अब आँखों से कभी नहीं पिलाते हूँ मैं तुम्हारी चाहत क्या तुम्हें इतना भी नहीं ज्ञान जाने क्या हुआ तुम्हें मेरा ज़रा भी नहीं रखते ध्यान पति ने व्यंग किया तुम मेरे साँसों की मधुशाला हो मैंने बर्बाद होना सीखा जहाँ तुम वह पाठशाला हो जानू, केवल तुम ही मेरे दिल को मना सकती हो एक तुम ही तो जो मेरे घर को स्वर्ग बना सकती हो पत्नी लजा कर बोली, सचमुच डार्लिंग, मगर कैसे तुम भी बड़े वह हो जी, तड़पती राधा के श्याम जैसे Continue reading एक तुम ही तो (हास्य-व्यंग)

गुनाहों की सजा इसी जन्म में मिली (हास्य-व्यंग)

गुनाहों की सजा इसी जन्म में मिली (हास्य-व्यंग) विवाहित जीवन गुजर रहा था सुख-शांति से बहुत दिनों से पति-पत्नी में नहीं कोई तकरार मगर पति बेचैन बिन खटपट के कैसी ज़िन्दगी कुछ तो बिगड़े संतुलन है अब इसकी दरकार मदहोश तारों की बारात गगन भी मस्त मौला रात्रि के आगोश में छाई थी मधुर चांदनी रात रोमांटिक पति को था इन्हीं पलों का इंतज़ार थाम कर हाथ पत्नी का बताई दिल की बात हे स्वप्न सुंदरीं, चाँद-सूरज मिलते नहीं कभी विचित्र कुदरत का नियम अजीब है ये क़ायदा मगर कभी-कभीं ख्याल आता है मेरे दिल में तुमसे शादी करके मुझे Continue reading गुनाहों की सजा इसी जन्म में मिली (हास्य-व्यंग)

एक निष्ठुर चुड़ैल का साया (हास्य-व्यंग)

एक निष्ठुर चुड़ैल का साया (हास्य-व्यंग) शादी के सुनहरें पिंजरे में क़ैद तड़पता पति बन गया था अपनी मनमोहिनी का देवदास कैसे कराऊँ खुद को आज़ाद इस पिंजरे से देदा-दौड़ा गया पत्नी पीड़ित तांत्रिक के पास चेहरा देख उसका तांत्रिक मुस्कुराकर बोला बेटा, सब जानता हूँ क्यों मेरे पास तू है आया कभी मेरी ज़िन्दगी भी थी बहुत ही खुशहाल जिसके पास तू आया वह भी पत्नी का सताया गंभीर मुद्रा में खोकर तांत्रिक धीरे से बोला धोखा है ये माया-मोह, नश्वर है निर्बल काया मगर बात मेरी सुनकर बेहोश मत हो जाना बेटा तुझ पर है एक निष्ठुर चुड़ैल Continue reading एक निष्ठुर चुड़ैल का साया (हास्य-व्यंग)

शादी एक अलिखित विवादास्पद अनुबंद (हास्य-व्यंग)

शादी एक अलिखित विवादास्पद अनुबंद (हास्य-व्यंग)   शादी के पिंजरे में क़ैद ज़िन्दगी स्वर्ग है या नर्क पति-पत्नी इस विवादास्पद बात पर झगड़ रहे थे शादी शुदा ज़िन्दगी के काल्पनिक नाटक मंच पर अपने किरदारों के संवाद संग माथा रगड़ रहे थे   नादान शोहर ने वेदना भरे स्वर में कहा पत्नी से शादी करके हम दोनो ने किया है एक अनुबंध जैसे बिगड़ैल बाढ़ के विध्वंस से बचने के लिए नदी किनारे बनाना पड़ता है एक सबल तटबंध   अच्छा कैसे।? तीखा कटाक्ष कर सुहागन बोली घुमा फिराकर क्यों बुदबुदाते हो मेरे मन भावन पहले पोंछो आंसुओं की झड़ी Continue reading शादी एक अलिखित विवादास्पद अनुबंद (हास्य-व्यंग)

