प्यार

प्यार प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो कोई परिभाषा से परे आशा प्रत्याशा से परे इक हृदय में ज्वाला बन क्षीण क्षीण जलता हुआ भावनाओं के पवन से जीता और मरता हुआ संदेह और विश्वास की धाराओं से लड़ता हुआ एक पल में अल्प हो के दूजे में बढ़ता हुआ नाम क्या दूं तुझ को मैं जब खुद को ही समझा ना मैं प्राप्य और अप्राप्य की दुविधा में उलझा हूँ मैं इस घुटन को जलने दो इस को कोई आराम ना दो प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो संकेत मुरारका Advertisements

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दिखावा

दिखावा झूटे दिखावे की यारी अर्ज़ है मतलबी दुनिया केवल खुदगर्ज है मतलब से रिश्तें बनाते लोग सब काम बनने पर छोड़े यह मर्ज है खामोशी से तोड़ लेते यों रिश्ता ना निभाने का यह कैसा फर्ज़ है चन्द लफ्ज़ो के लिए तरसा देते वो बिन कारण दुश्मनी करते दर्ज है किसी मजबुरी का न उन्हे एहसास मतलब परस्ती अफ़साने अर्ज है दरअसल ये दुनिया ही खुदगर्ज़ है झूटे दिखावे की दोस्ती अर्ज है पास बुलाया था अपने इरादो से साथ निभाया वह मिरे पे कर्ज है साथ छोड़ने का फैसला कबुल है अफसोष ज़ाहिर करने का तर्ज़ है सजन

अरमान

अरमान उठे अरमान बादल से बिजलियाँ गिराने को उठती पलकें दीदार में अँखियाँ मिलाने को बेअदब दिल की चाहत रही दीदार-ए-जल्वे साज़ों में भी आवाज अधुरी सुर लगाने को हर ईमान खोटा नज़र आए इस बाज़ार में हर तरफ बेईमान बचा है पर्दा गिराने को जीत और शिकस्त में कहाँ कोई फ़ासला है दोनों मिले मयखाने में रंज-ए-दिल भुलाने को ख़ुदा अजीब बनाता है सूरते दिल लगाने गज़ब पाबंदी हर शख्स तैयार है मिटाने को (प्रकाश शर्मा की रचना का संशोधित रूप)

मोहब्बत

मोहब्बत से यों गिला न करो इसे मतलबी सिलसिला न करो इश्क़ लाख छिपाए छिपता नहीं इस बात का जलजला न करो इश्क़ है इश्क़ ये मज़ाक़ नहीं चंद लम्हों में फ़ैसला न करो मजबुरी है तो तौबा न करो ख़ुदग़र्जी से फासला न करो आग का दरिया भूलना नहीं वहम से इस से खेला न करो प्यार कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं इस लम्हों में झमेला न करो इश्क़ जैसा खूदा-ए-पाक नहीं मन में शिकवा रख मिला न करो सजन

चिट्टी बेटे की

चिट्ठी बेटे की (एक पुरानी कविता) तुम्हारे जाने के बाद हर दिन खिड़की से बाहर तकाते उम्मीदों की आश लगाये मायूस हो जाते अब गुमशुम से खिड़की से पर्दा नहीं हटाते बहुत दिनों बाद खिड़की से पर्दा हटाया तुमने लिफ़ाफ़े में जो चिट्ठी छोड़ी थी, वो खिड़की के बाहर पड़ी थी, बारिशों में गुलज़ार हो चुकी थी रेखाओं से टहनिया फूट चुकी थीं, और आधे धुले शब्दों से फूल निकल आये थे, उन पर बहुत सारी तितलियाँ बैठी थी, जो चिठ्ठी तुमने मेरे कमरे के बाहर छोड़ी थी, उन बारिश से भीगे फूलों से चुलबुली तितलियाँ लगी मंडराने मेरे आसपास, Continue reading चिट्टी बेटे की

