About ओम हरी त्रिवेदी

आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य , मानव होना भाग्य है तो कवि होना सौभाग्य . . . नाम- ओम हरी त्रिवेदी शिक्षा - स्नातक +तकनीकी डिप्लोमा जन्म स्थान - बैसवारा लालगंज , रायबरेली (उत्तर प्रदेश) व्यवसाय - शिक्षक

अपनों के अहज़ान का अहसास अज़ीजों को ही होगा

अपनों के अहज़ान का अहसास अज़ीजों को ही होगा, दर्द हद से गुज़रता है तो अश्क अब्सारों में सूख जाते हैं| हँसते चेहरे से ख़ुशी का अंदाजा लगाना मुनासिब नहीं, कई मर्तबा तो ग़मों को छुपाने के लिए लोग मुस्कुराते हैं| मेरी नज़र में मुफ़लिस तो वो अहसान फरामोश लोग हैं, देखो फ़कीरों की अमीरी मुफ़्त लाखों दुआएं दे जाते हैं| ज़िन्दगी में सामना होता है सबका अक्सर परेशानियों से, बुलंद इरादों वाले टिकते हैं कमज़ोर अक्सर टूट जाते हैं | मुसीबतों का सैलाब आता है तो कुछ ज़रूर सिखाता है, तमाम सबक लेते हैं गुमान में अंधे अक्सर डूब Continue reading अपनों के अहज़ान का अहसास अज़ीजों को ही होगा

सोंच कर कि सफ़र मुश्किल होता है अक़्सर इरादों का

सोंच कर कि सफ़र मुश्किल होता है अक़्सर इरादों का, हमने भी कभी न देखे पैरों में पड़े हुए थे जो फूटे छाले | मुख़्तलिफ सी हो जाती है उनकी ज़िन्दगी दूसरों से, जब ज़ेहन में कोई खुद के ही ज़ुनून की लौ जला ले | यूँ अफ़सुर्दा चेहरा लेकर उससे मुख़ातिब नहीं होते हैं, जब कोई तुम्हारी सूरत को ही अपना आईना बना ले| सुना है आज़माईशों से तो मुक़द्दर भी बदल जाता है, ज़ाहिल हैं वो जिनके ख़्वाबों को आब-ए-चश्म बहा ले | इब्तिला है मेरा कि अक्सर खुद से ज़फा किया है हमने, मुक़द्दर ने तो दस्तक Continue reading सोंच कर कि सफ़र मुश्किल होता है अक़्सर इरादों का

हमारी गुस्ताखियों को हमें भी तो बताओ आखिर

हमारी गुस्ताखियों को हमें भी तो बताओ आखिर, यूँ ही ना पीठ पीछे हमें अक्सर बदनाम किया करो | आसान नहीं किसी की फितरत जाहिरा समझ पाना, शक्ल देखकर किसी को अज़ीम ना बना दिया करो | बहुत बुलंद तामीरों की सिर्फ खूबसूरती पर मत जाओ, कसीदे पढ़ने से पहले नीव की गहराई जान लिया करो | कोई कितना ही अज़ीज़ क्यों ना हो किसी का यहाँ, ग़म-ए ज़िन्दगी का जिक्र यूँ हर किसी से ना किया करो | बड़े नाज़ुक हो चुके हैं त-अल्लुक़ भी अब समाज में, रिश्ते संजोने को सिलसिले माफ़ी के बना लिया करो | मुफ़लिसी Continue reading हमारी गुस्ताखियों को हमें भी तो बताओ आखिर

जब रहबर-ए-कामिल खुद ही राह भटकाए

जब रहबर-ए-कामिल खुद ही राह भटकाए, तब मंज़िल का पता उसे भला कौन बताए ? समंदर के गिर्दाब में फंसी हो जब कभी कश्ती, इस तूफां में माँझी तब कैसे उसे पार लगाए? जरूरी नहीं कि हर मुसाफ़िर को सही रास्ता मिले, तमाम हैं जो भटके तो फिर कभी लौट के ना आए | गुमान भी शागिर्द बन बैठा है कामयाबी का , बहुत कम लोग हैं यहाँ जो इससे हैं बच पाए | गर मज़बूत हो इरादा और यकीं खुद पर तो, किसकी है जुर्रत यहाँ जो उसे राह से डिगाए ? मेरी शायरी से –

