About Purushottam kumar Sinha

A Banker, working in Allahabad Bank. Having interest in Poem Writing and Reading. Living in Patna, Bihar शायद मन ही है यह मेरा......आपके समक्ष प्रस्तुत..... फिर सोचता हूँ कभी! मन क्या है? मन जैसी कोई चीज है भी क्या? खुशी के एहसास, दुःख का आभाष, शरीर के अन्दर होता हैं कहाँ? क्या तन्तुओ और कोशिकाओं मे? इन्हें कौन दिग्दर्शित करता है? शायद मन है क्या वह? सोचता हूँ कभी! मन का कोई आकार भी है क्या? ठोस, द्रव्य, नर्म, मुलायम या कुछ और? एहसास सुख के करता कहाँ? दुःख का आभाष होता इसे कैसे? मन टूटने पर पीड़ा तो होती है, पर टूटने की आवाज क्युँ नही होती? मन जैसी कोई चीज है भी क्या? सोचता हूँ कभी! पत्थर टूटे तो होता घना शोर, शीशा टूटने से होती चनकार सी, कागज फटने से होती सरसराहट सी, पत्तों के टूटने से होता मंद शोर, फूलों के मसलने की भी होती सिसकी, पर इस मन के टूटने से? मन के टूटने से उठती है कराह!!!!! मस्तिष्क के तार झंकृत हो उठते हैं, क्षण भर को शरीर शिथिल हो जाता है, पत्थरों के दिल भी भेद जाते हैं, आसमान से बूँद छलक पड़ते हैं, शायद मन सबसे कठोर होता है! शायद मन ही है यह मेरा......आपके समक्ष प्रस्तुत..... My Blogspot... कविता "जीवन कलश" https://purushottamjeevankalash.blogspot.com मुझे आप www.poemocean.com, www.hindilekhak.com पर भी पढ सकते हैं। M.No.+919507846018, +918967007431

विरहन का विरह

विरहन का विरह पूछे उस विरहन से कोई! क्या है विरह? क्या है इन्तजार की पीड़ा? क्षण भर को उस विरहन का हृदय खिल उठता, जब अपने प्रिय की आवाज वो सुनती फोन पर, उसकी सिमटी विरान दुनियाँ मे हरितिमा छा जाती, बुझी आँखों की पुतलियाँ में चमक सी आ जाती, सुध-बुध खो देती उसकी बेमतलब सी बातों मे वो, बस सुनती रह जाती मन मे बसी उस आवाज को , फिर कह पाती बस एक ही बात “कब आओगे”! पूछे उस विरहन से कोई! कैसे गिनती वो विरह के इन्तजार की घड़ियाँ? आकुल हृदय की धड़कनें अगले ही क्षण Continue reading विरहन का विरह

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होली तुम संग

होली तुम संग प्रिय, होली तुम संग खेलूंगा, रंगों और उमंगों से,। रंग जाऊंगा जीवन तेरा, खुशियों की रंगों से, सूखेगी न चुनरी तेरी, सपनों की इन रंगों से, चाहतें भर दूंगा जीवन मैं, अपने ही रंगों से। प्रिय, होली तुम संग खेलूंगा, रंगों और उमंगों से। जनमों तक ना छूटेगी, ऐसा रंग लगा जाऊंगा, तार हृदय के रंग जाएंगे, दामन में भर जाऊंगा, आँखें खुली रह जाएंगी, सपने ऐसे सजाऊंगा। तेरे सपनों की रंगों से, जीवन की फाग खेलूंगा। प्रिय, होली तुम संग खेलूंगा, रंगों और उमंगों से।

उत्कंठा और एकाकीपन

उत्कंठा और एकाकीपन दिशाहीन सी बेतरतीब जीवन की आपाधापी में, तड़प उठता मन की उत्कंठा का ये पंछी, कल्पना के पंख पसारे कभी सोचता छू लूँ ये आकाश, विवश हो उठती मन की खोई सी रचनात्मकता, दिशाहीन गतिशीलताओं से विलग ढूंढता तब ये मन, चंद पलों की नीरवता और पर्वत सा एकाकीपन… जीवन खोई सी आपधापी के अंतहीन पलों में, क्षण नीरव के तलाशता उत्कंठा का ये पंछी, घुँट-घुँट जीता, पल-पल ढूंढता अपना खोया आकाश, मन की कँवल पर भ्रमर सी डोलती सृजनशीलता, तब अपूर्ण रचना का अधूरा ऋँगार लिए ढूंढता ये मन, थोड़ी सी भावुकता और गहरा सा एकाकीपन….. Continue reading उत्कंठा और एकाकीपन