मिलन के ख्याल

मिलन के ख्याल जब वह शर्मसार होते हैं; तो चहेरे पे गुलाब होते हैं आँखों मे शोख़ी,होटों मे मुस्कान;दिल मे ख्व़ाब होते हैं जब वह निहारें तिरछी नज़र से;दिल तार-तार होते हैं . क़सम खुदा की,जन्नत सी नसीब,तब वह लाजवाब होते हैं काज़ल भरे मद-मस्त कजरारे नयन; बादल से होते हैं . पलक झपकाना,कभी मुस्कुराना;अन्दर उतार चड़ाव होते हैं मिलन की चाह मे ख़ुशियों से दिल तो बे-लगाम होते हैं अरमां हरदम तड़पते सीने मे;लब्ज़ों का लब्बो पे टहराव होते हैं इश्क़ छुपाया नहीं जा सकता;अदाओं से खुद बयाँ होते हैं इश्क़ मे जुनून इतना; मर-मिटने को रज़ा बेहिसाव होते Continue reading मिलन के ख्याल

पीने की नशा

दिल की बात, नशे की हालत में :- साकी मयखाने में, छलकाती शराब प्यालो में पीलाये, होता नशा, मजा है नशे में ,पीने में नशा पीने का, और साकी को है पिलाने में आलम होता नशे का,चड़ती दिल-ओ-दिमाग में खुशबू साकी की या प्याले की,महकती मयखाना में रहती है दिल-ओ-दिमाग पे,दोनों की अदा छलकाने में डूबे चाहे जितना साकी में,नशे में, बैठ मयखाने में मजा कभी भी पुरा न होता,हद होती,होश गवाने में नशे की खुमार,जीने के सामान,मज़ा आता पीने में पीके मज़ा,जीने की चाहत बाकी रहती पीने में जो नहीं पीते,उन्हें क्या पता,हम क्यों बेकरार पीने में कैसे जीते Continue reading पीने की नशा

हाईकु

भोले भन्डारी त्रिनेत्र जटाधारी नन्दी सवारी त्रिशूल धारी भांग सेवन कारी है त्रिपुरारी कंठस्थ हाला पहन मुन्ड माला है भोलाभाला चन्द्र कपाल लपेट बाघ छाल करे कमाल शिव की स्तुति हृदय भाव भक्ति आशीष प्राप्ति त्रिलोक नाथ रहे नाग के साथ डमरू हाथ तुष्ट सरल कंठस्थ है गरल दाता सबल सजन

वेदना

मेरी तनहा सी रातों में हज़ारों गम के साये में कुछ लगते हैं अपने से तो कुछ लगते पराये से मुझे भी दिल के इस फन पे बहुत ही नाज़ होता है जहाँ भर के थपेड़ों को ये जैसे छुपाये है हमारी डूबी आँखों में ना अश्कों का सुराग होगा कहाँ गैरों में ये दम था हम अपनों के सताये हैं किसी दिन खाक के मानिन्द फ़ना होंगे हवाओं में अभी तो लाश हम अपनी यूँ मुश्किल से उठाये हैं संकेत मुरारका

पिया मिलन

पिया मिलन की बात सुनीसुनी सी रात, मन भीगा याद आई तेरी, मन बहका याद आये दिन वह मिलन के सावन के भीगी भीगी रातों मे, दूर गगन में जब बिजली चमकी, बाँहे फैलाये तू लता सी चिपकी ! आँहे तेरी, जैसे बजा राग मल्लाहर सखी, जैसे बैठी हो कर सोलह शृंगार सुर्ख नैनों में आतुरता की धार ! लगा मधुर स्पर्श जैसे शीतल फुवार, काली घटा में चमकी मन की आग सांसे तेरी छेढ़ गई समर्पण के राग नभ में समाये बादल,भीगी भीगी रात सखी तुम में समाये हम,मिलन की सौगात ! सो न पाये, करवटें बदलते बीती सारी Continue reading पिया मिलन

