About पूनम सिन्हा

M.Sc. Zoology

रे पथिक तनिक तू सुनता जा

रे पथिक तनिक तू सुनता जा मैं नीलकंठ हलाहल हूँ पी मुझको शिवपद पाता जा जब मन- धरा-गगन प्रदुषित हों तू जटा जूट प्रलयंकर बन जा रे पथिक तनिक तू सुनता जा….. मैं पाच्जन्य सा महाशंख हूँ सत्य-असत्य के महासमर मे मुझको तू गूँजाता जा मन सारथि कृष्ण बनाता जा रे पथिक तनिक तू सुनता जा……. मैं चक्रों में सहत्रचक्र हूँ तु कमलदल खिलाता जा शिव शक्ति के मिलन क्षण में तू स्वयं का परिचय पाता जा रे पथिक तनिक तू सुनता जा…….

आदमी

आदमी आदमी सोचता है, कुछ लिखे…… जिंदगी के अव्यावहारिक होते जा रहे समस्त शब्द से सार्थक वाक्य बना दे मुक्त हो जाए उन आरोप से जिसे स्वयं पर आरोपित कर थक चुका है, उब चुका है आदमी सोचता है,कुछ करे….. सतत मरते हुए कुछ पल जी ले जीवन के मसानी भूमि पर चंद उम्मीदों की लक ड़ियाँ ले कर जला डाले उदासीनता के कफ़न अचंभित कर दे आदमी ही आदमी को आदमी सोचता है, कुछ कहे ……. जो कह न पाया कभी किसी से और न जाने क्या क्या कहता रहा तमाम उम्र कि बस एक बार अपनी बात कह Continue reading आदमी

संसार

संसार अंधकार की स्वीकृति तेजोमय प्रकाश है भयावहता की विकृति सुन्दरता की अनुकृति है एक दूजे में गुथा हुआ सुख –दुःख का भान है जन्म की किलकारियों में मृत्यु की थपकियाँ है शून्यता में पूर्णता है पूर्णता में शून्यता है असुरत्व का उत्पात भी देवत्व का साम्राज्य भी विराटता की अवधारणा भी लघुता में प्रचंडता भी कर्म की प्रधानता भी दंड का विधान भी शुभता वरदान भी संभावनाए अपार है अद्भुत तेरा संसार है

आँसू

आँसू पलती नयनों में तरल तरल करती अठखेली चपल चपल दुःख संचित गगरी गरल गरल ले साथ चली वह मचल मचल छलकाती, सागर की बेटी नयनों में …… है तृप्त ह्रदय जो दहर दहर हो थिरक रही ज्यों लहर लहर अवसाद मिटाती प्रहर प्रहर दुःख के भँवर में ठहर ठहर लहराती ,सागर की बेटी नयनों में …….. बहती है निर्झर सी कल कल दुःख की तान छेडती पल पल बंद पलकों के निज भार से छल छल पीड़ा के अंबार से विकल उफनाती,, सागर की बेटी नयनो में……… रुदन होठों का सिसक सिसक   व्यथित मन की पीड़ा ले लपक Continue reading आँसू

औरत

औरत औरत ने सपना देखा चिड़िया उसे पंख दे गुम हो गई न जाने कहाँ और वह चिड़िया बन खुले आसमान में ऊँची उडान भरने लगी औरत ने सपना देखा नदियाँ उसे उफान दे गुम हो गई न जाने कहाँ और वह नदी बन तीव्र वेग से बहने लगी औरत ने सपना देखा – पर्वत उसे दृढ़ता दे गुम हो गए न जाने कहाँ और वह पर्वत बन धरती पर अडिग हो गई औरत ने सपना देखा – वृक्ष उसे अपनी जड़े दे न जाने कहाँ गुम हो गए और वह वृक्ष बन हर मौसम में तन कर खड़ी हो Continue reading औरत

सवाल

सवाल सवाल यह नहीं कि हर सवाल का जबाब ढूढ़ ही लिया जाय सवाल यह भी नहीं कि सवाल किन-किन हालातों से पैदा हुए हों सवाल यह है कि कील की तरह सवाल आखों में जब चुभने लगे सपने लहूलुहान हो जाय तब कोई तो हो जो अनगिनत हाथों की ताकत बन जाय धक्के मार कर बंद दरवाजों को तोड़ दे जबाब बाहर निकालें सपनों को मरने से बचा ले

