नहीं कह पायी

आज फिर मैं कहना चाहती थी, मत जाओ, मेरे लिए रूक जाओ “नहीं कह पाई” आज फिर मैं थाम लेना चाहती थी जोर से तुम्हें अपनी बाहों में कि मेरी सांसों के साथ साथ तुम भी पिघल जाओ “नहीं कर पाई” आज फिर रोक देना चाहती थी, रात को जो मुझे तुम से अलग करती है ” नहीं कर पाई” आज फिर बता देना चाहती थी कि तुम्हारे बिना कितनी अधुरी हूं मैं रोम रोम मेरा तरसता है तुम्हारे स्पर्श को हर धड़कन मेरी सुनना चाहती है तुम्हारी आवाज़ आंखें तुम्हें ही ढुढती है हर पल हर घड़ी तुम्हारा ही Continue reading नहीं कह पायी