विरह

सावन की रात ,तूफानी बरसात नयनों से झरते नीर, बहे एक साथ, आँखों की पीढ़ा छिपाये दोनों हाथ, सिसक-सिसक नीर झरे, जैसे बरसात, घनघोर घटाओं में जब बिजली चमके , मन की दीपशिखा ढूँढें तुम्हे रोशनी लेके, ह्रदय का करुण आर्तनाद बिजली में कढ़के बाहर में सावन,अन्दर पीढ़ा आंसुओं से छलके, विरह में बीती रात,कोकील जैसे भोर सवरे गहन मन की शाखाओं परे,यादों के सहारे, विरही केका कुहु-कुहु नहीं, तेरा नाम उच्चारे भीगे-भीगे आँचल में सर्द-शीतल दिल तुम्हे पुकारे -सजन

नवगीत

ओह, कितना शोर है अन्दर, बाहर निश्चुप कितने बिचारों का समागम फिर भी जुवां है मौन आवाज़ की इस दुनिया में बेरहम हो गये शब्द और मन सुन रहा अपनी ही आवाज़ हरदम । मेरे बैचेन मन की आवाज़ धड़कन में बज रही इन उठती गिरती स्वांसों से मन के अन्दर दिल में पल पल प्रतिपल हर पल जिस की लय भी और ताल भी, नृत्य करते यादों में अदृश्य होकर दृश्य भी । अपनी चीखें ,अपने रूदन सोच के सागर में डुबा हुआ खुद मन भंवर सा और डुबता उभरता प्रतिक्षण जग हंसाई का कारण तमाश बन गया है Continue reading नवगीत

देह गंध

यह देह गंध खोज रहा मिलन- जैसे महक रहा चंदन या फूलों का उपवन या शृंगार में कस्तूरी मन फूलों से सजकर आई जैसे की चमेली की डालियाँ या उड़ती बलखाती तितलियाँ या नभ में चमकती बिजलियाँ मेरे आंगन चांदनी छाई जैसे आलोकित हो रही निशा या बिन पीये छाया कोई नशा या रंग बिरंगे फूलों का गुलदस्ता है मिलन की आतुराई जैसे आकाश में लहराती पतंग या तट तोड़ती जलधारा की उमंग या उफनती लहरों की तरंग शीतल चांदनी मन्द मन्द मुस्कुराई जैसे घर के आगे तुलसी हर्षाई या भीगे आंचल में लज्जा छिपाई ओठ में गुलाबी लाली लज्जाई Continue reading देह गंध

मेघदूत

दूत, अति प्रिय दूत, नभ में विचरते अद्भुत कालिदास की कल्पना के मेघदूत कर दो ना मेरा एक काम छोटा सा पंहुचा देना प्राणप्रिया को संदेशा तुम बिन है उदास, जल बिन मछली सा विचारों के धूप छांव तले नभ में जब बादल डोले अन्तर मन कवि की कल्पना में बोले रंगीन कोई सपना लाचारी में विरह अगन जलना कारण तुम बनो, मेरा संदेश पंहुचाना समय की धारा बहे अविराम प्रिया बिन न दिल को चैन न आराम हे मेघ, असहाय हूं, करो ना दूत का काम काले कजरारे बादल में बिजली चमके धड़कन हिया में प्रेयसी के लिये धड़के Continue reading मेघदूत

बीते पल

बीते पल यादो के झुरमुट से कोई पत्ता, आया उड़ते हुवे ; उस पर कुछ धुल जमी थी, मन है कि मचल पड़ा, पुरानी स्मृतिया, आतुर आँख देखे बरसे न जाने कैसी कैसी यादें घुमे नज़र मे दिन पुराने, एक दुसरे का साथ निभाना, जीने-मरने की कसम, घर बसाने का सपना, जानना चाहता हूं कि- बिछड़ने के बाद, क्या था जो जोड़े रखा हमे, मन आज भी तड़पता, अकेले होकर कभी कभी, सब के बीच तलाश करता, पुराने दिन कि – अटखेलियाँ करती नादानीयां रिमझिम बारिस मे भीगना, कानो मे गुनगुनाये पैजनीया, खिलखिलाना,हँसना-हंसाना, और कितनी कितनी बातें, लिपट पड़ती बांहों Continue reading बीते पल