फासलों में माधूर्य

फासलों में माधूर्य इन फासलों में पनपता है माधूर्य का अनुराग…. बोझिल सा होता है जब ये मन, थककर जब चूर हो जाता है ये बदन, बहती हुई रक्त शिराओं में, छोड़ जाती है कितने ही अवसाद के कण, तब आती है फासलों से चलकर यादें, मन को देती हैं माधूर्य के कितने ही एहसास, हाँ, तब उस पल तुम होती हो मेरे कितने ही पास…. इन फासलों में पनपता है माधूर्य का अनुराग….. अनियंत्रित जब होती है ये धड़कन, उलझती जाती है जब हृदय की कम्पन, बेवश करती है कितनी ही बातें, राहों में हर तरफ बिखरे से दिखते Continue reading फासलों में माधूर्य

पुकारता मन का आकाश

पुकारता मन का आकाश पुकारता है आकाश, ऐ बादल! तू फिर गगन पे छा जा! बार बार चंचल बादल सा कोई, आकर लहराता है मन के विस्तृत आकाश पर, एक-एक क्षण में जाने कितनी ही बार, क्युँ बरस आता है मन की शान्त तड़ाग पर। घन जैसी चपल नटखट वनिता वो, झकझोरती मन को जैसे हो सौदामिनी वो, क्षणप्रभा वो मन को छल जाती जो, रुचिर रमणी वो मन को मनसिज कर जाती जो। झांकती वो जब अनन्त की ओट से, सिहर उठता भूमिधर सा मेरा अवधूत मन, अभिलाषा के अंकुर फूटते तब मन में, जल जाता है यह तन Continue reading पुकारता मन का आकाश

कहानियाँ

कहानियाँ जीवन के विविध जज्बातों से जन्म लेती हैं कहानियाँ। कहानियाँ लिखी नहीं जाती है यहाँ, बन जाती है खुद ही ये कहानियाँ, हम ढ़ूंढ़ते हैं बस अपने आप को इनमे यहाँ, यही तो है तमाम जिंदगी की कहानियाँ। किरदार ही तो हैं बस हम इन कहानियों के, रंग अलग-अलग से हैं सब किरदारों के, कोई तोड़ता तो कोई बनाता है घर किसी के, नायक या खलनायक बनते हम ही जिन्दगी के। भावनाओं के विविध रूप रंग में ये सजे, संबंधों के कच्चे रेशमी डोर में उलझे, पल मे हसाते तो पल मे आँसुओं मे डुबोते, मिलन और जुदाई तो Continue reading कहानियाँ

जीवन की पोथी

जीवन की पोथी लिखते है हर दिन हम एक-एक पन्ना जिंदगी का, कुछ न कुछ हर रोज,  एक नई कलम हाथों में ले, अपने कर्मों की गाथा से, भरते हैं जीवन की पोथी, ये पन्ने इबारत जीवन की, कुछ खट्टी कुछ मीठी। ये पन्ने सामान्य नही हैं,जीवन की परछाई है ये तेरी, थोड़ा बहुत ही सही, झलक इसमे व्यक्तित्व की तेरी, कर्मों का लेखा जोखा इसमे, भावुकता इसमें है तेरी, ये पन्ने कल जब पढ़े जाएंगे, पहचान बनेगी ये तेरी। हश्र क्या होगा इन पन्नों का, रह रह सोचता प्राणी! क्या इन पन्नों में छपेगी, मेरे सार्थकता की कहानी? पोथी Continue reading जीवन की पोथी

उभरते जख्म

उभरते जख्म शब्दों के सैलाब उमरते हैं अब कलम की नींव से….. जख्मों को कुरेदते है ये शब्दों के सैलाब कलम की नोक से….. अंजान राहों पे शब्दों ने बिखेरे थे ख्वाबों को, हसरतों को पिरोया था इस मन ने शब्दों की सिलवटों से, एहसास सिल चुके थे शब्दों की बुनावट से, शब्दों को तब सहलाया था हमने कलम की नोक से। ठोकर कहीं तभी लगी इक पत्थर की नोक से, करवटें बदल ली उस एहसास ने शब्दो की चिलमनों से, जज्बात बिखर चुके थे शब्दों की बुनावट से, कुचले गए तब मायने शब्दों के इस कलम की नोक से। अंजान Continue reading उभरते जख्म

मैं एक अनछुआ शब्द

मैं एक अनछुआ शब्द मैं अनछुआ शब्द हूँ एक! किताबों में बन्द पड़ा सदियों से, पलटे नही गए हैं पन्ने जिस किताब के, कितने ही बातें अंकुरित इस एक शब्द में, एहसास पढ़े नही गए अब तक शब्द के मेरे। एक शब्द की विशात ही क्या? कुचल दी गई इसे तहों मे किताबों की, शायद मर्म छुपी इसमे या दर्द की कहानी, शून्य की ओर तकता कहता नही कुछ जुबानी, भीड़ में दुनियाँ की शब्दों के खोया राह अन्जानी। एक शब्द ही तो हूँ मैं! पड़ा रहने दो किताबों में युँ ही, कमी कहाँ इस दुनियाँ में शब्दों की, कौन पूछता है Continue reading मैं एक अनछुआ शब्द