खेल का मैदान

खेल का मैदान रचा जा रहा षड्यंत्र मासूम बच्चों के खिलाफ़ कच्चे घड़ों को बंदूक की शक्ल में ढाला जा रहा हैं खिलौनों में भरे हैं विस्फोटक पदार्थ सिरफिरे कर रहे ऐलान माँ की लोरियाँ गाई न जाए सुनो, धमाके का शोर घर-बाहर ,हर ओर सुरक्षित  नहीं बचपन किन्तु ,बच्चे मानते कहाँ होते हैं बड़े शरारती किसी भी हालात में चुप नहीं बैठ सकते घरों में दुबकने को कतई नहीं तैयार किसी न किसी दिन ढूढ़ ही लेंगे खेल का मैदान जहां – लहू के कतरे नहीं मजहब की पाबंदियाँ नहीं नस्ल का भेदभाव नहीं बस केवल गूंजेगी खिलखिलाने की Continue reading खेल का मैदान

पर्वत का दुःख

पर्वत का दुःख सोचों जरा कैसा हादसा हुआ होगा माटी यूँ ही नहीं पर्वत बना होगा जड़ ज़मीन पर शिखर आसमान पर कितना बँटा–बँटा किसी का न हो सका होगा सोचों जरा कितना हैरान हुआ होगा उसके सीने से दर्द का सोता फूट पड़ा होगा कहीं नदियाँ कहीं झरने बन कर आसुओं की धार न जाने कितनी घाटियों में गिरा होगा माटी यूँ ही नहीं पर्वत हुआ होगा सोचों जरा कितना फूट फूट कर रोया होगा एक ही वक्त में कहीं ठिठुरता कहीं सुलगता कहीं चटकता कहीं खिसकता कितना परेशान हुआ होगा माटी यूँ ही नहीँ पर्वत बना होगा सोचों Continue reading पर्वत का दुःख

ईश्वर और शैतान

ईश्वर और शैतान मै अपूज्य तमाधिपति मेरे अधीन अन्धकार का राज्य मेरा असुरत्व काम ,क्रोध ,लोभ , मद ,मोह में समाहित तुमने ही अपनी भावनाओं  से किया हैं सिंचित फलता ,आकर्षण में बांधता कपट से छलता बहुरूपिये बन छुपा लेता अपने सींग , नुकीले दांत विशालकाय देह रक्तरंजित पंजे दबाता रहता सदा आत्मा की आवाज़ रक्तबीज सा कायम रहता मेरा वजूद हाँ ,तुम्हीं ने तो अमरता का पान कराया खड़ा हूँ तुम्हारे ईश्वर के  समकक्ष ईश्वर हैं तो शैतान हैं शैतान हैं तो ईश्वर हैं कि पाप की गहराइयों  से पुण्य का पहाड़ हैं प्रकाश रहित योजना ही अंधकार की Continue reading ईश्वर और शैतान

चुप्पी

चुप्पी चुप वह है जो सबकुछ जानता – चुप वह भी जो कुछ नहीं जानता कुछ ऐसे भी -सबकुछ जानने का वहम पालते है- वे कभी चुप नहीं रहते कुछ वे है जो चुप्पी को लबादा की तरह ओढ़ते अजीब सी दुविधा में रहते न बोल सकते न चुप रह सकते कसमसाहट में जीते बेबसी में मर जाते किन्तु उनकी चुप्पी व्यर्थ नहीं जाती चुप रह कर भी बहुत कुछ कह जाती आँखों से हाथ के इशारों से पाँव की गतियों से सम्पूर्ण शरीर से गुजरती एक से दूजे में संवहित हो कलम/तुलिका/मुद्राओ से प्रदर्शित होती रहती सृजित कलाएँ बहुआयामी Continue reading चुप्पी

