संघर्ष से स्वाभिमान तक

शब्द, गान विलुप्त हुए, मौन था अबाधित अव्यक्त, अछूता व्यक्तित्व, दिवस -रात्र संवाद रहित मुखर, चपल वर्चस्व हो गया पूर्णतया पराजित अंतःकरण में अंतर्द्वन्द, विकलता समाहित ।। रंगमंच पर अभिनीत ज्यों हर पल अनुभव दुःख सुख के आए वेष बदल अवलंबन से कुंठा हुई प्रबल अवहेलित, तृषित दृग सदा सजल।। निश्छल मन की पुलक थी कहीं खोई व्यथाओं से शिथिल मन हुआ निर्मोही उल्लास, उमंग की जो सृष्टि संजोई उस पथ से भटक गया बटोही।। प्रतिभा ने आशा का खोल दिया द्वार प्रज्वलित ज्ञान दीप से कल्पना हो उठी साकार सार्थक हो रहे स्वप्न विचार ले रहे आकार साधना में Continue reading संघर्ष से स्वाभिमान तक

पुरवा

पुरवा स्वर्णिम आलोक से मण्डित तरुवर रश्मियों ने सँवारा अनुराग से भर प्रशस्ति गा उठे चारण पखेरू सस्वर चपला पुरवा गई क्षण को ठहर।। पुरवा ने कोंपल से की फिर ठिठोली लगी खेलने लतिका से आँख -मिचौली कौतुक से भर ज्यों कोकिला बोली गुलमोहर ने धरा पर बिखरा दी रोली ।। दृश्य अपूर्व लगे सराहने मेघ चंचल पुरवा ने बढ़ाया वेग घन घर्षण कर उठे भर आवेश अतिथि बन पहुँचे गिरिराज के देश ।। नटखट पुरवा बढ़ी सागर की ओर त्वरित गति भागी पकड़ने को छोर लहरों से मिल हुई भाव -विभोर अर्णव का ह्रदय भी ले हिलोर ।। निश्शंक, Continue reading पुरवा

सृष्टि

नभ में अरुणिमा का प्रसार क्षितिज सुनहला, वृहत विस्तार प्रकृति ने धारे नव्य अलंकार वसंत ने दिया रूप संवार ।। प्रातः के नित्य रूप अभिनव कूजते, कुहुकते पंछियों का कलरव अर्चना के बहें स्वर अनुपम भोर की पुरवा में घुलता सरगम ।। पुलकित, चंचल, किलकते बाल गौओं को ले जाते पशुपाल सुकोमल नार भरे गागर ताल खेतिहरों ने लिए हल सँभाल ।। प्रहर चढ़ा, हुआ तप्त मलय दिवाकर का रूप अति तेजोमय पथिक सोए अमराई की छाँव निश्चल, शांत, शिथिल हुआ गांव । । प्रतीची की ओर बढ़े विवस्वान संध्या ने किया निशा का आह्वान तारों और मृगांक का रुपहला Continue reading सृष्टि