कभी-कभी पहन लेता हूँ वो वर्षों पुरानी सीवन उधड़ी कमीज़

कभी-कभी पहन लेता हूँ वो वर्षों पुरानी सीवन उधड़ी कमीज़, गुरबत के दिनों की कुछ पुरानी यादें फिर ताज़ा हो जाती हैं I इंसानी फितरत मापने का अच्छा पैमाना है ये मुफ़लिसी भी, अपनों के बे-रब्त हुए त-अल्लुकों का आईना दिखा जाती है I वो गुरबत का मंज़र भी देखा है तमाम घरों में अक्सर मैने, जब माँ बच्चों को खिला खुद बचा-खुचा खाकर सो जाती है I बेटी के ब्याह की फ़िक्र ने बाप को असमय बूढ़ा सा कर दिया, अज़ीब रिवाज़ है बिन दहेज़ बेटी घर से विदा नहीं हो पाती है I शहर में अमीरी की तश्वीर Continue reading कभी-कभी पहन लेता हूँ वो वर्षों पुरानी सीवन उधड़ी कमीज़

मै खोजती अस्तित्व

मै खोजती अस्तित्व किया आह्वान भागीरथ ने मेरा मुक्त हुई ब्रह्मा के कमन्डल से जन कल्याण के लिये, धारण किया रुद्र ने मुझे निज जटाओं पर जब मैं धरा पर आई, था मुझमे अपार स्नेह और मातृत्व, किंतु विवश मै आज खुद खोजती अपना अस्तित्व l जन मानस का उद्धार कर सदियों से निर्मल अविरल बहती आई, था औषधीय अमृत तुल्य मेरा नीर कहीं गंगा कहीं भागीरथी मैं कहलाई l था शूरवीर मेरा ही सुत अजेय भीष्म महाभारत में, नही था जिसके बाहुबल का कोई शानी उस भयंकर महासमर में l कभी था मेरे नीर का प्रवाह स्वच्छ अविरल, पापियों Continue reading मै खोजती अस्तित्व

निर्भया

निर्भया अहसास से ही काँप जाता मन , कहीं सुनसान इलाके किसी बियाबान अँधेरे में लुटता किसी अबला का तन , करती कभी मिन्नतें, कभी हाथ जोड़ वह गिड़गिड़ाती पर नहीं पसीजते वहशी दरिंदो के मन l सुकोमल सी वह कांचन काया, विधाता की अनुपम कृति, जो हैं एक बहन, बेटी, बहू की स्मृति l उसका यौवन सौन्दर्य ही बन गया उसके लिए अभिशाप, किसे थी खबर कौन वहशी दरिंदा करेगा यह पाप l क्या – क्या सपने बुने होंगे उसने जीवन के, टुकड़े-टुकड़े कर दिए पापियों ने तन-मन के l थर्रा उठता हैं रोम-रोम उस घृणित कुकर्म के बारे Continue reading निर्भया

मुक्तक

पूर्वानुमान सब धुंवा हो गये, हो गयी गणितें सारी बेकार, देखो भईया प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल, बड़ा अनोखा हाल चहुं ओर पानी ही पानी, कृपा बरस रही इंद्र की या फ़िर है ये मनमानी l

वसुंधरा तब बोल उठी

वसुंधरा तब बोल उठी दिया है जिसको माँ का अधिकार हो रहा उसी पर अत्याचार, लुटता तन होता व्यापार निकलती है बस आह भरी चीत्कार ह्रदय में उसके जब अजब सी पीर उठी वसुंधरा तब बोल उठी ………………………. जो कुछ भी तुझे नियति ने दिया है वह मेरा ही सब कुछ है मुझसे पोषित यह जगत और मुझसे ही पोषित तू है l फिर क्यों मेरे उपकारों पर भारी आज निज स्वार्थो का अम्बार ? क्यों मेरा हरा – भरा दामन उजाड़ने पर तुला सकल संसार ? क्यों निमंत्रित करता मरघट सा विनाश का धुंआधार ? आखिर मैं भी तो Continue reading वसुंधरा तब बोल उठी

वसुंधरा तब बोल उठी

वसुंधरा तब बोल उठी दिया है जिसको माँ का अधिकार हो रहा उसी पर अत्याचार, लुटता तन होता व्यापार निकलती है बस आह भरी चीत्कार ह्रदय में उसके जब अजब सी पीर उठी वसुंधरा तब बोल उठी ………………………. जो कुछ भी तुझे नियति ने दिया है वह मेरा ही सब कुछ है मुझसे पोषित यह जगत और मुझसे ही पोषित तू है l फिर क्यों मेरे उपकारों पर भारी आज निज स्वार्थो का अम्बार ? क्यों मेरा हरा – भरा दामन उजाड़ने पर तुला सकल संसार ? क्यों निमंत्रित करता मरघट सा विनाश का धुंआधार ? आखिर मैं भी तो Continue reading वसुंधरा तब बोल उठी

बरखा

बरखा लगे अषाढ गगन घन गरजे सावन गरु गंभीरा, भादौ झिमिक – झिमिक जल बरसे भरिगे  चहुं दिश नीरा l सजन  बिन कौन हरै मोरि पीरा सजन बिन कौन हरै मोरि पीरा . . .