फिर मिलेंगे हम

फिर मिलेंगे हम फिर मिलेंगे हम समुंद्र की लहरों पर समर्पण की नाव पर सवार अपने अपने आसुओं को विसर्जित करेंगे सदा के लिए विरहा की अग्नि से पिघला सूरज यादों के घनीभूत जलवाष्प बन कर बादल सा बरसेंगे होगी धरा सिंचित बीज होगा अंकुरित प्रेम पुष्प खिलेंगे सुगन्धित पवन उड़ा ले जायेंगे प्रेम का सन्देश फूलों और तितलियों के रंगों में घुल मिल मनोरम छटाएँ बिखेरेंगे गायेंगे झूम-झूम कर मिलन के गीत एक दूजे से जो पाया था पूनम की रातों में चांदनी बन बाटेंगे और एक दिन चमकते सितारे बन अपनी ही धुरी पर घूमते प्रेम धुन में Continue reading फिर मिलेंगे हम

तुम और मच्छरदानी

तुम और मच्छरदानी रात की नीरवता में तुम्हारा तन विश्रामावस्था में शांत और शिथिल बिस्तर पर पड़ा आहिस्ते-आहिस्ते गहन निद्रा में लीन तुम्हारे भीतर दबी वासनाएं/कुंठाए/कामनाएं उभरती, आकार लेती अवचेतन मन में रचती स्वप्न संसार का माया जाल वास्तविक से लगते सुख-दुःख में डूबती, उपलाती लौट जाती तृप्ति पाकर अंतरिक्ष में मेरे ही अनगिनत छिद्रों से फिर कोई इच्छाओं के कीट-पतंगे प्रवेश न कर सके दंश न चुभो सके रात भर चौकीदारी करता अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष के चार स्तंभों पर टिका चार दिशाओं में तना, खड़ा साक्षी बनता तुम्हारे उस स्वरुप का जिस पल तुम अन्दर-बाहर से होते Continue reading तुम और मच्छरदानी

अपने-अपने द्वीप

अपने-अपने द्वीप सभी के पास है अपने-अपने द्वीप हर किसी के लिए थोड़ा सा प्यार जी भर की नफरतें भूत की अधभूली यादें समेटे मन-मस्तिष्क में गहरी रेखाएं खीँच अजीब सी आकृति उकेरते सच-झूठ को तोड़ते मरोड़ते जिन्दा है संबंधो की बखिया उधेड़ते कोसते और लतारते रह जाते हैं भीड़ में अकेले कभी-किसी से मिलते भी तो उबाल खाते, भड़ास निकालते कुढ़ते और धिक्कारते दर्द की ज्वालामुखी में तपते दुःस्वप्नो से पीछा छुड़ाने वर्तमान की नाव में सवार चल पड़ते है तरो ताज़ा होकर हर बार पहुँच जाते अपने-अपने द्वीप में —–

बिन तेरे

बिन तेरे यादों की माचिस जली अरमानों की लकड़ी गीली विरहा की तपन से हुआ मन का आँगन धुँआ-धुँआ बिन तेरे फीके लगते मौसम सुहाने नींद चुराई रातों ने सपनों के टूटे सपने बेगाने हुए सभी अपने बिन तेरे उमड़-घुमड़ दुःख के बादल आसमान में बुँदे घायल आशाओं के चीथड़े आँचल सिसकियों की बजती पायल बिन तेरे आँखों में झील समाई इन्तजार की नाव डगमगाई असमंजस की लहरों में खोई बनी बाबरी जागी सोई बिन तेरे तक़दीर ने ली जम्हाई खुशियों को हिचकी आई कैसी यह उदासी छाई उम्मीदों को नींद आई रोती फफक-फफक तन्हाई बिन तेरे !

मेरी कविता

मेरी कविता पीढ़ियों की बन गई गहरी जो खाईयाँ दूरियां पाट देती है मेरी कविता बुझ रहे जहाँ उम्मीद के दीये तेल में डूबी लौ है मेरी कविता भूलें अपनों को व्यस्तता की दौर में याद दिलाती है उन्हें मेरी कविता सो रहा है ज़मीर जिनका झकझोर कर उठाती है मेरी कविता खो गए जो गुमनामियों की गलियों में ढूढ़ कर सामने लाती है मेरी कविता कह नहीं पाते जो जमाने के सामने बुलंद आवाज उनकी बनाती है मेरी कविता लड़खड़ाते हैं जिनके पाँव चंद क़दमों में हाथ थाम कर सहारा देती है मेरी कविता कोई बच्चे तरसे न खिलौने Continue reading मेरी कविता