जिम्मेदारी का अहसास

कुछ वर्ष पहले नीम का एक नन्हा पौंधा उगाया था मैंने अपने घर के आँगन में तब वह नन्हे बालक की भांति खेलता था हवा के झोंकों से मतवाली हवा भी सहलाकर उसके कोमल पत्तियों को थी झूमती खिलखिलाकर रिमझिम बरसात की बूंदों से अटखेलियाँ करना उसे भाता था उन बूंदों के कोमल स्पर्श से खिल उठता था, भीग कर उन बूंदों में अबोध बालक की तरह किलकारियाँ मारता मैं उसका बहुत ध्यान रखता था समय पर पानी देना समय पर खाद देना जैसे मेरी दिनचर्या थी उसके मासूम गालों को सहलाकर असीम आनंद अनंत हर्ष की अनुभूति होती थी Continue reading जिम्मेदारी का अहसास

आखिरी रोटी भिखारी को (हास्य-व्यंग)

घर में खुशहाली लाने का कोई उपाय पूछने चिंतातुर पत्नी पहुंची पांडे पंडितजी के पास शरणागत होकर बताई अपने दिल की वेदना नहीं है सुख शांति घर में उपाय बताओ खास नैनों में देख झरते अश्क इक अबला नारी के पंडित जी के ख्वाब आसमान में टहलने लगे सोलह शृंगार संपन्न मोहिनी से मिलते ही नज़र दिल में दबे अरमान आज फिर से मचलने लगे प्रेम सागर में लगाकर डुबकी पंडित जी बोले सुंदरी, चाहती हो अगर घर में खुशहाली लाना बताता हूँ अचूक उपाय, पहली रोटी गाय को आखिरी रोटी किसी भिखारी को ही खिलाना प्रेम सिंधु की लहरों Continue reading आखिरी रोटी भिखारी को (हास्य-व्यंग)

बेचारा चुनाव चिह्न (हास्य-व्यंग)

बिगड़े पति की हरकतों से परेशान बीवी बोली सपने में भी मत सोचना मैं कभी तुमसे डरूंगी ये वादा है मेरा जानू अगर तुम ठीक से रहोगे भाजपा के चुनाव चिह्न से आपका स्वागत करुँगी लेकिन बावला पति रहता सदा अपनी धुन में किसी कली ने नहीं डाली इस भँवरे को घास पत्नी ने किया आगाह ज़्यादा चतुराई दिखाई तो फिर कांग्रेस का चुनाव चिह्न है सदैव मेरे पास दीवाने आशिक की हरकतें होती गयी हद पार भवंरा मंडराता कभी इस डाल, कभी उस डाल हर महफ़िल से बेआबरू हो कर निकला भवंरा मगर फर्क नहीं पड़ा उसे जैसे हो Continue reading बेचारा चुनाव चिह्न (हास्य-व्यंग)

रहने दो, पहले मैं भी बाई थी (हास्य-व्यंग)

उदास मेहबूबा को देख रसिक पति बोला जानू मैं तुम्हारा कृष्म, तुम हो मेरी राधा चांदनी रात में देखो कैसे झिलमिलाते तारे मगर मेरा पूनम का चाँद क्यों खिला आधा रूठी पत्नी बोली अब नज़र भी नहीं मिलाते यही नज़रें होती थी कभी तुम्हारी मधुशाला पत्नी को मनाने का ये हुनर सीखा कहाँ से मेरे महबूब हमें भी दिखा दो वो पाठशाला राधा को मनाने प्रेमातुर पति ने की ठिठोली हे सखा थक जाती हो अब रख लो इक बाई तुनक मिजाज पत्नी को जैसे सूंघ गया सांप पुरानी चोट शायद आज फिर उभर आयी भावुक हो कर पत्नी बोली Continue reading रहने दो, पहले मैं भी बाई थी (हास्य-व्यंग)

किसी की बला किसी के सर (हास्य-व्यंग)

घूँघट की ओढ़ में करुणा रस में पत्नी बोली सुबह मंदिर जाकर पूजा-पाठ किया कीजिए मांगो कोई वरदान अपनी अर्धांगिनी के लिए घर आकर फिर काम दूजा किया कीजिए तरकश से एक व्यंग वाण निकाल फिर बोली पूजा करने से टल जाएँगी आपकी सारी बलाएँ पत्नी व्रता के मन्त्रों का जाप कर स्वर्ग मिलेगा सीख जाओगे तुम ज़िन्दगी की अद्भुत कलाएँ व्यंग वाण से घायल पति तिलमिलाकर बोला मेरे ससुर जी ने की थी मंदिर जाकर पूजा सर्वप्रथम उन्होंने पहली कला से तुम्हें पाया पत्नी की आज्ञा से फिर किया काम कोई दूजा अपने घावों को देख जख्मी पति बुदबुदाया Continue reading किसी की बला किसी के सर (हास्य-व्यंग)