मिथ्या अहंकार

मिथ्या अहंकार बिखरे पड़े हैं कण शिलाओं के उधर एकान्त में, कभी रहते थे शीष पर जो इन शिलाओं के वक्त की छेनी चली कुछ ऐसी उन पर, टूट टूटकर बिखरे हैं ये, एकान्त में अब भूमि पर । टूट जाती हैं ये कठोर शिलाएँ भी घिस-घिसकर, हवाओं के मंद झौकों में पिस-पिसकर, पिघल जाती हैं ये चट्टान भी रच-रचकर, बहती पानी के संग, नर्म आगोश मे रिस-रिसकर। शिलाओं के ये कण, इनकी अहंकार के हैं टुकड़े, वक्त की कदमों में अब आकर ये हैं बिखरे, वक्त सदा ही किसी का, एक सा कब तक रहता, सहृदय विनम्र भाव ने Continue reading मिथ्या अहंकार

धुँधला साया

धुँधला साया आँखों मे इक धुंधला सा साया, स्मृतिपटल पर अंकित यादों की रेखा, सागर में उफनती असंख्य लहरों सी, आती जाती मन में हूक उठाती। वक्त की गहरी खाई मे दबकर, साए जो पड़ चुके थे मद्धिम, यादें जो लगती थी तिलिस्म सी, इनको फिर किसने छेड़ा है? यादों के उद्वेग भाव होते प्रबल, असह्य पीड़ा देते ये हंदय को, पर यादों पर है किसके पहरे, वश किसका इस पर चलता है। स्मृतिपटल को किसने झकझोरा, बुझते अंगारों को किसने सुलगाया, थमी पानी में किसने पतवार चलाया, क्युँकर फिर इन यादों को तूने छेड़ा ?

तू रहता कहाँ?

तू रहता कहाँ? आकाश और सागर के मध्य, क्षितिज के उस पार कहीं दूर, जहाँ मिल जाती होंगी सारी राहें, खुल जाते होंगे द्वार सारे मौन के, क्या तू रहता है दूर वहीं कही? क्षितिज के पार गगन मे उद्भित, ब्रम्हांड के दूसरे क्षोर पर उद्धृत, शांत सा सन्नाटा जहां है छाता, मिट जाती जहां जीवन की तृष्णा, क्या तू रहता क्षितिज के पार वहीं? कोई कहता तू घट-घट बसता, हर जीवन हर निर्जीव मे रहता, कण कण मे रम तू ही गति देता, क्षितिज, ब्रह्मान्ड को तू ही रचता, मैं कैसे विश्वासुँ तू हैं यहीं कहीं?

मौन से अधर

मौन से अधर काश! उनसे कुछ कह भी देते ये मेरे मौन से अधर! बस अपलक देखता ही रह गया था ये नजर, मन कहीं दूर बह चला था पराया सा होकर, काँपते से ये अधर बस रह गए यूँ हीं थिरक कर, अधरों से फूट सके ना, कँपकपाते से ये स्वर! काश! मौन अधरों की मेरी ये भाषा तुम पढ लेते! काश! मेरी अभिलाषा व्यक्त करते मेरे मौन से अधर! फूट पड़े थे मन में प्रेम के मेरे बेस्वर से गीत, हृदय की धुन संग मन गा रहा था प्रेम का गीत, पर वाणी विहीन होकर रह गई मेरी Continue reading मौन से अधर

फिर दैदीप्य हुआ पूर्वांचल

फिर दैदीप्य हुआ पूर्वांचल फिर दैदीप्य हुआ पूर्वांचल, प्रखर भास्कर ने पट हैं खोले, लहराया गगण ने फिर आँचल, दृष्टि मानस पटल तू खोल, सृष्टि तू भी संग इसके होले। कणक शिखर भी निखर रहे है, हिमगिरि के स्वर प्रखर हुए हैं, कलियों ने खोले हैं घूंघट, भँवरे निकसे मादक सुरों संग, छटा धरा का हुआ मनमोहक। प्रखरता मे इसकी शीतलता, रोम-रोम मे भर देती मादकता, विहंगम दृष्टि फिर रवि ने फैलाया, प्रकृति के कण-कण ने छेड़े गीत, तज अहम् संग इनके तू भी तो रीत।

मन क्या है?

मन क्या है? सोचता हूँ कभी! मन जैसी कोई चीज है भी क्या? खुशी के एहसास, दुःख का आभाष, शरीर के अन्दर होता हैं कहाँ? क्या तन्तुओ और कोशिकाओं मे? इन्हें कौन दिग्दर्शित करता है? शायद मन है क्या वह? सोचता हूँ कभी! मन का कोई आकार भी है क्या? ठोस, द्रव्य, नर्म, मुलायम या कुछ और? एहसास सुख के करता कहाँ? दुःख का आभाष होता इसे कैसे? मन टूटने पर पीड़ा तो होती है, पर टूटने की आवाज क्युँ नही होती? मन जैसी कोई चीज है भी क्या? सोचता हूँ कभी! पत्थर टूटे तो होता घना शोर, शीशा टूटने Continue reading मन क्या है?