About MURARI SINGH

लिखने की नेमत छीन भी ले, 'गर खुदा किसी गलियारे मे मेरी पहचान रहेगी तुझसे ज़िंदा, कहता है मुझसे दिल मेरा

क्यूँ छोड़ चला खुद का साया

हर ख्वाहिश थी दफन हुई, कोई सपना पलकों तक था ना आया, जो ढला सूरज तो फिक्र नहीं, पर….. क्यूँ छोड़ चला खुद का साया………. कुछ कागज़ है, कुछ स्याही है, कुछ वक़्त की मोहलत पास ज़रा, कुछ कहना था, कुछ कह भी चुका…. जो छुट रहा वो लिख डाला……….. जो ढला सूरज तो फिक्र नहीं, पर….. क्यूँ छोड़ चला खुद का साया……… ✍ मुरारी सिंह ( बेगूसराय )

मेरी आँखों से हो कर मत आना

मेरे दिल तक आना हो तो मेरी आँखों से हो कर मत आना ….. इस समंदर का पानी खारा बहुत है और, ये मजबूरी है हमारी कि, इसे मैं निकाल फेंक भी नहीं सकता … क्यूँकि, है जिसकी ये अमानत, वो हमें प्यारा बहुत है लेकिन, इस रस्ते ना ही आना दिल तक तो अच्छा इस समंदर का पानी खारा बहुत है

मुझको भी तू बाज़ कर दे मौला

मुझको भी तू बाज़ कर दे मौला कब तक बन गौरैया, डर-डर जिऊँ मुझको भी तू बाज़ कर दे मौला माँ-बाप की आँखों का तारा मैं भी हूँ मुझे भी तू उम्रदराज़ कर दे मौला थक गयी हूँ छोटे पंखों को फरफराकर मेरे पंखों में भी परवाज़ भर दे मौला कोयल-कौओं का रंग बदल तो बदल कौओं में भी सुरीली आवाज़ भर दे मौला जो बन पड़े तेरे वश में तो फ़ौरन फ़रियाद सुन या फिर मौला का ताज़ तज  दे मौला कब तक बन गौरैया, डर-डर जिऊँ मौला मुझको भी तू बाज़ कर दे मौला ✍ मुरारी सिंह  ( बेगूसराय , बिहार Continue reading मुझको भी तू बाज़ कर दे मौला

या सूना है दिल मेरा

या सूना है दिल मेरा दिल्ली की गलियाँ सूनी हैं, या सूना है दिल मेरा जिसको कातिल माना मैंने, वो ही निकला दिल मेरा जिसकी यादें मेरी रातों की, पूरी महफ़िल लूट गयी सपनों के झंझावातों में, वो ही था साहिल मेरा वो कहते हैं, है ये शिकायत, दिल तुम मुझको दे ना सके मजबूरी सुन, तेरे आँगन ही, खोया मैंने दिल मेरा लिखने की नेमत छीन भी ले, ‘गर खुदा किसी गलियारे मे मेरी पहचान रहेगी तुझसे ज़िंदा, कहता है मुझसे दिल मेरा सच पूछो तो उलझन है, सुलझा दो अंतिम बार जो तुम दिल्ली की गलियाँ सूनी थीं, Continue reading या सूना है दिल मेरा